राजा का अहंकार और महात्मा का ज्ञान
King and Mahatma story: एक बार एक प्रतापी राजा के मन में अपनी शक्तियों को लेकर अहंकार जाग उठा। उसने अपने दरबारी मंत्रियों को इकट्ठा किया और गर्व से पूछा, प्रजा के सारे काम मैं करता हूँ। उन्हें अन्न मैं देता हूँ, रोजगार मैं देता हूँ, उनकी बेटियों के विवाह कराता हूँ और सुरक्षा भी मैं ही प्रदान करता हूँ। जब हर काम मैं करता हूँ, तो ये लोग मेरी पूजा और मेरी आरती क्यों नहीं उतारते? वे भगवान की आरती क्यों करते हैं? ऐसा कौन सा काम है जो सिर्फ भगवान कर सकता है और मैं नहीं कर सकता? मुझे भगवान के काम बताओ।
राजा का यह जटिल और अहंकार से भरा प्रश्न सुनकर सभी मंत्री निरुत्तर हो गए। काफी सोच-विचार के बाद मंत्रियों ने कहा, महाराज! इस प्रश्न का सटीक उत्तर तो कोई सिद्ध साधु-महात्मा ही दे सकते हैं, क्योंकि उन्हीं का भगवान से वास्तविक परिचय रहता है। राजा ने तुरंत आदेश दिया कि राज्य में किसी ऐसे महात्मा की खोज की जाए जो उनके इस प्रश्न का उत्तर दे सके।
सिद्ध महात्मा का दरबार में आगमन
पूरे राज्य में खोजबीन शुरू हुई। अंततः राज्य की सीमा पर कुटिया बनाकर रहने वाले एक सिद्ध महात्मा के बारे में पता चला। मंत्रियों ने कुटिया पर जाकर महात्मा जी को राजा के प्रश्न से अवगत कराया। महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, मैं कल स्वयं दरबार में आकर राजा को उनके प्रश्न का उत्तर दूँगा। अगले दिन महात्मा जी राजा के दरबार में पधारे। उन्होंने राजा को देखा और तीन बार हाथ उठाकर सज़दा (प्रणाम) किया। राजा ने उत्सुकता से अपना वही प्रश्न महात्मा जी के सामने दोहराया।
गुरु का आसन और ज्ञान की कसौटी
राजा का प्रश्न सुनकर महात्मा जी गंभीर हुए और बोले, राजन! आपके प्रश्न का उत्तर तो मैं दे दूँ, किंतु आपको प्रश्न पूछना ही नहीं आता। राजा ने आश्चर्य से पूछा, महात्मा जी, आपके कहने का क्या मतलब है?
महात्मा जी बोले, मतलब यह कि जिससे ज्ञान लिया जाता है, वह गुरु होता है। गुरु को हमेशा उच्च आसन पर बैठाया जाता है, पर यहाँ तो तुम खुद ऊँचे सिंहासन पर बैठे हो! यदि उत्तर चाहिए, तो पहले मुझे अपना आसन दो। राजा ने तुरंत अपना सिंहासन छोड़ दिया और महात्मा जी को उस पर बैठा दिया। इसके बाद राजा बोला, अब बताइए गुरु जी।
महात्मा जी ने राजा की ओर देखा और कहा, इस अहंकार रूपी मुकुट को पहले अपने सिर से उतारो। जब तक तुम पूरी तरह खाली नहीं होगे, तब तक ज्ञान कैसे मिलेगा? राजा ने अपना कीमती मुकुट भी उतारा और महात्मा जी के हाथों में सौंप दिया।
राजा ने फिर कहा, अब तो बताइए! इस पर महात्मा जी बोले, राजा होकर भी तुम्हें इतनी मर्यादा नहीं पता? पहले अपने गुरु को प्रणाम तो करो। राजा ने तुरंत हाथ उठाया और महात्मा जी को झुककर तीन बार सज़दा (प्रणाम) किया। सब कुछ करने के बाद राजा ने अधीर होकर कहा, “अब तो कृपा करके बता दीजिए।
महात्मा जी ने मुस्कुराते हुए कहा, राजन! क्या अब भी कुछ बताने को शेष बचा है? क्या तुम्हारी समझ में अभी तक कुछ नहीं आया? देखो, मात्र दो मिनट पहले जब मैं तुम्हारे दरबार में आया था, तब तुम ऊँचे सिंहासन पर बैठे थे, मुकुट तुम्हारे सिर पर था और मैं नीचे खड़ा होकर तुम्हें प्रणाम कर रहा था।
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और अब, ठीक दो मिनट बाद, मैं तुम्हारे सिंहासन पर बैठा हूँ, तुम्हारा मुकुट मेरे सिर पर है और तुम नीचे जमीन पर खड़े होकर मुझे प्रणाम कर रहे हो। भगवान बस यही करता है वह पल भर में राजा को रंक और रंक को राजा बना देता है। समय का यह चक्र बदलना सिर्फ भगवान के वश में है, तुम्हारे या किसी और मनुष्य के वश में नहीं। महात्मा की यह दिव्य बात सुनते ही राजा का सारा अहंकार चूर-चूर हो गया और वह समझ गया कि संसार की वास्तविक सत्ता केवल और केवल ईश्वर के ही हाथ में है।
यह कथा हमें सिखाती है कि परिस्थितियां कभी भी एक जैसी नहीं रहतीं, इसलिए जीवन में कभी भी अपने पद, धन या शक्ति का अहंकार नहीं करना चाहिए।
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