नेताजी सुभाष बोस का पत्र नेहरू के नाम

historical letter of netaji subhas chandra bose to jawaharlal nehru
Shyam Kumar
श्याम कुमार

कांग्रेस-अध्यक्ष के रूप में (उस समय अध्यक्ष को राष्ट्रपति कहा जाता था) पुनः निर्वाचित होने पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने 28 मार्च, 1939 को जवाहरलाल नेहरू को बहुत लंबा पत्र लिखा था, जिसका संक्षिप्त रूप इस प्रकार है। ‘प्रिय जवाहर, मुझे लगता है कि तुम कुछ समय से मुझे बहुत ज्यादा नापसंद करने लगे हो। यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि कोई भी ऐसी बात, जो मेरे विरुद्ध पड़ती हो, तुम उसे बड़े उत्साह से ग्रहण कर लेते हो और मेरे पक्षवाली बातों की उपेक्षा करते हो।

मेरे राजनीतिक विरोधी जो कुछ मेरे खिलाफ कहते हैं, उसे तुम मान लेते हो, किंतु तुम अपने खिलाफ वाली बातों पर करीब-करीब आंखें बंद कर लेते हो। मेरे लिए यह एक पहेली ही है कि तुम मुझे इतना अधिक नापसंद क्यों करने लगे हो? जहां तक मेरा संबंध है, मैं वर्ष 1937 में जबसे नजरबंदी से बाहर आया हूं, मैं व्यक्तिगत तौर पर और सार्वजनिक जीवन में तुम्हारा बहुत अधिक लिहाज व ख्याल रखता आ रहा हूं।

आम जनता के सामने तुम्हारी स्थिति एक पहेली बनी हुई है। जब कोई संकट पैदा होता है तो अकसर तुम इस पक्ष या उस पक्ष में अपनी राय नहीं बना पाते और नतीजा यह होता है कि जनता को तुम दो घोड़ों पर सवारी करते हुए दिखाई देते हो। तुम्हारे अनुसार, तुम जो कुछ कहते हो या करते हो, वह बहुत बुद्धिमानीपूर्ण एवं सुसंगत होता है। किन्तु विभिन्न अवसरों पर तुम्हारे रवैये से अकसर लोग स्तब्ध और आश्चर्यचकित रह जाते हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव के बाद तुमने मुझे जनता की निगाह में गिराने का काम किया है। तुमको यह समझ में आना चाहिए कि जो व्यक्ति तुम्हारे समेत बड़े-बड़े नेताओं, महात्मा गांधी एवं आठ प्रांतीय सरकारों के विरोध के बावजूद अध्यक्ष चुना गया, उसमें कुछ तो अच्छाई होगी! मेरी पीठ पर संगठन का वरदहस्त न होने एवं भारी बाधाओं के बावजूद मैं इतने अधिक वोट प्राप्त कर सका, यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं है।

अगर हम स्वराज के लिए ब्रिटिश सरकार से लड़ना चाहते हैं और अनुभव करते हैं कि उसके लिए उपयुक्त समय आ गया है तो हमें ऐसा साफ-साफ कहना चाहिए और अपने कदम आगे बढ़ाने चाहिए। किन्तु तुमने एक से अधिक बार मुझसे कहा कि चुनौती देने का विचार तुम्हें नहीं जंचता है। अगर तुम सचमुच यह मानते हो कि राष्ट्रीय मांग को मनवा लेने का समय आ गया है तो चुनौती देने के अलावा तुम और कौन-सा रास्ता सही समझते हो? पिछले दिनों महात्मा गांधी ने राजकोट के सवाल पर चुनौती दी थी। क्या तुम चुनौती के उस विचार का इसलिए विरोध करते हो कि उसे मैंने पेश किया था? मैं यह नहीं समझ पाता हूं कि देश की आंतरिक राजनीति के बारे में तुम्हारी क्या नीति है?

अंतरराष्ट्रीय मामलों में तुम्हारी नीति और भी अधिक पंगु है। विदेश नीति यथार्थवादी विषय है और उसका निर्धारण मुख्यतया राष्ट्र के हित की दृष्टि से होना चाहिए। उदाहरण के लिए रूस को ले लो। अपनी आंतरिक राजनीति में वह साम्यवाद को पोषित करता है, लेकिन अपनी विदेश नीति पर वह इसे कभी हावी नहीं होने देता। यही कारण है कि जब उसे अपना फायदा नजर आया तो उसने फ्रांसीसी साम्राज्यवाद के साथ समझौता कर लेने में कोई संकोच नहीं किया। तुम बताओ कि तुम्हारी विदेश नीति क्या है?

भावनाओं के बुदबुदों एवं नेक शिष्टाचारों से विदेश नीति का निर्माण नहीं होता। हरसमय विफल हो चुके ध्येयों की वकालत करते रहने तथा एक ओर जर्मनी और इटली-जैसे देशों की निंदा करने और दूसरी ओर ब्रिटिश एवं फ्रांसीसी साम्राज्यवाद को सदाचरण का प्रमाण देने से कोई काम नहीं बनने वाला है।

पिछले कुछ समय से तुम्हें और महात्मा गांधी समेत हर संबंधित व्यक्ति को मैं यह समझाने की कोशिश कर रहा हूं कि हमको अंतरराष्ट्रीय स्थिति का भारत के हित में फायदा उठाना चाहिए। जनता का एक बहुत बड़ा हिस्सा मेरे दृष्टिकोण को पसंद करता है। यहां तक कि ब्रिटेन के भारतीय विद्यार्थियों ने बहुतेरे हस्ताक्षरों वाला दस्तावेज मुझे भेजा है, जिसमें मेरी नीति का समर्थन किया गया है।

तुमने मेरे विरुद्ध सार्वजनिक आंदोलन शुरू कर दिया है, जबकि तुम्हें मेरे स्वास्थ्य की स्थिति के बारे में पता था। तुमने मेरे नाम प्रेषित तार मुझे मिलने के पहले अखबारों में छपवा दिया। कई हलकों से जब मेरे ऊपर अन्यायपूर्ण हमले हो रहे हैं तो तुम उनके विरोध में तथा मेरे प्रति सहानुभूति में एक शब्द नहीं बोलते। किन्तु जब मैं आत्मरक्षा में कुछ कहता हूं तो तुम्हारी यह प्रतिक्रिया होती है कि ऐसी दलीलबाजी वाले बयान निरर्थक हैं। क्या तुमने मेरे राजनीतिक विरोधियों के बयानों के लिए भी ऐसे ही विशेषणों का प्रयोग किया? कदाचित उनकी तो तुम सराहना करते होगे। तुम्हारा यह आरोप बहुत अधिक आपत्तिजनक है कि मैं पक्षपातपूर्ण ढंग से काम कर रहा हूं।

मैं विरोधों के बावजूद भारी बहुमत से निर्वाचित कांग्रेस अध्यक्ष हूं। किन्तु चुनाव-परिणाम को खेल की भावना से स्वीकार नहीं किया गया तथा मेरे विरुद्ध मन में गांठ बांध ली गई और प्रतिशोध की भावना हावी हो गई। तुमने मेरे विरोधी सदस्यों की ओर से जैसे मेरे विरुद्ध शस्त्र उठा लिए।

तुम अकसर यह कहते रहते हो कि तुम अपना ही प्रतिनिधित्व करते हो, अन्य किसी का नहीं तथा तुम्हारा किसी भी पार्टी से संबंध नहीं है। यह बात तुम इस ढंग से कहते हो कि जैसे इस पर तुम बड़ा गर्व या सुख अनुभव कर रहे हो। कभी-कभी तुम अपने को ‘पक्का समाजवादी’ भी कहते हो। मेरी समझ में नहीं आता कि कोई समाजवादी, जैसाकि तुम अपने को मानते हो, व्यक्तिवादी कैसे हो सकता है? दोनों बातें एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं। तुम जिस व्यक्तिवाद के समर्थक हो, उसके जरिए समाजवाद कभी कैसे स्थापित हो सकता है? तुम्हारी यह धारणा बन गई है कि मेरा दोबारा निर्वाचित होना बहुत बुरा हुआ। मेरे विरुद्ध जो लांछन-प्रकरण चला, उसके मुख्य जनक तुम्हीं थे।

बंगाल के बारे में तुम करीब-करीब कुछ नहीं जानते। तुमने अपनी दो वर्षों की पार्टी-अध्यक्षता के दौरान इस प्रांत का कभी दौरा नहीं किया। जबकि इस प्रांत को जिस भयंकर दमन से गुजरना पड़़ा, उसे देखते हुए उसकी ओर दूसरे प्रांतों की अपेक्षा अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी। त्रिपुरी- कांग्रेस के एक सप्ताह बाद ही तुमने मेरे खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया। जबकि तुम्हारा यह कर्तव्य था कि तुम मेरे पक्ष में कुछ बोलते, क्योंकि मैं उस समय बिस्तर पर पड़ा था।

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यूरोप से जो जानकारी मुझे मिलती रही है, उसके आधार पर मैं पिछले छह महीनों से अपने कांग्रेसी मित्रों से कह रहा हूं कि बसंत के समय यूरोप में संकट पैदा होगा, जो गर्मियों तक जारी रहेगा। इसलिए मैं अपनी ओर से यह कदम उठाने पर जोर देता आया हूं कि ब्रिटिश सरकार को पूर्ण स्वराज की मांग करने वाली चुनौती दी जाय। किंतु जब मैंने इसका तुमसे उल्लेख किया तो तुमने ठंडा उत्तर दिया। मैं महसूस करता हूं कि हम या तो अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर गंभीरतापूर्वक विचार करें और अंतरराष्ट्रीय स्थिति का अपने हित में लाभ उठाएं, अन्यथा उसकी बात ही न करें। अगर हम कुछ करना-धरना नहीं चाहते तो खाली दिखावा करना बेकार है। यदि तुमने खुद अपनी बात पर अमल किया होता तो कांग्रेस-राजनीति की दूसरी शक्ल होती।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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