राममंदिर चंदा चोरी ने योगी-मोदी के चुनावी हिंदुत्व को लगाया चूना

जैसा नाम, वैसी करतूत, यानी चंपत राय। मुलायम सिंह यादव का गुलाम, हिंदुत्व खोर, कारसेवकों पर गोलियां चलवाने वाला, यानी नृपेन मिश्रा, भैयाजी जोशी और अपने अन्य आकाओं के आदेश पर अपनी जाति की यूनियन बाजी चलाने वाले, यानी गोपाल राव, राममंदिर में लूटपाट करने की छूट देने वाले यानी अनिल मिश्रा ने न केवल हिंदुत्व की समृद्धि और साख को दफन कर दिया बल्कि योगी-मोदी के चुनावी हिंदुत्व को भी दफन कर दिया। उस नारे और आम अभिव्यक्ति का बीजेपी, मोदी के पास कोई जवाब हो सकता है क्या? जिसमें कहा जा रहा है कि जिन्होंने राम को लाये, उन्होंने ही राम को लुटा।
सार्वजनिक तौर पर उक्त नारा अब जोर पकड़ रहा है, सबसे बड़ी बात यह है कि उक्त नारे को गति देने वाले कोई समाजवादी पार्टी के गूंगे नहीं हैं, कोई कांग्रेस के गुर्गे नहीं है, कोई जिहादी नहीं है, कोई विदेशी नहीं है, कोई विखंडन कारी नहीं है, फिर कौन है? दरअसल ऐसे नारे लगाने वाले और अभिव्यक्ति को गति देने वाले बीजेपी और संघ के ही समर्थक और हिन्दुत्ववादी हैं, जिनकी भावनाएं आहत हुई हैं, जिनके बलिदान को कलंकित किया गया है। जिन्हें लग रहा है कि श्रीराम तीर्थ मंदिर ट्रस्ट पर सरकारी अधिकारी बैठने वाले हैं, राममंदिर सरकार के अधीन जाने वाला है, मंदिरों को सरकारी कब्जे से मुक्त कराने का उनका आंदोलन दम तोड़ने वाला है।
चुनावी हिंदुत्व की एकता खंडित होने वाली है, 2024 जैसा दुष्परिणाम 2027 में भी सामने आ सकता है। जानना यह भी जरूरी है कि 2027 में उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव है और योगी आदित्यनाथ तीसरी बार चुनावी जनादेश की कसौटी पर खड़े होंगे। 2017 जैसा हिंदुत्व 2022 में परिणाम नहीं दिया, 2024 में यूपी में हिंदुत्व के लचर प्रदर्शन ने नरेंद्र मोदी को जनादेश में चूना लगा दिया था, नरेंद्र मोदी को स्पष्ट बहुमत से दूर कर दिया था।
मोदी के चुनावी हिंदुत्व का यह तर्क बहादुरी नहीं दिखाएगा, करिश्मा नहीं करेगा। बचने के लिए बीजेपी, विहिप, संघ के तर्क हवा-हवाई है। इस पक्ष से तर्क दिया जा रहा है कि हमने चोरों को पकड़ लिया है और उन्हें जेल भी भेज दिया है, रिकवरी भी किया है? आम जनता का तर्क ज्यादा मजबूत और चाकचौबंद है। आम जनता का तर्क यह है कि ये तो मामूली लोग हैं, असली चोर, लुटेरे तो चंपत राय है, नृपेन मिश्रा है, अनिल मिश्रा है, गोपाल राव है, इन लोगों ने न केवल चंदा चोरी की है, बल्कि जमीन खरीदने में कमीशन खाई है। सस्ती जमीन को महंगी कीमत पर खरीद कराई गई, राममंदिर निर्माण कार्य में कमीशन खाई है। जांच निष्पक्ष होती तो फिर चंपत राय, नृपेन मिश्रा, अनिल मिश्रा, गोपाल राव को भी जेल होती। इन लुटेरे गिरोह पर करवाई न होना, इन पर एफआईआर दर्ज नहीं होना, यह साबित करती है कि लुट पर पर्दा डालने का ही प्रयास किया गया है।
कितने करोड़ की चोरी हुई है? अनुमान दो सौ करोड़ से लेकर दो हजार करोड़ रुपए तक लगाया जा रहा है। बनियों ने भी मोर्चा खोल दिया है और उन लोगों का नाम सार्वजनिक करने की मांग की है जिन्होंने एक करोड़ और उससे अधिक का दान दिया था। बनियों का कहना है कि 99 प्रतिशत चंदा बनियों ने दिया है। बनियों के चंदा बैंक खाते में गया कि नहीं, यह भी सार्वजनिक होना चाहिए। सर्वविदित है कि बनिया जाति ही पहले जनसंघ, फिर बीजेपी का मूलाधार है, संघ, विहिप के लिए जीवन पालक है, बनिया वर्ग की ऐसी नाराजगी भारी पड़ेगी, संघ, बीजेपी के हिंदुत्व योजनाओं में बनियों की दूरी इनके लिए मौत का समान है।
करे कोई और भरे कोई। बुरे के फंस गए बेचारे योगी आदित्यनाथ। जनता का गुस्सा योगी आदित्यनाथ के सिर पर ही फूटने वाला है। योगी की सरकार ही दांव पर लगी हुई है। योगी आदित्यनाथ लाचार और विवश भी हैं, वे नरेंद्र मोदी, संघ और विहिप से एक साथ नराजगी मोल नहीं ले सकते हैं। तालाब में रहकर मगरमच्छ से बैर? पर संघ और बीजेपी के चुनावी हिंदुत्व को लेकर जातिवादी घेराबंदी जारी हो गई है। जाति अस्मिता के प्रश्न खड़े हो गए हैं, जाति प्रतिनिधित्व और भागीदारी के प्रश्न हवा के प्रवाह में बह रहे हैं। श्रीराम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट पर सिर्फ ब्राह्मणों का ही कब्जा क्यों?
चंपत राय को छोड़कर कोई अन्य जाति का व्यक्ति ट्रस्ट का सदस्य क्यों नहीं है। श्रीराम मंदिर निर्माण समिति में भी सिर्फ ब्राह्मणों की बहुलता क्यों है? उल्लेखनीय है कि श्रीराम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट में कोई दलित नहीं है, कोई पिछड़ा नहीं है, मुलायम सिंह यादव की गोलियों का शिकार बनने वाले अमर बलिदानी कोठारी बंधुओं के परिवार से कोई सदस्य क्यों नही है? पिछड़ों और दलितों में जागरूकता चरम पर है, वे अपना प्रतिनिधित्व और भागीदारी को लेकर सचेत हैं, आंख मूंद कर विश्वास करने के लिए अब तैयार नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि दलितों और पिछड़ों को यह साफ लग रहा है कि बीजेपी हमारा निरोध की तरह उपयोग करती है, हमारा वोट लेकर हमें ही हाशिए पर भेज देती है। ब्राह्मण वाद पर बीजेपी असली फोकस करती है।
बीजेपी को पिछड़े और दलित अपना विरोधी मानते थे, हिंदुत्व और श्रीराम मंदिर आंदोलन के बाद भी दलित, पिछड़े का एक बड़ा भाग बीजेपी को अपना दुश्मन और लुटेरा मानता था। अपनी राजनीतिक दुर्गति के लिए जिम्मेदार मानता था। लेकिन नरेंद्र मोदी के कारण पिछड़े और दलित बीजेपी की ओर झुके हैं और इसीलिए वह बीजेपी को वोट करते हैं। खासकर पिछड़ी जातियों का झुकाव बीजेपी की ओर जबरदस्त हुआ है। पिछड़े और दलित का समर्थन नहीं मिला होता तो फिर नरेंद्र मोदी की केंद्र में सरकार नहीं बनती। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक पटल पर योगी आदित्यनाथ का उदय नहीं हुआ होता।
बीजेपी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बसपा को हराने में सक्षम नहीं होती। नरेंद्र मोदी खुद अपने आप को पिछड़ा कहते हैं, उनकी कथित जाति घांची, तेली पिछड़ी जाति में आती है। लेकिन नरेंद्र मोदी श्रीराम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट में पिछड़ों और दलितों को प्रतिधिनित्व देने में पीछे क्यों रह गए। ट्रस्ट को उन्होंने ब्राह्मणों का चारागाह क्यों बना दिया? बीजेपी विरोधी पार्टियां दलितों और पिछड़ों को हिंदू विरोधी करने में लगी हुई हैं। हिंदू विरोधी शक्तियां पिछड़ों और दलितों के माध्यम से हिंदुत्व की कब्र खोदने में लगी हुई हैं। कहा जा रहा कि मोदी ब्राह्मणवाद कर रहे हैं, एनडीए की सरकारों में पांच मुख्यमंत्री ब्राह्मण हैं, मोदी मंत्रिमंडल में सर्वाधिक मंत्री ब्राह्मण हैं। विपक्ष का यह हथकंडा चल गया तो फिर उत्तर प्रदेश में बीजेपी को सर्वाधिक नुक़सान होगा और योगी आदित्यनाथ की सरकार का पतन भी हो सकता है।
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वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में बीजेपी का हश्र सभी को मालूम है, 2022 में खुद योगी आदित्यनाथ का जनादेश कमजोर पड़ा था। योगी आदित्यनाथ सरकार की नौकरशाही भ्रष्ट, बईमान और जनता के लिए यमराज की तरह हैं। अगर उत्तर प्रदेश के पिछड़ों और दलितों को 2027 में श्रीराम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट में अपनी उपेक्षा और संघ बीजेपी का ब्राह्मणवाद याद आ गई तो फिर नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ का चुनावी हिंदुत्व दफन हो सकता। योगी को लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के सपने का संहार हो सकता है।
चंदा चोरी ने विपक्ष को एक अवसर दिया है, बीजेपी की सत्ता संहार करने का। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या विपक्षी पार्टियां इस अवसर का लाभ उठा सकती हैं? कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और बसपा का हिंदू विरोधी चेहरा और राजनीति भी स्पष्ट है, इनके हाथ हिंदुत्व के अपमान से रंगे हुए हैं। इनके अति मुस्लिम वाद भी सर्वविदित है। चंदा चोरी का प्रश्न सावधानी से उठाना होगा। यूपी विधानसभा चुनावों तक चंदा चोरी के प्रश्न को जीवित रखना होगा, गर्म रखना होगा। श्रीराम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट में पिछड़ों और दलितों को वंचित रखने की बात को प्रचारित और स्थापित करने की जरूरत होगी। निश्चित रूप से श्रीराम मंदिर तीर्थ ट्रस्ट में चोरी और ब्राह्मणवाद बीजेपी के लिए भारी पड़ने वाला है। पिछड़ों और दलितों के समर्थन के बिना मोदी-योगी का चुनावी हिंदुत्व शक्तिशाली नहीं हो सकता।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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