काल कवलित होती कहावतें और बदलता समाज

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राममूर्ति मिश्र
राममूर्ति मिश्र

आधुनिकता के रंग में रंगते लोगों ने हमारे समाज से बहुत कुछ छीन रहा है। समानता के अधिकार की आड़ में छोटे—बड़े के लिहाज और सम्मान कब गायब हो गया पता ही नहीं चला। पहले का समाज जिन चीजों को गलत मानता था आज का समाज उसे सही ठहराने में लगा हुआ है। इसका विरोध करने वालों को दकियानूसी विचारधारा कह कर नकार दिया जाता है। एक दौर था जब अपराधियों का सामाजिक बहिष्कार किया जाता था। लेकिन बदलते परिवेश ने पूरे समाज का अपराधीकरण कर दिया है। अब लोग अपराधियों का बहिष्कार करने की जगह अपराध करने से भी नहीं हिचकते। पहले लोगों को सीखने और उन पर कटाक्ष करने के लिए कहावतें काफी प्रचलित थीं। लेकिन ये कहावतें समय के हिसाब से कब कालखंड में समा गई इसका पता ही नहीं चला।

हमारी कहावतें काम करने के तौर—तरीकों, सामाजिक बुराइयों और सामाजिक समरस्ता से हमें अवगत कराती थीं। ‘जैसे पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय।’ इसका मतलब होता था कि बेटा अगर नालायक है तो धन एकत्रित करने की कोई आवश्यकता नहीं है। क्योंकि वह धन को सुरक्षित रखने की जगह उसका दुरुपयोग करेगा, जिससे धन तो नष्ट होगा साथ ही परिवार व कुल भी कलंकित होगा। वहीं यह भी कहा गया है कि अगर बेटा लायक है तो भी धन एकत्रित करने की कोई जरूरत नहीं। क्योंकि वह धन कमा लेगा। इस कहावत का दूरगामी भाव था कि व्यक्ति को लालच नहीं करना चाहिए। धन के पीछे भी नहीं दौड़ना चाहिए। क्योंकि अधिक धन कमाने की पिपासा में ही इंसान जाने—अनजाने अपराध के दलदल में फंस जाता है।

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इसी तरह शादी विवाह के लिए यह कहावत भी काफी प्रचलित थी कि ‘घर देखों पिछवारे से, दुल्हन देखों सारे से।’ शादी—ब्याह न सिर्फ दो लोगों का मिलन होता है, बल्कि दो परिवारों का भी मिलन है। ऐसे में यह कहावत एक—दूसरे को जानने और समझने के लिए कहा गया था। लेकिन बदलते परिवेश ने इसे एकदम बदल दिया है। अपने हक और अधिकार के नाम पर माता—पिता से उनका हक और अधिकार हम कब छीन बैठे इसका पता ही नहीं चला। इस कहावत का मतलब था कि किसी का घर देखना हो तो उसे पीछे से देखा जाए और लड़की को उसकी भाई की शक्ल देखकर पसंद किया जाए। आज के दौर में इस कहावत का कोई औचित्य नहीं रह गया है। क्योंकि घरों को पीछे से बनवाने की जगह आगे से व एक साथ बनाने का क्रम चल पड़ा है। घर का दुआरा गायब हो गया। बाउंड्री और गेट के अंदर लोग सीमित हो गए।

वहीं शादी—ब्याह में भी माता—पिता की रजामंदी का कोई मतलब नहीं रह गया है। बच्चे लड़की दिखाई की परंपरा से आगे निकल कर अपना रिश्ता खुद चुनने लगे हैं। उनके सामने माता—पिता का अधिकार और सम्मान कोई मायने नहीं रखता। जातियों का भी भेद लगभग खत्म सा हो गया है। अंतरजातीयों में विवाह अब स्टेटस होते जा रहे हैं। मजे की बात यह है कि हमारे हाथ से सब कुछ निकलता जा रहा है और हम आधुनिकता का चोला ओढ़कर इस बात पर इतरा रहे हैं कि हमारे बच्चे कितना आगे निकल चुके हैं। बच्चो के छोटे—छोटे फैसलों को हम नजरंदाज करके उन्हें बड़े फैसले लेने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। इसी का नतीजा है कि बच्चे मां—बाप के दुख—दर्द को समझने की जगह उनसे दूरी बनाकर रहना पसंद करने लगे हैं।

माता—पिता को अपनी इस गलती का अहसास तब होता है जब बच्चे बिना उनसे पूछे अलग रहने का फैसला कर लेते हैं। बीमार पड़ने पर अस्पताल ले जाने की जगह फोन से हालचाल लेते हैं। सबसे बुरा वक्त तब आता है जब वह असहाय स्थिति में होते हैं तो उन्हें बिना पूछे वृद्धाश्रम में छोड़ दिया जाता है। अधिकतर लोग बच्चों की इस हरकत पर उन्हें कोसते रहते हैं, जबकि सच यह है कि ऐसी स्थिति के लिए वह खुद ही जिम्मेदार है। इसलिए समय है चेत जाइए और बच्चों को पढ़ाई के साथ—साथ संस्कार भी दीजिए। क्योंकि संस्कार विहीन परिवार से बेहतर समाज की उम्मीद बेमानी है।

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