Pauranik Katha: अनजाने में हुए पाप का भोगी कौन, यमराज के इस फैसले में छिपा है गहरा रहस्य

Law of Karma

Pauranik Katha: कर्म प्रधान ब्रह्मांड में हर क्रिया की एक प्रतिक्रिया होती है, जिसे हम कर्म फल कहते हैं। लेकिन क्या कभी आपने सोचा है कि अनजाने में हुए किसी बड़े पाप का न्याय कर्मों का लेखा-जोखा रखने वाले यमराज कैसे करते हैं? इस गूढ़ रहस्य को समझने के लिए शास्त्रों में एक बेहद विचारणीय कथा का वर्णन मिलता है, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हमारे जीवन में बिना वजह आने वाले कष्टों का असली कारण क्या है।

जब राजा के लंगर में गिरा सांप का जहर

कथा के अनुसार, एक परोपकारी राजा अपने महल के खुले प्रांगण में जरूरतमंदों और भूखों के लिए लंगर (भोजन) करवा रहा था। राजा का रसोइया खुले आसमान के नीचे बड़े बर्तनों में खाना पका रहा था। ठीक उसी समय, एक चील अपने पंजों में एक जीवित सांप को दबोचे हुए महल के ऊपर से गुजरी। तड़पते हुए सांप ने अपनी आत्मरक्षा में चील से बचने के लिए फुफकार मारी और उसके मुंह से जहर की कुछ बूंदें सीधे नीचे पक रहे भोजन में जा गिरीं। इस बात से अनजान, रसोइये ने वह भोजन परोस दिया और खाना खाते ही सभी निर्दोष लोगों की तड़पकर मौत हो गई।

यमराज के सामने धर्मसंकट, पापी कौन

जब राजा को इस अनहोनी का पता चला, तो वह गहरे शोक में डूब गया। इधर यमलोक में धर्मराज (यमराज) के सामने एक बड़ा धर्मसंकट खड़ा हो गया कि इस सामूहिक हत्या के महापाप का फल किसके खाते में डाला जाए?

राजा के खाते में? जिसे इस बात का बिल्कुल भान नहीं था कि पुण्य के कार्य में ऐसा अनर्थ हो जाएगा।

रसोइये के खाते में? जिसने पूरी निष्ठा से भोजन बनाया और वह इस जहर से सर्वथा अनजान था।

चील के खाते में? जो केवल अपना प्राकृतिक भोजन लेकर उड़ रही थी।

सांप के खाते में? जिसने किसी को मारने के लिए नहीं, बल्कि केवल अपनी जान बचाने के लिए जहर उगला था।

यह मामला लंबे समय तक यमलोक में बिना किसी निर्णय के अटका रहा।

महिला की निंदा ने सुलझाया यमराज का मामला

कुछ समय बाद, दूसरे राज्य से कुछ यात्री राजा से मिलने उस नगर में आए। उन्होंने महल का रास्ता पूछने के लिए सड़क पर खड़ी एक महिला से संपर्क किया। उस महिला ने रास्ता तो बता दिया, लेकिन साथ में दुर्भावना और मजे लेकर कहा, जरा संभलकर जाना भाई, वह राजा परोपकार के बहाने बाहर से आने वाले लोगों को खाने में जहर देकर मार डालता है।

महिला के मुंह से ये शब्द निकलते ही यमराज ने तुरंत अपना फैसला सुना दिया। उन्होंने उस सामूहिक हत्या के पाप का पूरा हिस्सा उस महिला के खाते में लिख दिया। जब यमदूतों ने हैरान होकर पूछा कि प्रभु, इस घटना में उस महिला की कोई भूमिका नहीं थी, फिर ऐसा क्यों? तब यमराज ने मुस्कुराते हुए एक बड़ा शाश्वत नियम समझाया।

यमराज का न्याय सिद्धांत

जब कोई व्यक्ति जानबूझकर पाप करता है, तो उसे एक विकृत आनंद मिलता है। लेकिन इस घटना में जहरीला भोजन बनने से न तो राजा को, न रसोइये को, न चील को और न ही सांप को कोई आनंद मिला। सब विवश थे। परंतु, इस दुखद घटना की झूठी निंदा करके और राजा को बदनाम करके उस महिला को मानसिक ‘रस’ (आनंद) जरूर मिला। इसलिए, उस अनजाने पाप का फल अब इस महिला को ही भुगतना होगा।

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यह कहानी हमें सिखाती है कि जब भी हम किसी दूसरे के पापों, कमियों या गलतियों का बखान बुरे भाव (ईर्ष्या या निंदा) से करते हैं, तो कुदरत के कानून के अनुसार उस व्यक्ति के पापों का एक बड़ा हिस्सा हमारे खाते में ट्रांसफर हो जाता है। अक्सर हम सोचते हैं कि हमने किसी का बुरा नहीं किया, फिर भी हमारे जीवन में दुख क्यों है? उसका जवाब हमारी परनिंदा (दूसरों की बुराई करने) की आदत में छिपा होता है।

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