कामाख्या देवी का वो रहस्यमयी उत्सव, जहां मूर्ति नहीं बल्कि एक शिला की होती है पूजा
Kamakhya Devi Temple: भारत को हमेशा से ही उसकी समृद्ध संस्कृति, बेजोड़ कला और अगाध धार्मिक आस्था के लिए जाना जाता है। खासकर हिंदू धर्म में कई ऐसे चमत्कार और रहस्य हैं, जो आज भी विज्ञान की समझ से परे हैं। देश में कई ऐसे प्राचीन मंदिर हैं, जिनकी अपनी रहस्यमयी कहानियां हैं। ऐसा ही एक परम दिव्य और चमत्कारी स्थान पूर्वोत्तर भारत के असम राज्य में स्थित है, जिसे दुनिया ‘कामाख्या देवी मंदिर’ के नाम से पूजती है। हर साल जून के महीने में यहाँ आस्था, आध्यात्म और अलौकिक रहस्यों का एक अनूठा संगम देखने को मिलता है, जिसे ‘अंबुबाची मेला’ कहा जाता है। आइए जानते हैं इस साल यह मेला कब से शुरू हो रहा है और इससे जुड़ी खास मान्यताएं क्या हैं।
नीलाचल पहाड़ियों पर स्थित मां का अनोखा दरबार
असम के गुवाहाटी में स्थित खूबसूरत नीलाचल पहाड़ियों पर मां कामाख्या का यह पावन धाम स्थापित है। हिंदू पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, देश के सभी 51 शक्तिपीठों में कामाख्या मंदिर का स्थान सबसे सर्वोच्च और विशेष माना गया है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ अन्य मंदिरों की तरह देवी मां की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है। मूर्ति के स्थान पर यहाँ एक प्राकृतिक शिला (चट्टान) की पूजा-अर्चना की जाती है, जिसका आकार स्त्री की योनि के समान है। धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के टुकड़े किए थे, तब उनकी योनि का भाग इसी स्थान पर गिरा था, जिसके बाद यह चमत्कारी शक्तिपीठ अस्तित्व में आया।
अंबुबाची मेला इस शक्तिपीठ पर आयोजित होने वाला सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण पर्व है, जिससे बेहद प्राचीन धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हुई हैं। ऐसा माना जाता है कि इस अवधि के दौरान मां कामाख्या अपने वार्षिक मासिक धर्म (मेंस्ट्रुएशन साइकिल) से गुजरती हैं। यही कारण है कि इस दौरान देवी मां को पूर्ण विश्राम दिया जाता है और मंदिर के मुख्य गर्भगृह के कपाट तीन दिनों के लिए पूरी तरह बंद कर दिए जाते हैं।
इन तीन दिनों में मंदिर परिसर के भीतर किसी भी प्रकार की पूजा, आरती या अन्य धार्मिक गतिविधियां पूरी तरह वर्जित रहती हैं। चौथे दिन मां के शुद्धिकरण की विशेष पूजा और अनुष्ठान के बाद ही मंदिर के कपाट आम श्रद्धालुओं के दर्शन के लिए खोले जाते हैं।
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प्रसाद में मिलता है चमत्कारी अंगवस्त्र
इस मेले से जुड़ी एक और बेहद हैरान करने वाली मान्यता है। कहा जाता है कि जब तीन दिनों के लिए मंदिर के कपाट बंद किए जाते हैं, तब माता की शिला के पास एक सफेद रंग का सूती कपड़ा रखा जाता है। तीन दिन बाद जब कपाट दोबारा खोले जाते हैं, तो वह सफेद वस्त्र पूरी तरह से लाल रंग में बदल जाता है। इसी लाल कपड़े को अंगवस्त्र कहा जाता है, जिसे बाद में वहां आने वाले भक्तों के बीच प्रसाद के रूप में बांटा जाता है। श्रद्धालु इस कपड़े को मां कामाख्या का परम और साक्षात आशीर्वाद मानकर अपने पास सुरक्षित रखते हैं।
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