मशहूर शायर बशीर बद्र का 91 वर्ष की उम्र में निधन, बकरीद के दिन भोपाल में ली अंतिम सांस
Bashir Badr Death: उर्दू शायरी की दुनिया में अपने नरम लहजे, गहरी संवेदनाओं और इंसानी रिश्तों की बेहतरीन तस्वीर पेश करने वाले मशहूर शायर डॉ. बशीर बद्र ने बकरीद के खास दिन इस दुनिया से रुखसत ले ली। उनके निधन से उर्दू अदब की दुनिया गहरे सन्नाटे में डूब गई है। 91 वर्ष की आयु में उन्होंने भोपाल के ईदगाह हिल्स स्थित अपने निवास पर अंतिम सांस ली।
लंबे समय से डिमेंशिया और उम्र संबंधी बीमारियों से थे जूझ रहे
डॉ. बशीर बद्र पिछले काफी समय से डिमेंशिया (स्मृति भ्रंश) और उम्र संबंधी अन्य बीमारियों से जूझ रहे थे। बीमारी के चलते उनकी स्मरण शक्ति लगभग समाप्त हो चुकी थी और वे अपने करीबियों को भी पहचानने में असमर्थ हो गए थे। पिछले कई महीनों से उनकी तबीयत लगातार बिगड़ रही थी और उन्होंने सार्वजनिक जीवन से लगभग दूरी बना ली थी।

ऐसे खास साल में हुआ था जन्म, जब दो बार आया था रमजान
बशीर बद्र का जन्म एक ऐसे साल में हुआ था, जिसे इस्लामी कैलेंडर के लिहाज से बेहद खास माना जाता है। उस वर्ष रमजान का महीना दो बार पड़ा था और बकरीद के मौके पर पूरी दुनिया में मुसलमानों ने खुदा की राह में कुर्बानी पेश की थी।
धार्मिक जानकारों के अनुसार, इस्लामी हिजरी कैलेंडर चंद्रमा की चाल पर आधारित होता है, जबकि अंग्रेजी कैलेंडर सूर्य की गणना के अनुसार चलता है। इसी कारण हर साल इस्लामी महीनों की तारीखें करीब 10 से 11 दिन पहले खिसकती रहती हैं। कुछ दुर्लभ परिस्थितियों में ऐसा होता है कि एक ही अंग्रेजी साल में रमजान दो बार आ जाता है। बशीर बद्र का जन्म ऐसे ही दुर्लभ दौर में हुआ था, जब साल की शुरुआत और अंत – दोनों हिस्सों में रमजान देखने को मिला।
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ग़ज़लें आज भी आम लोगों की जुबान पर जिंदा
बशीर बद्र ने अपनी शायरी में इंसानी रिश्तों, मोहब्बत, दर्द और समाज की बदलती तस्वीर को बेहद खूबसूरती से पेश किया। उनकी ग़ज़लें आज भी अदबी महफिलों से लेकर आम लोगों की जुबान तक में जिंदा हैं। उनके चाहने वालों का उनके निधन पर गहरा शोक है। सोशल मीडिया पर भी उनके प्रशंसक अपनी संवेदनाएं व्यक्त कर रहे हैं और उनकी ग़ज़लें साझा कर रहे हैं।
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