Kahani: पगली माई
Kahani: आगरा में एक प्रतिष्ठित मुस्लिम परिवार रहता था। परिवार में एक बड़ी सुंदर कन्या थी, जिसका नाम था जमीरन, उसके पिता इकबाल अहमद आगरा के प्रसिद्ध डॉक्टर थे। प्रचलित प्रथा के अनुसार आठ- नौ वर्ष की अवस्था में ही जमीरन का विवाह बेरिस्टर याकूब साहब के सुपुत्र से हो गया।
भगवान की इच्छा से जमीरन ससुराल जा पाई ही नहीं, इसके पति पढ़ने के लिए आगरा से लखनऊ गए और इन्फ्लूएंजा के शिकार हो गये। ठीक 14 वर्ष की अवस्था में जमीरन विधवा हो गई। मुसलमानों में विधवा होने की क्या चिंता? पिता और भाई पुनर्विवाह कर देना चाहते थे। पता नहीं जमीरन को क्या धुन सवार हुई, उसने विवाह करने से स्पष्ट अस्वीकार कर दिया।
पिता ने बहुत समझाया, कि हम हिंदू थोड़ी ही हैं, हमारे कुरान शरीफ में तो यह जायज है। लोग पता नहीं क्या कहेंगे। लड़का बहुत सुंदर और पढ़ा लिखा है। पास पड़ोस वालों ने भी आग्रह किया। भाई ने डराने-धमकाने में कोई बात छोड़ी नहीं पर उस लड़की पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वह अपनी बात पर अड़ी रही। जब कोई बात कहता तो वह चुपचाप सिर नीचा कर रोने लगती। वैसे ही आज कल दिन भर इसी चिंता में रहती थी।
नमाज पढ़ने में मन नहीं लगता था। वह बहुत आग्रह करने पर तो मस्जिद में जाती और वहां भी बैठी बैठी आंसू बहाया करती। शरीर दिन बा दिन सूखता जाता था। मुख पीला पड़ गया था। डॉक्टर साहब की यह एकलौती लड़की थी। वह इसे बहुत प्यार करते थे। लड़की की दशा से उन्हें बड़ी चिंता रहती थी। पर करते भी क्या, कोई उपाय चलता न था।
वैद्य आए, डॉक्टर आए, हकीम आए। सब ने देखा और दवा भी दी परंतु रोग के मूल तक कोई पहुंच न सका। किसी की दवाई से कोई लाभ नहीं हुआ। विवाह की चर्चा बंद हो गई। घरवालों ने देखा कि इस चर्चा से इस लड़की को बहुत कष्ट होता है, अतः उन्होंने आग्रह छोड़ दिया। डॉक्टर साहब चाहते थे कि यदि वह शादी ना करने में ही खुश है तो वैसा ही सही, पर वह प्रसन्न रहें।
पता नहीं जमीरन क्या सोचा करती थी। वह एकांतप्रिय हो गई थी। किसी का भी समीप बैठना उसे पसंद न था। कोई कहता तो स्नान कर लेती और कोई कहता तो भोजन। स्वयं उसे अपने शरीर का रक्षण का भी ध्यान नहीं रहता था। एकांत में बैठ कर सूने नेत्रों से कभी-कभार कमरे की छत को, कभी दीवारों को और कभी पृथ्वी को देखती रहती। उसके आंसू सूखना जानते ही न थे। उसे कुछ अभाव था क्या? यह तो भगवान ही जाने।
आगरा में प्रसिद्ध रामायणी महात्मा जनक सुताशरण जी की कथा की धूम थी। नित्य सहस्त्रों स्त्री-पुरुषों की भीड़ कथा में होती थी। कथा के अतिरिक्त समय में भी महात्मा को दर्शनार्थी भक्तों का समूह घेरे ही रहता था। नगर की गली-गली में महात्मा की कथा की चर्चा थी। आज कल सभी लोग कथा की ही बातचीत करते रहते थे।
बच्चों ने तो कथा की चौपाइयां तक स्मरण कर ली थी और उन्हीं को दोहराया करते थे। जमीरन को भी कथा का समाचार मिल चुका था। मुसलमान होने पर भी उसमें संप्रदायिक संकीर्णता न थी। जब सब लोग कथा की इतनी प्रशंसा करते हैं तो मैं भी एक दिन जाऊं। उसने किसी से भी बतलाया नहीं बुरखा डालकर अकेली ही घर से निकल पड़ी। पड़ोसी के घर जाकर, जो जाति के वैश्य थे उसकी स्त्री के साथ कथा में चली गई और पीछे स्त्रियों के साथ बैठ गई।
कथा में किसे पता कि कौन आया कौन गया। सब लोग कथा सुधा के पान में तल्लीन थे। पूर्ण निस्तब्धता छाई हुई थी। प्रसंग कथा श्री रघुनाथ जी के वनवास के समय केवट का वार्तालाप थी। महात्मा जी की वाणी ने प्रसंग में और भी आकर्षण भर दिया था। श्रोताओं में ऐसा एक भी व्यक्ति न था जिस के नेत्र सूखे हो। करुण रस की धारा चल रही थी।
महात्मा ने प्रसंगवश भक्त रसखान और सदना कसाई की भी कथा सुनाई और केवट की भक्ति तथा श्री रघुनाथ जी की उदारता एवं दया का स्पष्ट चित्र श्रोताओं के सम्मुख रख दिया। वक्ता स्वयं कथामय हो रहे थे उनके नेत्रों से दो अविरल धाराएं निकलकर मानस के पृष्ठों को स्नान करा रही थी। वह बार-बार गला भर जाने से बीच में रुक जाते और नेत्र पोछकर कर फिर बोलने लगते। समय हो गया था और प्रसंग की गंभीरता से वक्ता का कंठ अवरुद्ध हो गया था। कोई नहीं चाहता था कि कथा बंद हो।
प्रवक्ता ने श्रोताओं के आग्रह पर भी शेष प्रसंग कल के लिए छोड़कर कथा का विश्राम किया। आरती हुई, प्रसाद वितरण हुआ। लोग अपने-अपने घरों को लौट गए। वह वैश्य स्त्री उठी और जमीरन से चलने को कहने लगी। जमीरन ने उसे रोका। तनिक अवसर मिला। वे दोनों महात्मा के चरणों में प्रणाम करके एक और खड़ी हो गई। महात्मा ने पूछा, क्या पूछना है? आप जिस पुस्तक से कथा कहते थे। उसे क्या मैं पढ़ सकती हूँ? जमीरन वैसे हिंदी अच्छी प्रकार से पढ़ लेती थी। क्यों इसमें क्या आपत्ति है? महात्मा ने आश्चर्य से कहा। दूसरी स्त्री ने बताया कि यह मुसलमान है।
महात्मा बोले राम- नाम के जप और रामायण जी के पाठ में सबका अधिकार है। रघुनाथ जी केवल हिंदुओं के ही थोड़ी हैं, वह तो सबके हैं। महात्मा जी ने एक छोटी सी मानस की प्रति लाकर उसे दे दी। इसे नित्य प्रति पढ़ो, और राम-राम कहती रहो। जमीरन ने सिर झुकाकर महात्मा के चरणों में मस्तक रखा। उसने मन ही मन महात्मा को अपना गुरु चुन लिया।
उसी दिन से जितने दिनों तक महात्मा आगरा में रहे, वह नित्य कथा में आती रही। कथा के आरंभ में आती और कथा समाप्त होने पर उठ कर चली जाती। घर और मोहल्ले के मुसलमानों ने बड़ा हल्ला-गुल्ला मचाया की जमीरन तो काफिर हो गई है। बात कुछ नहीं थी, वह नमाज पढ़ने अब नहीं जाती थी और हिंदुओं की रामायण दिनभर पढ़ा करती थी। उसने माँस भक्षण भी छोड़ दिया था।
डॉक्टर साहब क्या करते? लड़की का मोह छोड़ा नहीं जाता था। डर था कि अधिक कड़ाई करने पर वह रो-रोकर बीमार न हो जावे और समाज के मुसलमान उसके पीछे पड़े हुए थे। अंततः उन्होंने लोगों से स्पष्ट कह दिया कि लड़की की इच्छा में बाधा नहीं डालूंगा। समाज तो ऐसा ही चलता है। लोगों ने तो कुछ दिन बहुत व्यंग कसे और फिर जैसे-जैसे बात पुरानी पड़ती गई, उसे भूल गए। उनके लिए विशेष से वह साधारण बात हो गई और सब तो शांत हो गए, पर जमीरन की भाभी और भाई शांत नहीं हुए। वे बराबर उसके पीछे पड़े थे। भाई का कहना था कि वह शादी कर ले और काफिरों की इस पुस्तक को फेंक दें।
भाभी उसके माँस न खाने पर चिढ़ाती और उसे व्यंग में भगतनी कह कर पुकारती थी। पिता की उदारता और प्रेम ने जमीरन को सुविधा दे रखी थी। पिता के भय से भाई अधिक उद्दंडता नहीं कर पाता था। किसी प्रकार दिन कटते जाते थे। जमीरन का मन इस परिवार से उबता ही गया, उसे न तो परिवार वालों के साथ बोलना अच्छा लगता था और न उसे उसमें उनके साथ रहना।
उसे यहां रह कर अपने जप और पाठ में भी कम अड़चन नहीं पड़ती थी। उसके लिए माँस को पकते और दूसरों को भक्षण करते देखना भी असहाय हो गया। वह घर में माँस आने पर कोठी बंद करके बैठी रहती। वह दिन दूध और फलाहार कर काट देती। महीने के बीस दिन तो ऐसे ही बीतते। धीरे-धीरे उसका अयोध्या की और आकर्षण हुआ। कई बार उसने अयोध्या जाने का विचार किया। पर पिता के प्रेम को तोड़कर जाना भी उसके लिए शक्य न था।
आकर्षण बढ़ता गया और वह अयोध्या जाने के लिए व्याकुल रहने लगी। जिसे भगवान स्वयं बुलाना चाहे, उसे कौन रोक सकता है। आगरा में हैजा फैला और डॉक्टर साहब को अपने चपेटें में ले लिया। घर के सब लोग रो रहे थे, सब पिछाड़े खा रहे थे और जमीरन के नेत्रों में अश्रु भी न थे। उन्मत्त दृष्टि से वह आकाश की ओर एक टक देख रही थी। डॉक्टर साहब के इष्ट मित्र सभी आ गए थे। फूलों से सजा हुआ शव कब्रगाह के लिए उठाया गया।
जमीरन उठी और उस शव के साथ हो ली। लोगों ने बहुत लौटाने की चेष्टा की पर वह लौटी नहीं। शव को कब्र दे दी गई। लोग ऊपर पुष्प चढ़ाकर लौटे। पता नहीं कब जमीरन वहाँ से चली गई थी। सब ने समझा कि घर लौट गई होगी। पर वह घर नहीं आई थी। संध्या को एक बार फिर एक मुसलमान ने कब्र के पास अकेली जमीरन को देखा। और फिर किसी ने उसे आगरा में कभी नहीं देखा। भाई ने बहुत चेष्टा की, पर जमीरन का उन्हें पता न लगा। पाँच सौ रुपये की पुरस्कार की घोषणा भी की।
अयोध्या में एक वृद्ध मुसलमान स्त्री पगली माई करके प्रसिद्ध हो गई थी। वह कभी अयोध्या रहती और कभी लखनऊ आ जाती। लोगों की उस पर बड़ी श्रद्धा थी। लोग उसे घेरे ही रहते थे। किसी ने बताया कि पगली माई आगरा की रहने वाली है। वह किसी से कुछ बोलती नहीं थी। प्रातः नगर के बाहर से आती और आकर किसी पेड़ के नीचे बैठ जाती। लोग आकर उसे घेर लेते, दर्शन करते, फल उसके सामने रख देते।
पगली माई सभी फलों को लोगों की और फेंक देती और कभी उन्हें वहीं छोड़कर किसी दूसरे पेड़ के नीचे जा बैठती। किसी ने नहीं देखा कि वह भोजन क्या करती है। जिस पर वह बहुत प्रसन्न हो जाती, उसकी ओर देखकर केवल हंस देती। कोई सांसारिक वस्तुओं की कामना करता तो वह पृथ्वी पर थूंक देती। कोई बहुत तंग करता तो वह वहां से उठ कर चल देती। पता नहीं लगा कि पगली माई रात्रि में कहां पर रहती हैं। संध्या होते ही वह नगर से बाहर की ओर चल देती।
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कई बार लोगों ने पीछा किया पर उन्हें जब कई मील चलना पड़ा तो हार का लौट आए। अनुमान यह था कि वह कहीं सरयू किनारे रहती होगी। माई दिन भर अस्पष्ट ध्वनि में सर्वदा कुछ कहा करती थी। उसके पास एक रामायण का गुटका भी रहा करता था। पर उसे पाठ करते या पुस्तक खोलते किसी ने देखा नहीं। दिन में केवल एक बार वह कनक भवन जाती और भवन के सबसे बाहरी द्वार पर मस्तक टेक कर चुपचाप लौट आती। यही उसका नित्यक्रम था।
ठीक रामनवमी के उत्सव की भीड़ में जब पगली माई के मंदिर की देहरी पर मस्तक रखा तो वह फिर नहीं उठ सकीं। बहुत देर बाद लोगों का ध्यान उधर गया। ‘जय सीताराम सीताराम सीताराम’ की ध्वनि के मध्य में बड़ी श्रद्धा से पागल माई की सजी हुई अर्थी वैष्णव ने कंधे पर रखी। अब भी वह रामायण जी के गुटके के साथ थी। भक्तों ने उस साकेत की पगली के शरीर को सरयू जी की परम पावन गोद में समर्पित कर दिया। आज तक वैष्णवों में पगली माई का बड़े आदर के साथ स्मरण किया जाता है। महात्मा लोग पगली माई का दृष्टांत श्रेष्ठ भक्तों की चर्चा चलने पर दिया करते हैं।
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