Vishnugupta
आचार्य श्री विष्णुगुप्त

कुछ खबरें ऐसी होती हैं, जो निराशा की ओर ले जाती हैं, हताशा की ओर ले जाती हैं और भविष्य अंधकार में होने का संकेत देती हैं। ऐसी ही निराशाजनक चिंताजनक और भविष्य को अंधकार में ढकेलने वाली एक खबर अमेरिका से आ रही है। अमेरिका को ईसाई राष्ट्र घोषित करने की मांग तेजी से बढ़ रही है। दुनिया के सबसे विकसित देश में मजहब आधारित देश घोषित करने की मांग एक आश्चर्य से कम नहीं है और निराशाजनक बात भी है। मजहर पर आधारित राष्ट्र की मांग के खतरे भी खतरनाक है, भीषण हैं और लोकतंत्र के भविष्य के प्रति नकारात्मक परिस्थितियां ही उत्पन्न करती हैं।

मजहब आधारित व्यवस्था में लोकतंत्र की सभी प्रकार की संहिताएं और प्रवृत्तियों का विलोप हो जाता है, एक तरह से लोकतंत्र का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है, जीवन की गतिशीलता टूट जाती है, भविष्य की उम्मीदें टूट जाती हैं, नए विचारों के आगमन व प्रवाह पर हिंसा का पहरा बैठा दिया जाता है। विज्ञान की सभी श्रृंखलाओं पर को बेकार एवं बेअर्थ घोषित कर दिया जाता है। मजहब आधारित व्यवस्था में एक तरह से मजहबी तानाशाही ही कायम होती है। मजहब की बुराइयां ही राज करती हैं। मजहब आधारित बुराइयों और कुरीतियों का विरोध करने वालों को विद्रोही या नास्तिक और खतरनाक घोषित कर दिया जाता है तथा इस प्रकार के लोगों को जेलों में डालकर उनकी आजादी लूट ली जाती है।

हमें इस प्रश्न के उत्तर चाहिए कि अमेरिका में ईसाई राष्ट्र की मांग के प्रति रुझान क्यों बढ़ रहा है! निश्चित तौर पर यह प्रश्न राजनीति को भी झकझोर दिया है। अमेरिका की प्रमुख दो दलीय राजनीतिक पार्टी के लिए के अंदर भी इसके समर्थक तत्वों की संख्या बढ़ रही है, आज न कल अमेरिका की डेमोक्रेटिक एवं रिपब्लिकन पार्टी को ईसाई राष्ट्र की अवधारणा का शिकार होना ही पड़ेगा? इस पर विचार करना ही होगा।

लोकतंत्र में राजनीतिक पार्टियां जनता के अंदर से उठने वाली मांगों और विचारों को लंबे समय तक न तो लंबित रख सकती हैं और न ही उपेक्षित रख सकती हैं, जनता के अंदर से उठने वाली मांगों और विचारों को लंबित रखने एवं उपेक्षित रखने का राजनीतिक खामियाजा भारतीय राजनीति को भुगतना पड़ा था। कभी भारतीय राजनीति में शाहबानो प्रकरण मजहबी कट्टरता की घृीनात्मक और हिंसक विचारों को जन्म दिया था।

इस्लाम की प्रबलता दिखाई थी। दुष्परिणाम यह हुआ कि इस्लाम के प्रतिशोध में बहुसंख्यक राजनीतिक चेतना उत्पन्न हुई। इसी राजनीतिक चेतना से हिंदुत्व की स्थापना हुई और भारत को एक हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग उठी थी। इतना ही नहीं बल्कि राजनीति को भी हिंदुत्व की लक्ष्मण रेखा में बांधने की कोशिश हुई थी। सत्ताधारी राजनीति सहित अन्य सभी राजनीतिक इकाइयों ने नई राजनीतिक अवधारणा और संस्कृति पर विचार करने की जगह नई राजनीतिक संस्कृति से उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने की जगह प्रतिशोध की कुभावना रख कर राजनीतिक संस्कृति अपनाई गई और प्रतिशोध में हिंसक, अपमानजनक राजनीति का खेल हुआ।

इसका दुष्परिणाम हुआ कि हिंदुत्व राजनीति के केंद्र बिंदु में ही स्थापित हो गई। प्रतिशोध करने वाली राजनीतिक इकाइयां लंबे समय से हाशिए पर खड़ी हो गई। आज भारत में हिंदुत्व आधारित सरकार है। यह अलग बात है कि भारत अभी भी हिंदू राष्ट्र घोषित नहीं हुआ है और भारत धर्मनिरपेक्ष बना हुआ है। फिर भी सत्ता के केंद्र में हिंदुत्व जरूर मजबूती के साथ उपस्थित है।

ईसाई राष्ट्र की अवधारणा एवं राजनीतिक संस्कृति को कितना समर्थन प्राप्त है? दुनिया में मजहब आधारित कितने राष्ट्र हैं और मानवाधिकार की उन जगहों पर स्थिति कितनी घिनौनी एवं खतरनाक है? अभी तक जो आंकड़े सामने आए हैं, वह लोकतंत्र वादियों के लिए बुरी खबर से कम नहीं है और हतोत्साहित करने वाले हैं। अमेरिका में ईसाई राष्ट्र की मांग करने वालों की संख्या 45% है। राजनीति एवं सोशल मीडिया में ईसाई शक्तिशाली राष्ट्र की मांग खतरनाक तौर पर जगह बनाई है।

जुलाई, 2020 तक सोशल मीडिया में दो लाख बार से ज्यादा बार ईसाई राष्ट्र शब्द का प्रयोग हुआ है, जबकि 2021 में 289000 बार सोशल मीडिया में ईसाई राष्ट्र शब्द का प्रयोग हुआ था। रिपब्लिकन पार्टी के 67% समर्थक ईसाई राष्ट्र के प्रति संवेदना रखते हैं ,जबकि डेमोक्रेट पार्टी के 29% सदस्य भी ईसाई राष्ट्र के प्रति सहानुभूति रखते हैं। रिपब्लिकन पार्टी जहां राष्ट्रवाद के प्रतीक हैं और एकांकी सोच वाली, हिंसक को स्थापित करने वाली और आयातित संस्कृति के खिलाफ है। वहीं डेमोक्रेटिक पार्टी उदारवाद और शरणार्थी वाद, मुस्लिमवाद में पहचान रखती है, विश्वास भी बनाती है। अमेरिका की राजनीति में दो पार्टी राजनीतिक धारा जड़ जमाए हुए बैठी है।

विश्व का स्तर पर भी मजहब आधारित राष्ट्र की अवधारणा का मूल्यांकन जरूरी है। दुनिया में मजहब आधारित राज सत्ता की अवधारणा बहुत ही पुरानी है। आपको यह जानकर हैरानी होगी कि इस समय आधुनिक युग में भी मजहब आधारित घोषित और अघोषित राष्ट्रों की कमी नहीं है। दुनिया के 199 देशों में 43 देश मजहबी आधार पर मजहबी राष्ट्र। 43 मजहबी राष्ट्रों में से 27 राष्ट्र इस्लामिक है। दुनिया में करीब 60 मुस्लिम देश हैं, इनमें से 27 राष्ट्र घोषित तौर पर इस्लामिक है।

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अघोषित इस्लामिक देशों में भी इस्लाम की संहिताएं ही शासन करती हैं, उनमें अन्य धार्मिक आजादी के लिए कोई जगह ही नहीं होती है या फिर जगह बहुत ही संकुचित होती है। इंडोनेशिया ही एकमात्र मुस्लिम देश है जहां पर अन्य संस्कृतियों के लिए भी थोड़ी बहुत जगह है। कमाल पाशा की धरोहर तुर्की का भी मुस्लिम जिहादी करण हो चुका है। दुनिया में विशेषकर वेटिकन सिटी को भी ईसाई राष्ट्र की मान्यता है, जहां पर पॉप की सत्ता होती है।

वेटिकन सिटी के पोप को भी राष्ट्राध्यक्ष की मान्यताएं हैं। दुनिया में ईसाई मुस्लिम बौद्ध राष्ट्र तो हैं पर कोई हिंदू राष्ट्र नहीं है। कुछ समय पूर्व तक नेपाल एक हिंदू राष्ट्र जरूर था पर माओवाद के उदय के बाद और यूरोपियन यूनियन के दबाव में जनाकांक्षा के विरुद्ध नेपाल को एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र में तब्दील कर दिया गया। नेपाल का आज मुस्लिम और ईसाई करण तेजी से हो रहा है। 106 देश में ऐसे हैं जो किसी भी धर्म के प्रति आस्था प्रकट नहीं करते हैं। भारत, ब्रिटेन और अमेरिका धर्मनिरपेक्ष देशों की अग्रणी श्रेणी में खड़े हैं जहां पर मुस्लिम कट्टरता, मुस्लिमान अनुदार वाद के बावजूद लोकतांत्रिक संस्कृति प्रबल रूप से कायम है।

ईसाई राष्ट्रवाद जो अमेरिका में प्रबल हो रहा है उसके पीछे निश्चित तौर पर इस्लाम की एकांकी राजनीतिक कुचेष्टा, इस्लाम की हिंसा, इस्लाम की घृणा आदि जिम्मेदार हैं। आपको याद करना होगा अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हुए इस्लामिक हिंसा एवं विध्वंस की कहानी को। इस्लामिक जिहाद के आधार पर विनाश किया गया था। इस्लामिक जिहाद के समर्थक आतंकवादियों ने अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर हमला कर विध्वंस कर दिया था, अमेरिकी गर्व के प्रतिक इस वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का विध्वंस अमेरिका के लिए ही नहीं बल्कि दुनिया की लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए भी एक हताशा निराशा और भविष्य के लिए चेतावनी की तरह ही था।

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अमेरिकी वर्ल्ड ट्रेड सेंटर विध्वंस से अमेरिका में इस्लाम के खिलाफ प्रतिशोध की भावना उत्पन्न हुई थी और इस्लाम की घोर हिंसा और खतरे को पहचाना गया था। इसके पूर्व ईसाई राष्ट्रवाद की भावना बेहद कमजोर थी, व्यापक समर्थन की भावना नहीं थी, ईसाई मुस्लिम सौहार्द के साथ रहते थे। इस्लाम के मानने वाले लोगों को विरोधी या फिर अपने लिए हिंसक और खतरनाक दुश्मन नहीं माना जाता था।

ईसाई राष्ट्रवाद की भावना मजबूत करने के पीछे डोनाल्ड ट्रंप का योगदान है। डोनाल्ड ट्रंप पेशे से एक व्यापारी जरूर थे, पर उन्हें इस्लाम के प्रति एक कठोर शख्सियत के तौर पर देखा जाता है। डोनाल्ड ट्रंप मुस्लिम इस्लाम विरोध की कसौटी पर ही राष्ट्रपति बने थे। अपनी चुनावी घोषणा संहिता में ट्रंप ने मुस्लिम समस्या के प्रति कठोर नीति अपनाने का वचन भी दिया था। राष्ट्रपति के तौर पर ट्रंप ने मुस्लिम आबादी को राष्ट्रवाद की परिभाषा पढ़ाने की हर संभव कोशिश की थी, अनेक मुस्लिम जैसों को कठोर संदेश दिया था, कई मुस्लिम देशों के मुस्लिम नागरिकों को अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

मुस्लिम आतंकवादियों के प्रति ट्रंप के नीति संहारकथी। कोरोना की भयानक त्रासदी से उत्पन्न नाराजगी डोनाल्ड ट्रंप के लिए भारी पड़ी और हार के कारण भी थी। डोनाल्ड ट्रंप की हार को ईसाई राष्ट्रवाद की हार के तौर पर देखा गया। हजारों राष्ट्रवादी ट्रंप की हार पर व्हाइट हाउस में हिंसक होकर घुस जाते हैं और राष्ट्रवाद का परचम लहराते है। कुछ जीवन जीवंत, सक्रिय प्रेरक तत्वों की उपस्थिति को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। जब अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में ईसाई राष्ट्रवाद के खिलाफ मस्जिदों से सरेआम अजान होता है और अपील होती है कि इस्लाम खतरे में है, अमेरिका में इस्लाम का झंडा लहराने के लिए रिपब्लिकन पार्टी के खिलाफ और डेमोक्रेटिक पार्टी के पक्ष में मतदान कीजिए, इसके अलावा भी तरह-तरह की इस्लामिक घोषणाएं होती हैं।

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विस्फोटक, हिंसक प्रक्रिया में भी चलती रहती हैं। ऐसी विस्फोटक एवं घृणात्मक प्रवृत्ति ही ईसाई राष्ट्रवाद के लिए प्रेरणादाई होती हैं, इसे कैसे इनकार किया जा सकता है। आधुनिक और ज्ञान के विस्फोट के दौर में ईसाई राष्ट्रवाद या फिर ईसाई राष्ट्र की मांग का समर्थन करना उचित नहीं है। इस्लाम की खतरनाक प्रवृति को कैसे रोका जाए यह भी एक विचारणीय प्रश्न चुनौती है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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