जब अर्जुन के गांडीव का घमंड तोड़ने के लिए श्रीकृष्ण ने रचा था कजलीवन का अद्भुत स्वांग
Pauranik Katha: द्वापर युग के श्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन को अपने पराक्रम पर सूक्ष्म अहंकार होने लगा था। उनके इस भ्रम को दूर करने और त्रेता युग के परम भक्त हनुमान से उनका मिलन कराने के लिए लीलाधर श्रीकृष्ण ने एक विशेष योजना बनाई। उन्होंने अर्जुन से कजलीवन जाकर पूजा के लिए दुर्लभ पारिजात पुष्प लाने को कहा और साथ ही वहां की मर्यादा बनाए रखने की चेतावनी भी दी। पराक्रम के मद में चूर अर्जुन ने इस चेतावनी को हल्के में लिया और वन की ओर चल पड़े।
कजलीवन की दिव्यता को अनदेखा कर जब अर्जुन ने बिना अनुमति सरोवर से पुष्प तोड़े, तो वहां विश्राम कर रहे महाबली हनुमान जागृत हो गए। हनुमान जी ने जब उन्हें टोकते हुए कहा कि बिना अनुमति वस्तु लेना चोरी है, तो दोनों के बीच विवाद बढ़ गया। बातों-बातों में जब अर्जुन ने श्रीराम के समुद्र सेतु पर सवाल उठाया और दावा किया कि वे अपने बाणों से ऐसा पुल बना सकते थे जो पूरी वानर सेना का भार उठा ले, तो हनुमान जी ने उन्हें चुनौती दे डाली। शर्त तय हुई कि यदि हनुमान जी का पैर पड़ते ही बाणों का पुल टूट गया, तो अर्जुन अग्नि समाधि ले लेंगे।
भगवान ने कच्छप रूप में झेला भार
अर्जुन ने अपने दिव्य कौशल से सरोवर पर एक सुंदर पुल तैयार किया, लेकिन हनुमान जी ने जैसे ही अपना विराट रूप धरकर उस पर पैर रखा, वह पुल छिन्न-भिन्न हो गया। अपनी पराजय देख दुखी अर्जुन जैसे ही चिता सजाकर अग्नि में कूदने लगे, वहां श्रीकृष्ण एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने कहा कि बिना किसी गवाह के यह प्रतियोगिता अधूरी है, इसलिए पुल दोबारा बनाया जाए। इस बार अर्जुन ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी, उधर ब्राह्मण रूपी श्रीकृष्ण ने चुपके से सरोवर के भीतर कच्छप (कछुआ) का रूप धारण कर पुल को अपनी पीठ पर थाम लिया।
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हनुमान जी के बार-बार प्रहार करने के बाद भी जब पुल नहीं टूटा, तो उन्होंने नीचे देखा। सरोवर का पानी भगवान के रक्त से लाल हो रहा था। यह देखते ही कि उनके आराध्य स्वयं कष्ट सह रहे हैं, हनुमान जी रोते हुए प्रभु के चरणों में गिर पड़े। उसी क्षण श्रीकृष्ण अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। अर्जुन भी यह देखकर थर-थरा उठे कि उनका पुल उनकी विद्या से नहीं, बल्कि ईश्वर की कृपा से टिका था। श्रीकृष्ण ने दोनों को गले लगाया और समझाया कि त्रेता में पत्थरों का सेतु भक्ति के बल पर तैरा था, न कि किसी भौतिक शक्ति से। इस तरह अर्जुन का अहंकार चूर हुआ और कजलीवन दो युगों के महामिलन का साक्षी बना।
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