जनआंदोलन के आगे फिर झुकी सरकार, CAA-NRC और कृषि कानून के बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तीसरी बड़ी नजीर

Dharmendra Pradhan Resignation

Dharmendra Pradhan Resignation: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का पद से त्यागपत्र देना केवल एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं है, बल्कि यह उस मजबूत राजनीतिक दबाव की कहानी बयां करता है जिसने बीते 12 वर्षों में मोदी सरकार को तीसरी बार अपने सख्त रुख से पीछे हटने पर मजबूर किया। इससे पूर्व, सीएए-एनआरसी (CAA-NRC) के खिलाफ हुए देशव्यापी विरोध और लगभग एक साल तक चले ऐतिहासिक किसान आंदोलन के सामने भी केंद्र सरकार को झुकना पड़ा था। इसके अलावा यदि सामाजिक दबावों की बात करें तो यौन उत्पीड़न के आरोपों के बीच विदेश राज्य मंत्री एम.जे. अकबर का इस्तीफा भी जनदबाव की एक प्रमुख मिसाल रहा है।

विरोध को कमतर आंकना और राजनीतिक कीमत चुकाने का एक जैसा पैटर्न

इन सभी जनआंदोलनों में सत्ता पक्ष की एक समान कार्यशैली नजर आती है। शुरुआती चरण में सरकार विरोध-प्रदर्शनों और जन-असंतोष को हल्के में लेती है, आंदोलन की नैतिक ताकत को स्वीकार करने से बचती है और अपने फैसले पर अडिग रहती है। हालांकि, जब असंतोष इतना बढ़ जाता है कि उसकी राजनीतिक कीमत फैसले को वापस लेने की कीमत से अधिक हो जाती है, तब सरकार अपने कदम पीछे खींचती है। पेपर लीक मामले में नाराज लाखों युवाओं और छात्रों के अनवरत आंदोलन के बाद शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के मामले में भी ठीक यही रणनीति देखने को मिली।

CAA-NRC और किसान आंदोलन, सरकार को बदलना पड़ा फैसला

सीएए और एनआरसी के समय केंद्रीय गृह मंत्री द्वारा देशव्यापी एनआरसी लागू करने की बार-बार घोषणा के बाद जब देश भर में कड़ा विरोध हुआ, तो खुद प्रधानमंत्री को कहना पड़ा कि एनआरसी पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है और यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई। वहीं, तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ जब देश के अन्नदाता एक साल तक सड़कों पर डटे रहे, तो सरकार के सभी रणनीतिक दावे ध्वस्त हो गए। आखिरकार, प्रधानमंत्री ने स्वयं टेलीविजन पर आकर तीनों कानून रद्द करने का ऐलान किया और देश के किसानों से माफी मांगी।

बिना किसी स्थापित चेहरे और संगठन का विकेंद्रित आंदोलन बना युवाओं की ढाल

शिक्षा मंत्रालय और परीक्षा घोटालों के खिलाफ भड़का यह आंदोलन पिछले दो आंदोलनों से इस मायने में अलग रहा कि इसका कोई एक तय चेहरा, पार्टी या स्थापित संगठन नहीं था। यह पूरी तरह से युवाओं द्वारा संचालित, स्वतःस्फूर्त और विकेंद्रित आंदोलन था। पारंपरिक आंदोलनों की तरह सरकार किसी एक नेता या प्रतिनिधि से बातचीत कर इसे समाप्त कराने की स्थिति में नहीं थी, क्योंकि आंदोलन का हर छात्र ही इसका नेतृत्व कर रहा था।

सोशल मीडिया का रचनात्मक इस्तेमाल और बीजेपी के कोर वोटबैंक में सेंध की आशंका

युवाओं ने इस लड़ाई को डिजिटल युग के हथियारों मीम्स, छोटे रचनात्मक वीडियो और व्यंग्य से लड़ा। सोशल मीडिया का यह प्रचार सरकार के आधिकारिक संदेशों पर भारी पड़ा। 20 जुलाई की पुलिसिया कार्रवाई और सोनम वांगचुक के रुख में आई नरमी के बावजूद छात्रों का संघर्ष नहीं रुका। इस आंदोलन ने सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) के भीतर भी चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि सड़कों पर उतरा यह युवा वर्ग मुख्य रूप से मध्यम और निम्न-मध्यम वर्ग से आता है, जो पार्टी का पारंपरिक और मजबूत आधार माना जाता है। अपने ही जनाधार के असंतोष को खारिज करना किसी भी राजनीतिक दल के लिए आसान नहीं होता।

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लोकतांत्रिक संवाद की कमी या भावी राजनीतिक रणनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्र सरकार अपना एजेंडा तय करने में महारत रखती है, लेकिन लंबे समय तक चलने वाले लोकतांत्रिक असंतोष से सीधा संवाद स्थापित करने में कतराती है। जब तक पानी सिर से ऊपर न निकल जाए, तब तक शुरुआती असहमति को गंभीरता से न लेना सरकार का पैटर्न बन चुका है। दूसरी ओर, सरकारी सूत्रों का दावा है कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा युवाओं के गुस्से को शांत करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है और सरकार परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।

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