Kahani: मां की सीख
Kahani: एक परिवार में दो भाई अपनी अपनी पत्नियों सहित बड़े प्रेम से रहते थे। जैसे दोनों भाइयों में प्यार और एक-दूसरे का सम्मान था वैसे ही दोनों जेठानी देवरानी में था। दोनों बिल्कुल बहनों जैसे रहती थीं। हुआ यूं कि एकदिन दोनों के बच्चे झगड़ पड़े। उनके झगड़े के चलते दोनों जेठानी देवरानी भी झगड़ा शुरू हो गया। बात इतनी बढ़ी कि दोनों ने गुस्से में एक-दूसरे से कहा, वो कसम खाती है कि वह एक-दूसरे से बात करना तो दूर अब शक्लें भी नहीं देखेंगी। इतना कहकर दोनों ने अपने अपने कमरों के दरवाजे बंद कर दिए।
थोडी देर में जेठानी के दरवाजे पर खटखट हुई। वह गुस्से में बोली- कौन है। दीदी मैं आपकी छोटी बहन, बाहर से आवाज आई। जेठानी ने दरवाजा खोला तो सामने देवरानी हाथों में चाय लिए खडी थी। क्या है तू तो कहती थी मेरी शक्ल भी नहीं देखेगी, बात करना तो दूर। कसमें तक खा रही थी, अब क्या हुआ, क्यों आई है यहां।
दीदी, सोचकर तो मैं भी यही गई थी, मगर मां की कही बातें याद आ गईं। कभी किसी से गुस्सा हो जाओ तो उसमें बुराई नहीं अच्छाइयों को ढूंढों। गुस्सा थोड़ी देर का होता है मगर पछतावा जिंदगी भर का होता है। और मां ने सच ही कहा था, जबसे इस घर, इस परिवार में आई हूं आपने एक बडी बहन की तरह हर मोड़ पर मुझे संभाला। मेरा मार्गदर्शन किया। दीदी जो कुछ सीखा आपसे ही तो सीखा है। बच्चों की नादानियों में अगर हम बड़े भी नादानी करेंगे, तो हम क्या समझदार हुए भला।
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जेठानी ने देवरानी को गले से लगा लिया। पगली, गलती मेरी है। तू तो छोटी बहन है मेरी और गुस्से में यदि तुमसे कुछ भूल भी हो गई तो मुझे तो बड़प्पन दिखाना चाहिए था। मुझे माफ कर दे छोटी। नहीं दीदी, गलती मेरी है मुझे आप माफ कर दो। छोटी रोते हुए बोली। बस, अब चुप कर, सब भूल जाओ छोटी। कहकर जेठानी ने भी भीगी हुई पलकें लिए देवरानी को गले से लगा लिया।
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