अंतिम संस्कार से पहले क्यों बांधे जाते हैं शव के हाथ-पैर, जानिए गरुड़ पुराण के ये बेहद जरूरी नियम
Garuda Purana: सनातन धर्म में मृत्यु को एक अटल सत्य माना गया है, जिसके बाद किए जाने वाले अंतिम संस्कारों का विशेष महत्व है। प्रसिद्ध ग्रंथ गरुड़ पुराण के प्रेत कल्प के 10वें अध्याय में मौत के बाद के नियमों की विस्तृत व्याख्या मिलती है। आपने अक्सर देखा होगा कि अंतिम यात्रा से पहले शव के हाथ-पैर बांध दिए जाते हैं और नाक-कान में रूई डाल दी जाती है। इस पारंपरिक रीति-रिवाज के पीछे कई गहरे आध्यात्मिक और व्यावहारिक कारण छिपे हैं।
शरीर में आत्मा के दोबारा प्रवेश को रोकना
शास्त्रों के अनुसार, मृत्यु के समय शरीर से निकलने वाली आत्मा का आकार बहुत सूक्ष्म (अंगूठे की पोर जितना) होता है। देह छोड़ने के बाद भी आत्मा का अपने परिवार और भौतिक शरीर से मोह तुरंत भंग नहीं होता। परिजनों को विलाप करते देख व्याकुल आत्मा दोबारा अपने मृत शरीर में प्रवेश करने का प्रयास करती है। मानव शरीर में आँख, कान, नाक, मुँह और मल-मूत्र द्वार सहित कुल नौ प्राकृतिक रास्ते होते हैं। आत्मा इन्हीं द्वारों से वापस भीतर न जा सके, इसीलिए अंगों को बांधकर व रूई लगाकर इन रास्तों को बंद कर दिया जाता है।
नकारात्मक शक्तियों से बेजान देह की सुरक्षा
गरुड़ पुराण के मुताबिक, प्राण निकलने के बाद मानव शरीर पूरी तरह निष्क्रिय और खाली हो जाता है। ऐसे में वातावरण में मौजूद नकारात्मक और आसुरी शक्तियां उस बेजान शरीर पर अधिकार करने की कोशिश करती हैं। यदि शव के प्राकृतिक द्वारों को सुरक्षित न किया जाए, तो इन बुरी ताकतों के प्रवेश का खतरा बढ़ जाता है। इसी वजह से शास्त्रों में अंतिम संस्कार से पहले शव को कभी भी अकेला न छोड़ने का नियम बनाया गया है।
अंगों को सीधा रखना और गंदगी को रोकना
अकड़न से बचाव: वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो मृत्यु के कुछ समय बाद ही शरीर रिगर मॉर्टिस (Rigor Mortis) के कारण अकड़ने लगता है। यदि समय रहते हाथ-पैर सीधे करके न बांधे जाएं, तो अंग टेढ़े-मेढ़े हो सकते हैं, जिससे शव को अर्थी पर लिटाने और श्मशान ले जाने में असुविधा होती है।
शारीरिक स्वच्छता: मृत्यु के पश्चात शरीर की मांसपेशियां पूरी तरह शिथिल हो जाती हैं। ऐसे में शरीर के भीतर की गंदगी बाहर न फैले, इसलिए पैर के अंगूठों को आपस में बांधकर मल-मूत्र मार्ग को अवरुद्ध कर दिया जाता है।
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मुखाग्नि के बाद ही संभव है पूर्ण मुक्ति
जब तक मृत शरीर पूरी तरह से अग्नि में विलीन नहीं हो जाता, तब तक आत्मा का सांसारिक जुड़ाव खत्म नहीं होता और वह वहीं आसपास भटकती रहती है। श्मशान घाट पर जब परिजन पूरे विधि-विधान से मुखाग्नि देते हैं, तब जाकर आत्मा को यह बोध होता है कि अब उसका सांसारिक ठिकाना नष्ट हो चुका है। इसके बाद ही वह अपनी आगे की यात्रा पर प्रस्थान करती है।
यह लेख पूरी तरह से सनातन धर्म के ग्रंथ गरुड़ पुराण की मान्यताओं, आध्यात्मिक विचारों और पारंपरिक रीति-रिवाजों पर आधारित है। इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार के अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं, बल्कि केवल सांस्कृतिक व धार्मिक जानकारी साझा करना है।
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