एक धर्मेंद्र प्रधान ही काफी हैं…

वर्ष 2012-13 के दौर में दिल्ली की तख़्तानसीन कांग्रेस के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार घोटाले के आरोपी अपने मंत्रियों के पक्ष में तर्क देकर उनका बचाव करने में लगी थी। नतीजा यह हुआ कि 2014 के चुनाव में वह अपना भी बचाव नहीं कर सकी। तब सत्ता की मदहोशी में सियासत के खिलाड़ी, जनता को अनाड़ी मानने की भारी भूलकर करते रहे। जनता की आह और चाह से बेपरवाह सरकार पूरी निर्लज्जता से लापरवाह तमाशों में लगी रही।
व्याकुल होकर भ्रष्टाचार के विरोध में वयोवृद्ध समाजसेवी अन्ना हजारे दिल्ली के राम लीला मैदान में अनशन पर बैठ गए। पूरा राष्ट्र आंदोलित हो उठा। इसी बीच दिल्ली में पूरे देश को मर्माहत कर देने वाला जघन्य निर्भया कांड हो गया। निर्भया के रूप में अपने बेटी की कल्पना करके पूरा राष्ट्र कांप गया। फिर भी शुरुआत में सरकार हीलाहवाली में लगी रही। सरकार द्वारा अपनी आकांक्षाओं को रौंदे जाने की अथाह पीड़ा लिए जनता, असहाय होकर दिन-रात गुजारती रही। आखिरकार वह मुकाम भी आ गया जब अपनी पीड़ाओं के प्रतिकार में जनता ने उक्त सरकार का दाह-संस्कार कर दिया।
खुलेआम रंगदारी अथवा डकैती रूप स्थापित हो चुकी शिक्षा व्यवस्था में अपने बच्चों को पढ़ा लेने के लिए मध्यमवर्गीय और गरीब माता-पिता द्वारा पाई-पाई जोड़ने या दमड़ी तक बेच देने की अपार व्यथा और वेदना को संवेदनहीन हो चुकी सियासत समझकर भी समझने को तैयार नहीं हैं। ऊपर से प्रतियोगी परीक्षाओं में “लीक” होते प्रश्न-पत्र “कोढ़ में खाज होने” की तरह भावी भारत के मनोबल को खरोचते जा रहे हैं। क्या मंत्री, सांसद या विधायक की औलादों को किसी प्रतियोगी परीक्षा में बैठने की आवश्यकता है? जीवन यापन के लिए मंत्री पुत्र कभी किसी परीक्षा में बैठते हैं क्या?
एक असफल मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को न हटाना सरकार द्वारा जनभावना को कुचल देने का हठ है। जबकि धर्मेंद्र प्रधान द्वारा स्वयं से इस्तीफा न देना राष्ट्र से ऊपर अपनी शुद्ध लिचड़ई, सत्ता-हवस और थेथरई को रखने का घटिया दृश्य है। वर्ष 2012-13 में अपने आरोपी मंत्रियों को बचाने का जो आत्मघाती आचरण तब की गठबंधन सरकार का था वर्तमान की गठबंधन सरकार भी उसी आचरण की ओर मुखातिब है। तब अन्ना हजारे के आंदोलन ने जनता के आक्रोश को ज्वाला में तब्दील किया था अब छात्रों के आक्रोश को दहकता में बदलने के लिए अमेरिका में प्रशिक्षित काक्रोच को भारत में भेजा गया है।

आगे बढ़ता भारत विदेशी ताकतों की आंखों में चुभ रहा है। भारत को नेपाल और बांग्लादेश बनाने के लिए काकरोची नेताओं के पीछे विदेशी फंडिंग का आरोप सही हो सकता है। इसकी गहन जांच होनी ही चाहिए। लेकिन भारतीय छात्रों के संकल्पित मन में परीक्षाओं में गड़बड़ी की आशंकाओं को भरकर भावी भारत की संपूर्ण बुद्धिमता को ही ध्वस्त कर देने के पीछे कौन सी ताकतें हैं? इसकी भी अविलंब जांच राष्ट्र के सुरक्षित भविष्य के लिए बेहद जरूरी है।
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अंत में, वर्तमान केंद्र सरकार के सामने भी 2014 में मनमोहन सरकार के ढह जाने के कारणों का उदाहरण है। उन्हीं उदाहरणों में दर्ज है कि राष्ट्र का संचालन केवल हठ और लठ से नहीं हो सकता है। बात-बात में प्रजातंत्र का पहाड़ा पढ़कर अपने को सबसे बड़ा प्रजातांत्रिक और अम्बेडकरवादी बताने वाले नेताओं को जानना होगा कि बाबा साहेब ने सबसे पहले- “हम भारत के लोग” लिखकर ही संविधान की शुरुआत की है। उनके साथ-साथ प्रजातांत्रिक भारत के समस्त शिल्पकारों के मानस में भारतीय प्रजा ही सर्वोच्च है। कोई धर्मेंद्र प्रधान या चंपत राय नहीं। हिलोरा लेती जनभावनाओं के अथाह समुद्र में बड़े से बड़े बलशाली सिंहासन भी तिनका साबित हो चुके हैं। अपनी सर्वोच्चता नकारने वालों को समय मिलते ही जनता पूर्णतः नकार कर अप्रासंगिक बना देती है। हैसियत में लाकर बियाबान (एकांत) में छोड़ देती है- यह बात भारत के प्रजातांत्रिक इतिहास की किताबों में दर्ज है।
हजार फूल कम हैं एक दुल्हन सजाने के लिए
एक ही फूल काफी है, अर्थी उठाने के लिए।
एक ही प्रधान काफी हैं, सरकार ढहाने के लिए। बहुत कुछ 2012-13 जैसा ही है फर्क सिर्फ इतना है कि वर्तमान सरकार के पास अभी सुधार का समय है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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