काशी के संस्कृति संसद 2021 का उद्घोष, कैलाश से कन्याकुमारी तक का भारत हमारा

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नवीन कुमार पांडेय

अब केवल कश्मीर से नहीं, पवित्र कैलाश से कन्या कुमारी तक का भूभाग भारत है। इस भूभाग में सनातन तीर्थों तक आवागमन में कोई बाधा नहीं स्वीकार्य है। काशी में तीन दिनों तक चले संस्कृति संसद के आखिरी सत्र में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव यह आया है। प्रख्यात चिंतक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ मार्गदर्शक डॉ. इंद्रेश कुमार ने स्वयं संसद के संकल्प सामने रखे तथा रुद्राक्ष सभागार में उपस्थित जनसमूह को संकल्प भी उन्होंने कराया। अयोजन के सूत्रधार अखिल भारतीय संत समिति और श्री गंगामहासभा के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानंद सरस्वती के इस महाभियान को आज इंद्रेश ने एक जनांदोलन का स्वरूप प्रदान किया।

रुद्राक्ष सभागार में आयोजित तीन दिवसीय संस्कृति संसद के समापन सत्र में सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया गया कि भविष्य में कैलाश से कन्याकुमारी तक का भारत हमारा होगा और उसे चीन से मुक्त कराएंगे। इसी क्रम में समान नागरिक संहिता जनसंख्या नियंत्रण, अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक भेद के समापन, पूजा-स्थलों को प्राचीन मूल स्थिति में करने, फिल्मों में मान्यता एवं विश्वास विरोधी प्रस्तुति रोकने सम्बंधी कानून बनाने, चीनी वस्तुओं का बहिष्कार एवं स्वदेशी अपनाने, गंगा को अविरल एवं निर्मल बनाए रखने, पर्यावरण की रक्षा के लिए पौधारोपण एवं सनातन संस्कृति के अनुसार जीवन जीने सम्बंधी प्रस्ताव सर्वसम्मति से स्वीकार हुए। ये प्रस्ताव गंगा महासभा के संरक्षक एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य इंद्रेश कुमार द्वारा प्रस्तुत किए गए।

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समापन सत्र के अध्यक्ष एवं जगद्गुरु रामानन्दाचार्य रामराजेश्वाराचार्य ने कहा कि काशी सनातन संस्कृति का केन्द्र है और हमारी संस्कृति की रक्षक है। यहां आयोजित संस्कृति संसद की चर्चा महत्वपूर्ण रही और जबतक ‘ओम’ का प्रवाह जारी है तब तक हिन्दू संस्कृति का प्रवाह जारी रहेगा। उन्होंने कहा कि हमें निजी जीवन में हिन्दू मान्यता एवं संस्कृति का पालन करना चाहिए। यही इस आयोजन का संदेश है। इस संसद में सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय कुलपति प्रो. हरेराम त्रिपाठी, गंगा महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष प्रेमस्वरुप पाठक, श्रीकाशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी, राज्यसभा सांसद रुपा गाङ्गुली, कार्यक्रम की उपाध्यक्षा और राष्ट्रीय रक्षा जागरण मंच की राष्ट्रीय महामंत्री रेशमा सिंह जी और भारत संस्कृति न्यास के अध्यक्ष तथा संस्कृति पर्व के संपादक संजय तिवारी की उपस्थिति रही। अंतिम सत्र का संचालन गंगा महासभा और अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महामंत्री स्वामी जीतेन्द्रानन्द सरस्वती ने किया।

 

वास्तव में यह काशी का विश्वघोष है जिसमें सनातन मूल्यों की अवधारणा से विश्व लाभान्वित होगा। जिन लोगों को अब दुनिया समझ में आ रही है उनको भारत और भारतीयता भी समझ में आने लगी है। वे इस तथ्य को बखूबी समझाने लगे है कि अगर भारतीयता, जिसे भारत की संस्कृति कहा जाता है, यदि उसको अंगीकार नहीं किया गया तो दुनिया नष्ट हो जायेगी। संघर्षों और युद्धों से किसी का भला नहीं होने वाला। युद्ध न तो कभी विकल्प था और न कभी हो सकता है, लेकिन इसका यह भी तात्पर्य नहीं कि अनैतिकता और अधार्मिकता को बढ़ने दिया जाय और हम तमाशबीन बने रहे। ऐसा नहीं है, क्योंकि हमारी संस्कृति इस बात की भी संरचना करती है कि जब आसुरी वृत्तियां बढ़ें, तो उनसे निपटना कैसे है? त्रेता और द्वापर के सबसे बड़े युद्ध सनातन के ही नायकों ने लड़ा और धर्म की स्थापना की। आज से पांच हज़ार साल पहले जब समाज और सत्ता अधर्म के मार्ग पर चल रहे थे, अनैतिकता इतनी बढ़ चुकी थी, कि राजपरिवार के एक पक्ष के लोग अपने ही परिवार के दूसरे पक्ष की बहू के शरीर से उसका वस्त्र भरी सभा में उतार रहे थे, तब उस युग के महानायक को युद्ध ही विकल्प दिखा। तब उसने ऐसा युद्ध कराया कि वह अनैतिक सभ्यता सदा के लिए ही ख़त्म हो गयी और नए सिरे से न्याय का शासन स्थापित हुआ।

संस्कृति पर प्रहार करने वाली फिल्मों का करें बहिष्कार: गजेंद्र चौहान

हिन्दू धर्म एवं संस्कृति को हानि पहुंचाने के लिए बनाई जा रही फिल्में एक योजना का भाग है। इन फिल्मों का बहिष्कार करके हमें अपना विरोध जताना होगा तथा फिल्मों पर आर्थिक चोट पहुंचानी होगी। उक्त विचार फिल्म अभिनेता गजेन्द्र चौहान ने ‘कला-संस्कृति के आवरण में परोसी जा रही विकृति’ विषयक सत्र में व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि जैसे फिल्मों में ब्राह्मण को नौकर तथा राजपूतों को हमेशा शराबी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यह भारतीय संस्कृति को विकृत करने का प्रयास है। फिल्म जगत में जो हिन्दू धर्म पर प्रहार कर रहे हैं, उन्हें रोकने के लिए हमें उनकी ऐसी फिल्मों को नकारना है और ऐसी फिल्मों को देखना नहीं है। जो पैसे हम हिन्दू संस्कृति विरोधी फिल्मों को देखने में बर्बाद कर रहे हैं, उस पैसों को हम गरीबों में दान कर दे तो वह हमारे लिए ज्यादा बेहतर रहेगा।

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प्रसिद्ध ठुमरी गायिका मालिनी अवस्थी ने लोकगीतों की विकृति पर चर्चा करते हुए कहा कि फिल्म जगत जिस अश्लीलता का उपयोग कर रहा है, वह केवल पैसा कमाने का माध्यम है। वह लोकगीतों को केवल एक व्यापार के तौर पर प्रस्तुत कर रहे है। पुराने फिल्मी गीतों में ऐसी विकृति नहीं थी। आज की फिल्मों में आइटम सॉन्ग यानी उत्पाद के रूप में गानों को प्रस्तुत किया जा रहा है, जोकि हमारी संस्कृति के लिए ठीक नहीं है। जिस प्रकार अन्य देश अपने राष्ट्र की तुलना किसी और से नहीं करते हैं, उसी प्रकार हमें भी अपने देश की तुलना किसी से भी नहीं करनी चाहिए। हमारी संस्कृति खुद में ही संपूर्ण है। उन्होंने कहा कि अभिव्यक्ति का मतलब विकृति बिल्कुल भी नहीं है। उन्होंने भोजपुरी फिल्मी गानों में परोसी जा रही अश्लीलता की निंदा करते हुए कहा कि उसका युवा पीढ़ी पर बुरा प्रभाव पड़ रह है, इसे रोका जाना चाहिए।

सांसद रूपा गांगुली ने कहा कि हिंदू धर्म से हमने भाषा सीखी है और उसका सदुपयोग भी। हमारी भाषा और धर्म-संस्कृति पर प्रहार करने वाली फिल्मों का हमें खुलकर विरोध करना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि जिस प्रकार नवदुर्गा का रूप एक परंतु स्वरूप अनेक होते हैं, उसी प्रकार हमारी संस्कृति भी एक है परंतु उसके कई स्वरूप है।

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फिल्म निर्देशक दिलीप सूद ने कहा कि यदि हमें अश्लील एवं हिन्दू संस्कृति विरोधी फिल्मों का विरोध करना है तो सबसे पहले हमें युवाओं को शिक्षित करना होगा तथा उन्हें संस्कृति व धर्म के बारे में जानकारी देनी होगी। यह इसलिए कि हमारे देश की ज्यादातर आबादी युवाओं की है। यदि युवा ही अपनी संस्कृति से अनजान रहेंगे तो हमारे धर्म एवं संस्कृति पर प्रहार होता रहेगा। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार अन्य देश अपनी फिल्मों में अपनी संस्कृति को दिखाना नहीं भूलते हैं उसी प्रकार हमें भी अपने देश की फिल्मों में अपनी संस्कृति को उजागर करना चाहिए। सत्र का संचालन डीडी न्यूज़ के संपादक अशोक श्रीवास्तव ने किया।

समाज और शिक्षा की बुनियाद हैं मंदिर: महाराजा आदित्य वर्मा

केरल के पद्मनाभ मंदिर के अध्यक्ष महाराज आदित्य वर्मा ने कहा कि मंदिरों द्वारा कई धर्मकार्य करने वाले ट्रस्टों में दान किए जाते हैं। मंदिरों द्वारा कई स्कूल, कॉलेज और हॉस्पिटल आदि का निर्माण एवं संचालन कराए जाते हैं। इससे समाज में मंदिरों की उपयोगिता बढ़ जाती है। मंदिरों से समाज के कमजोर वर्ग को आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सुदृढ़ बढ़ने का अवसर प्राप्त होता है। उक्त विचार उन्होंने ‘मंदिर सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक गतिविधि के केंद्र कैसे बनें?’ विषयक दूसरे सत्र में व्यक्त किए कोरोना काल से पहले उनके मंदिर में लगभग दो से तीन लाख प्रतिदिन चढ़ावा चढ़ता था, परंतु कोरोना काल के बाद यह घटकर एक लाख प्रतिदिन रह गया है जिससे इन धर्मार्थ कार्यों को करने में कठिनाई आ रही है, फिर भी अपनी संस्कृति की रक्षा हेतु वह निरंतर कार्यरत रहते हैं। आगे उन्होंने पद्मनाभम मंदिर के अदभुत इतिहास का भी वर्णन किया।

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श्रीलाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के पूर्व कुलपति प्रो. आरके पांडे ने कहा कि भारत की संस्कृति जहां तक फैली हुई है भारत वहां तक है। उन्होंने बताया कि हमारे पूर्वजों द्वारा स्थापित मार्ग जिससे मंदिरों के अनेक सामाजिक एवं आर्थिक गतिविधियां जुड़ी हुई है। मंदिर में चढ़ाए जाने वाले दान से अनेक प्रकार के धर्मार्थ कार्य किए जाते हैं। कामगारों, शिल्पकारों, फल विक्रेता एवं पूजन सामग्री के विक्रेताओं को जीवन यापन करने में मंदिर सहायता प्रदान करते हैं। उन्होंने समाज में मंदिरों की भूमिका को बहुत ही अहम माना है। उनका कहना है कि राष्ट्र के विकास में मंदिर द्वारा किए जाने वाले धर्मार्थ कार्य हमारे संस्कृति को मजबूत करने का कार्य करते हैं।

महाराज रविंद्रपुरी ने बताया कि भारत की आत्मा मंदिरों में बसती है। समाज में मंदिरों के विभिन्न स्वरूपों को प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा कि मंदिर अनेक धर्मार्थ कार्य में अपना योगदान निरंतर देते आ रहे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था में करीब साढ़े चार लाख करोड़ का योगदान मंदिरों द्वारा दिया जाता है। मंदिरों के आसपास प्रांगण में लगने वाले दुकानों जिसमें फल विक्रेता, फूल विक्रेता, अगरबत्ती एवं अन्य पूजन सामग्री के विक्रेता को आर्थिक रूप से मदद मिलती है, जिससे समाज में उन्हें जीवन व्यतीत करने में मदद मिलती है। सत्र का संचालन प्रमोद यादव के किया।

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मंदिरों का प्रबंधन स्वतंत्र हो: आलोक कुमार

हमारे मंदिरों में पहले गुरुकुल चलते थे। गुरुकुल के साथ गौशाला, शादी तथा मुत्युभोज जैसे कार्यक्रम भी मंदिरों में ही किए जाते थे। हिंदुओं में सांस्कृतिक, साहित्यिक कार्यक्रम एक जीवंत कार्य था, जिसे मंदिरों में ही किया जाता था। यह भी बताया कि पहले की सरकार मंदिरों से केवल तीन प्रतिशत का हिस्सा ही लिया जाता था परंतु तत्काल में यह 18 प्रतिशत तक बढ़ा दिया गया है। उक्त विचार विश्व हिंदू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने तीसरे सत्र ‘हिन्दू मन्दिरों का प्रबन्धन हिन्दुओं के द्वारा एवं भारत के प्रत्येक सम्प्रदाय को शिक्षण एवं सांस्कृतिक संस्थानों के संचालन की स्वतन्त्रता’ में व्यक्त किया।

हिंदू मंदिरों के प्रबंधन व स्वतंत्र संचालन की मांग करते हुए कहा कि 2024 से पहले सभी मंदिरों को वापस कर दिया जाए, यह हमारा लक्ष्य है। स्वतंत्र शिक्षा के बारे में बात करते हुए कहा कि जिस प्रकार अन्य धर्मों में उनकी शिक्षा को महत्व दिया जाता है, उसी प्रकार हमें भी स्वतंत्र रूप से गुरुकुल चलाने की अनुमति मिलनी चाहिए ताकि हमारे देश के युवा व अन्य लोगों को संस्कृत तथा धर्म का ज्ञान हो। ईसाई पद्धति से जन्मदिन आदि को भी रोकने का प्रयास होना चाहिए।

प्रो. रामचंद्र पांडेय ने कहा कि नई पीढ़ी मंदिरों से जुड़ा, यह सुखद है। युवाओं को उन्हें यह बताना चाहिए कि सदाचार और चरित्र की शिक्षा सबसे आवश्यक है। हिन्दू संस्कृति में पहले 16 संस्कार जैसे मुंडन व जनेऊ आदि कई संस्कार मंदिरों में ही होते थे। ऐसे कार्यों से देवालय की महत्ता व प्रतिष्ठा होती थी जो अब घटती जा रही है। इस पतन को रोककर हमें पुनः प्रतिस्थापित करना है।

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काशी विद्वत परिषद के महामंत्री राम नारायण द्विवेदी ने कहा कि किसी भी मंदिर में हिंदू जब दान देता है तो वह यह सोच कर देता है कि वह किसी अच्छे कार्य में, किसी की मदद करने के लिए उपयोग होगा परंतु बड़े-बड़े मंदिरों के धन को अन्य कार्यों में उपयोग किया जाता है। दोनों का सदुपयोग किसी भी प्रकार से नहीं हो रहा है। इस विषय को उन्होंने चिंतनीय बताते हुए इस व्यवस्था को बदलने का आश्वासन दिया। काशी के मंदिरों पर चर्चा करते हुए उन्होंने बताया कि काशी में ऐसे 70 मंदिर हैं, जो सड़क के किनारे हैं। उन पर जल चढ़ाने वाला कोई नहीं है, उनकी पूजा करने वाला कोई नहीं है। अगर हम सब मिलकर उन 70 मंदिरों को प्रतिष्ठापित और प्रतिदिन उनकी पूजा करें तो उन मंदिरों का भी कायाकल्प हो सकता है। स्वामी रवींद्रपुरी महाराज और स्वामी अविचलदास ने भी इस विषय पर अपना मत रखा। सत्र का संचालन विश्व हिंदू परिषद के अशोक तिवारी ने किया।

भारत की प्रतिष्ठा संस्कृत एवं संस्कृति से है: प्रताप चंद्र षडंगी

भारत की प्रतिष्ठा संस्कृत एवं संस्कृति से है। युवा दो प्रकार के होते हैं, एक पक्ष जहां समायोजन, पुनर्जागरण, लोगों को जोड़ने का कार्य करता है तो दूसरा पक्ष विभाजन की सोच रखकर राष्ट्र को दूषित कर रहा है। उक्त विचार लोस सदस्य प्रताप चंद्र षड़ंगी ने चौथे सत्र ‘सशक्त राष्ट्र के निर्माण में युवाओं की भूमिका’ में व्यक्त किया।

उन्होंने भारतीय शिक्षा पद्धति में वर्ष 2020 में हुए बदलाव को राष्ट्र के लिए उपयोगी माना है। उन्होंने कहा कि भारत में लगभग 1/3 युवा स्कूल की शिक्षा, वही लगभग दो-तिहाई युवा अपनी स्नातक की शिक्षा नहीं पूरी कर पाते हैं, जो राष्ट्रहित में चिंता का विषय है।

उन्होंने उपनिषद में लिखी एक कहानी का वर्णन करते हुए कहा कि सिंह जो मानव के साथ अपना जीवन व्यतीत कर रहा था, वह अपनी गर्जना भूल चुका था परंतु उसे याद दिलाने पर उसने अपनी गर्जना से हिमालय को हिला दिया। इसी प्रकार हमारे राष्ट्र के युवाओं को भी उनकी संस्कृति का सम्मान करने के लिए हमें प्रेरित करना होगा। उन्होने देश के युवाओं की तुलना वीर सावरकर, श्यामा प्रसाद मुखर्जी एवं स्वामी विवेकानंद से की।

सरदार इकबाल सिंह ने कहा कि राष्ट्र के पुनर्निर्माण के लिए हर भारतीय को गुरु गोविंद सिंह बनना होगा। उन्होंने बताया कि पंजाब में वर्ष 1949 में लगभग 90 प्रतिशत आबादी साक्षर थी जिसे कुछ पैसे के बदले लोगों को किताबें जलाने पर मजबूर किया गया। हमारी संस्कृति एवं युवाओं की शिक्षा पद्धति पर गहरी चोट की गई। उन्होंने बताया कि नई शिक्षा नीति में युवाओं को शिक्षा उनकी मातृभाषा में दी जाएगी जिससे वह अधिक सहायता से चीजों को समझ सकेंगे। बाहरी देशों का उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि वहां विद्यालय में पढ़ाई के साथ-साथ कार्य करने की योजना भी सिखाई जाती है, जिससे युवा आत्मनिर्भरता के साथ-साथ प्रयोग विज्ञान भी अर्जित करता है। उन्होंने कहा कि शिक्षा नीति में समय-समय पर बदलाव होने अति आवश्यक है। राष्ट्रीय निर्माण में युवाओं के साथ-साथ सरकार की योजनाओं को भी महत्वपूर्ण माना है। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों में बदलाव से ही युवा और सशक्त बनेगा जिससे एक सुदृढ़ राष्ट्र का निर्माण हो सकेगा। सत्र का संचालन भक्ति किरण शास्त्री ने किया।

वेदों के मंत्रों के अर्थ को कम्युनिस्टों ने विकृत किया: आचार्य विनय झा

भारतीय वेदों के बारे में कई पुस्तकें लिखी गईं, परंतु किसी भी पुस्तक में वेद की मूल अथों में चर्चा नहीं की गई। विदेशियों द्वारा अपने हिसाब से इतिहास लिखा गया। भारत अपने आप में सम्पूर्ण राष्ट्र के समान है। उक्त बातें आचार्य विनय झा ने पांचवें सत्र ‘छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारतीय इतिहास के साथ कम्युनिस्टों के षड्यंत्र’ में व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि इतिहास से छेड़छाड़ किया गया है। संसार की सभी तकनीकें पहले भारत में ही विकसित हुईं, जिसे यूरोपीय लोग यहां खरीदने आते थे। हमारी गुलामी का सबसे बड़ा कारण हमारे शासक ही थे, जो खुद को इस देश का ही नहीं मानते थे। उन्होंने कहा कि किसी भी देश पर कब्जा करने के लिए वहां के लोगों की बुद्धि पर कब्जा करना ही वामपंथी संगठनों का मुख्य कार्य है। वेदों के मंत्र के अर्थ कुछ और हैं, लेकिन हमें बताया कुछ और ही जाता है। आज के दौर में सोशल मीडिया भी वामपंथी विचारधाराओं के प्रसार में अहम भूमिका निभा रही है। इसी सत्र में प्रो. सीपी सिंह और कोनरॉड एल्स्ट ने भी अपने विचार व्यक्त किए। सत्र का संचालन मधुसूदन उपाध्याय ने किया।

शिक्षण संस्थान दें मूल्य आधारित शिक्षा: डॉ. मनु वोरा

बच्चों के प्रश्नों को कभी दबाना नहीं चाहिए, उनको प्रश्न करने की पूरी छूट देनी चाहिए। भारत में सभी शिक्षण संस्थानों को, सभी छात्रों को मूल्य आधारित शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। उक्त विचार तीसरे दिन के छठे सत्र में ‘राष्ट्रीय शिक्षा नीति एवं परंपरागत भारतीय शिक्षा’ विषय पर शिक्षाविद डॉ. मनु वोरा ने व्यक्त किया।राष्ट्र निर्माण में छात्रों व संकायों की सामुदायिक सेवा से मिलेगी मदद। प्रभावी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के कार्यान्वयन के लिए गहन मंथन की आवश्यकता होगी, केवल अनुपालन पर नहीं, उत्कृष्टता पर ध्यान दें। पहले शिक्षार्थियों और छात्रों को कक्षाओं में संलग्न करना महत्वपूर्ण है, संकाय उत्कृष्टता प्राप्त करने से प्रभावी ज्ञान हस्तांतरण होता है। मनु वोरा ने कहा कि श्रेष्ठ शिक्षा के लिए सतत मूल्यांकन आवश्यक है।

इसी क्रम में दूसरे वक्ता के तौर पर जेएस राजपूत ने वेब माध्यम से कहा कि जब तक इस देश में सरकारी और निजी स्कूल ठीक नहीं होंगे तब तक कोई भी छात्र का कौशल विकास नहीं हो सकता और न ही देश विश्वगुरु नहीं बन सकता। आगे उन्होंने कहा कि वर्तमान समय मे शिक्षा में सुधार की बहुत आवश्यकता है। हमारे देश मे बहुत अच्छे अच्छे शैक्षणिक संस्थान होते हुए भी शिक्षा के स्तर में कोई बेहतर बदलाव नहीं दिखता, इस पर हमें चिंतन की आवश्यकता है।

उन्होंने नई शिक्षा नीति की बात करते हुए कहा कि इस शिक्षा नीति में अध्यापकों के कौशल पर भी ध्यान दिया गया है। शिक्षकों को ये बात समझना होगा और उनकी यह जिम्मेदारी बच्चों में प्रश्न पूछने की जागरूकता को बढ़ाना है। उन्हें कभी प्रश्न करने से न रोकना चाहिए, बल्कि प्रोत्साहित करना चाहिए। आगे उन्होंने कहा कि हर एक बालक के अंदर एक व्यक्ति होता है, उसे व्यक्तित्व में परिवर्तित करना शिक्षक की जिम्मेदारी है। चरित्र का निर्माण करके ही हम राष्ट्र का निर्माण कर सकते है। हमें अपनी जड़ों के साथ जुड़े रहते हुए बच्चो को शिक्षा देनी है और उसके साथ साथ जो नई तकनीकी है उससे भी बच्चों को जोड़कर रखना है। सत्र का संचालन शालिनी वर्मा ने किया।

भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण हेतु तीर्थों का नामकरण आवश्यक: प्रो. ओमप्रकाश सिंह

भारत के पुनर्जागरण के लिए अतीत की गौरवशाली परम्परा का बोध आवश्यक है। इसके लिए यह आवश्यक है कि वर्तमान समय में जो भी महत्वपूर्ण नगर एवं राजधानियां हैं, जिनका नामकरण विदेशी आक्रांताओं के समय विकृत किया गया था, उसके स्थान पर अतीत के समृद्धशाली नाम की पुनः स्थापना की जाए। यह देश की राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लिए आवश्यक है जिसका प्राचीन नाम इंद्रप्रस्थ है। यह विचार ‘भारत का सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ विषयक सत्र में वक्ताओं ने व्यक्त किए।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के इतिहास पर चर्चा करते हुए वक्ता नीरा मिश्रा ने कहा कि हमारी राजधानी का अस्तित्व अतीत से जुड़ा है। उन्होंने कहा कि 1887 एवं 1913 के दौरान अंग्रेजी शासन द्वारा प्रेषित रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में दिल्ली का वास्तविक नाम इंद्रप्रस्थ था। उन्होंने कहा कि इन्द्रप्रस्थ का इतिहास लगभग 3000 ईसा पूर्व का है। इसके साक्ष्य लगभग 600 वर्षों तक चले मुगल शासन के दस्तावेजों में भी मौजूद हैं एवं 1926 के एक रिपोर्ट के अनुसार इंद्रप्रस्थ के भीतर पांडव किला का अस्तित्व भी मिलता है। उसे वर्तमान में पुराना किला कहा जा रहा है। उन्होंने कहा कि हमें अपने इतिहास पर गर्व करना चाहिए तथा उसके प्रचार-प्रसार का दायित्व युवाओं का है। भौगोलिक आंकड़ों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इंद्रप्रस्थ के साथ हमारे इतिहास की जड़ें भी विलुप्त होती जा रही हैं। उन्होंने कहा कि इंद्रप्रस्थ के अंदर श्रीकृष्ण की एक भव्य मूर्ति स्थापित की जाए और सेंट्रल विस्टा का नाम बदलकर इंद्रप्रस्थ राजपथ किया जाना चाहिए।

प्रो. ओमप्रकाश सिंह ने कहा कि संस्कृति की जड़ें अतीत में बसती हैं और अपनी जड़ों से जुड़ने की इच्छा सभी में होती है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण हेतु गुलामी के दिनों में विकृत किए गए स्थानों एवं तीर्थों का प्राचीन नामकरण आवश्यक है। उन्होंने वर्तमान दिल्ली पर चर्चा करते हुए कहा कि इसका पुराना नाम इंद्रप्रस्थ है। इंद्रप्रस्थ का इतिहास हिरण्यकश्यप की मृत्यु के पश्चात शुरू हुआ। हिरण्यकश्यप की मृत्यु के बाद भगवान विष्णु ने इंद्र से यमुना के किनारे खाण्डव वन (वर्तमान दिल्ली) में रत्नों का यज्ञ करने के लिए कहा।

संस्कृत में प्रस्थ का अर्थ ‘रत्न का ढेर’ होता है। इंद्र ने यमुना के किनारे खाण्डव वन में रत्नों का यज्ञ किया, तभी से इस स्थान का नाम इंद्रप्रस्थ हुआ। पुराणों के अनुसार इंद्रप्र्रस्थ एक तीर्थ है, इसका विस्तार यमुना के किनारे पुरब से पश्चिम एक योजन तथा उत्तर से दक्षिण चार योजन है। इस इन्द्रप्रस्थ में विष्णु एवं लक्ष्मी, तथा शिव व पार्वती निवास करते हैं साथ ही द्वारिका, काशी, प्रयाग, अयोध्या आदि तीर्थों की भी स्थापना इंद्र्रप्रस्थ में की गई थी। इस तरह इंद्रप्रस्थ एक तीर्थ है और दिल्ली का नामकरण इंद्रप्रस्थ होने से इसे अतीत का गौरव प्राप्त हो सकेगा। भारतीय संस्कृति पर हुए आक्रमणों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इंद्रप्रस्थ में मजारें बनवाई गई, जहां यज्ञशाला हुआ करते थे। पुनर्जागरण के लिए इंद्रप्रस्थ की पुनस्र्थापना आवश्यक है।

प्रो. विनय कुमार पांडेय ने कहा कि मूल्यों को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि भौतिक सत्यापन करते हुए दिल्ली का नाम इंद्रप्रस्थ हो जाना चाहिए। भारतीय वास्तुशास्त्र उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि इंद्रप्रस्थ इंद्र द्वारा बसाई गई है, जिसमें वास्तुशास्त्र का उपयोग अवश्य ही होगा। प्रो. पांडेय ने कहा कि कोई भी संस्कृति जिसका लक्ष्य निर्धारित ना हो, ज्यादा दिनों तक जीवित नहीं रह सकती है। हमारी संस्कृति का लक्ष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है। दूसरी संस्कृतियों का लक्ष्य सिर्फ अर्थ और काम है। पुनर्जागरण का मुख्य केंद्र युवाओं के अंदर लक्ष्य निर्धारित करना होना चाहिए। सबके अंदर आत्मगौरव की अनुभूति होनी चाहिए। आत्मा को मृत होने से रोकना चाहिए तथा आत्म अनुशासन का पालन करना चाहिए। सत्र का संचालन शालिनी वर्मा ने किया।

वेदों की उपासना वाला देश ही आर्यों का आदिदेश है: कोनरॉड एल्स्ट

दार्शनिक कोनराड एल्स्ट ने कहा कि वर्तमान समय में वैदिक इतिहास एवं आर्यों के मूल स्थान पर तरह-तरह की चर्चाएं होती हैं परंतु जिस देश में वेदों की उपासना होती है, वहीं देश आर्यों का था। उक्त विचार दार्शनिक कोनरॉड एल्स्ट ने रुद्राक्ष सभागार में आयोजित संस्कृति संसद के समानानंतर सत्र ‘वैदिक इतिहास एवं आर्यों का मूल स्थान’ में व्यक्त किए।

कोनराड ने बताया कि आर्य समाज का इतिहास बहुत ही पुराना है। उन्होंने भाषा शैली के बदलते स्वरूप का वर्णन किया। उन्होंने कहा कि जब दुनिया की भाषाओं का स्रोत संस्कृत है और वेद संस्कृत में है इसलिए दुनिया को संस्कृत एवं धर्म ज्ञान वेदों से हुआ। यही वेद आर्यों के आधार थे। इसी क्रम में उन्होंने भाषा के विकास व उसके संदर्भ में विद्यमान मतभेदों को भी स्पष्ट किया। संस्कृत, तमिल भाषा के अपेक्षा लैटिन शब्द से संबंध रखती है। वैदिक काल में मूर्ति के अपेक्षा प्रकृति की पूजा की जाती है| उन्होंने रंगभेद नीति पर भी अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आर्यों की पहचान भाषा से है, न कि उनके पहनावे से। उन्होंने भारतीय समाज सुधारकों को बाल गंगाधर तिलक, सुभाष चंद्र बोस के जीवन से लोगों को आत्मसात करने की प्रेरणा दी।

जगद्गुरु राम राजेश्वराचार्य ने कहा कि भारतीय संस्कृति के विचार हमें जोड़ते हैं। समाज निर्माण में मंदिरों एवं त्योहारों की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि दीपावली पर्व पर लोग दिए जलाते हैं और पूजा पाठ भी करते हैं तथा इस अवसर पर मंदिरों में जाते हैं। ये सांस्कृतिक गतिविधियां धर्म के साथ-साथ आर्थिक अर्थ से भी जुड़ी हैं। उन्होंने कहा कि हमारे विचारों में आई कृति ही संस्कृति है। उन्होंने बताया कि मानव शैली की जीवन शैली अगर कोई सिखाता है तो वह केवल हिंदू धर्म है। पूरे संपूर्ण जगत में अगर सबसे अच्छी कोई संस्कृति है तो वह भारतीय संस्कृति है। उन्होंने बताया कि भारतीय सभ्यता जैसा कोई भी नहीं है और हमारी संस्कृति में आई विकृति के कारण हमारा खान-पान, पहनावा और ज्ञान प्रभावित हुआ है। उन्होंने कहा कि इस विकृति को त्यागकर मूल संस्कृति से जुड़ना आवश्यक है, तभी हम वैदिक आर्य संस्कृति से जुड़ सकते हैं। संचालन शालिनी वर्मा ने किया।

समभाव भारत की संस्कृति का मूल आधार है: आरिफ मोहम्मद खान

केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि भारतीय सनातन संस्कृति वह है, जिसमें सुदृढ़ करने की प्रक्रिया निरंतर चलती है। यह प्रक्रिया भी सनातन है। मेरी संस्कृति, आपकी संस्कृति और पूरे राष्ट्र की संस्कृति है। इसे दुनिया मानती है। इसी संस्कृति के आधार पर भारत पुनः विश्वगुरु बन सकता है। राज्यपाल संस्कृति संसद के दूसरे दिन के प्रथम सत्र के मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे।

आरिफ मोहम्मद ने कहा कि भारत का यह मत है कि हम किसी को भी बाहर नहीं कर सकते। मानव सेवा ही माधव सेवा होती है। हम सब एक ही आत्मा के बंधन से बंधे हुए हैं। हमारी संस्कृति में विपरित भक्ति की भी व्यवस्था है यानि जो निंदा करता है, उसे भी अपने साथ लेकर चलिए। धर्म और अधर्म के उलझे आदमी को शंकराचार्य, स्वामी विवेकानन्द और संतों की जरूरत होती है। आदि शंकराचार्य जी ने शांति की स्थापना के लिए भारत के चार कोनों में चार मठ स्थापित किए जो चार वेदों के उपदेश से संचालित होते हैं।

विदेशों में बोलने वाले स्वामी विवेकानन्द के विचार सुनकर विश्व के लोगों ने उसे अपनाया क्योंकि उनके विचार भारतीय संस्कृति से जुड़े थे। ऋषियों ने सिर्फ मानव कल्याण के लिए तपस्या कर यह प्राकृतिक सिद्धांत खोजा। हम अपनी संस्कृति पर गर्व करें, अहंकार नहीं। गर्व इसलिए कि पूरी दुनिया में भारत की संस्कृति का अंश विराजमान है। शर्म इसलिए कि हम अपनी संस्कृति को दुनिया में बताने में नाकाम हो रहे हैं। भारत विश्वगुरु था, है और रहेगा, ये क्षमता उसे उसकी संस्कृति के माध्यम से मिलती है।

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उन्होंने कहा कि काशी में शंकराचार्य ने चाण्डाल का भी पैर छुआ है। विद्या और विनय दोनों मनुष्य के लिए सबसे बड़ा ज्ञान है। सभी जीवों में एक ही परमात्मा का निवास होता है। भारतीय संस्कृति सर्व समावेशी है। एक प्रश्न के उत्तर में आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि जिन्ना के दादा मुसलमान नहीं थे और बाप भी पक्की उम्र में मुसलमान हुए हैं।

आरिफ मोहम्मद खान ने कहा कि आधुनिक लोकतंत्र भले ही पश्चिम की देन है। परन्तु भारत में आध्यात्मिक लोकतंत्र हजारों वर्ष पुराना है। इस आध्यात्मिक लोकतंत्र का मूल आधार आत्मा है और यही आत्मीयता सबको एक करती है। भारत में उस समय से महिलाओं का सम्मान है, जबकि पश्चिम में महिलाओं में आत्मा को न मानने की परम्परा थी। समभाव भारत की संस्कृति का मूल आधार है। इसे हमें मजबूत करना चाहिए। सत्र की अध्यक्षता अखिल भारतीय संत समिति के अध्यक्ष आचार्य अविचल दास ने किया तथा सत्र का संचालन अशोक श्रीवास्तव ने किया। स्वागत संस्कृति संसद कार्यक्रम की अध्यक्षा सांसद रुपा गांगुली ने किया।

पाकिस्तान एवं चीन से अपनी संस्कृति को बचाने के लिए सतर्कता आवश्यक

चीन पाकिस्तान की राजनीतिक, आर्थिक एवं रक्षा जैसे तीनों मोर्चों पर खुले रूप से पाकिस्तान की मदद कर रहा है। दोनों ही देश चीन व पाकिस्तान भारत को घेरने की कोशिश कर रहे है। सत्र में इस बात पर भी चिंता जताई गयी कि हमारे देश में हमारे आस पास पड़ोस में भी कुछ ऐसे छोटे-छोटे गुट हैं जो हमारे विरोधी मुल्क की मदद कर रहे हैं। ‘ढाई युद्ध के मोर्चों पर भारत व राष्ट्रीय सुरक्षा में आम नागरिकों की भूमिका’ विषयक सत्र में रक्षा विशेषज्ञ डॉ. अशोक बेहुरिया (निदेशक आईडीएसए) ने संबोधित किया।

उन्होंने कहा कि भारत एक साथ दो मोर्चों पर युद्ध लड़ रहा है। पूरब की ओर चीन तो पश्चिम की ओर पाकिस्तान से खतरा है। पाकिस्तान में होने वाले परमाणु संयंत्रों में भी चीन का काफी योगदान रहा है. उत्तरी मोर्चे की बात की जाए तो 2020 और 2021 में डोकलाम व गलवान घाटी में चल रहे गतिरोध को इसका एक मुख्य स्रोत माना जा सकता है। हमारे देश में कुछ लोग हमारी संस्कृति को कमजोर करने में लगातार लगे हुए हैं। वह पाकिस्तान और चाइना का आंतरिक या परोक्ष रूप से हमेशा से समर्थन करते आ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि पाकिस्तान में अलग-अलग धर्म जैसे देवबंदी, बरेली या शिया-सुन्नी, देवबंदी बरेली या आधी धर्मों में इस्लाम बंटा हुआ है। पाकिस्तान एक राष्ट्र के तौर पर खुद को इस्लाम कंट्री का मुख्य स्रोत मानता है, जबकि वह खुद ही आंतरिक गतिरोध से जूझ रहा है। देश को इकट्ठा करने का उसके पास मात्र एक भारत एवं कश्मीर मुद्दा ही है, जिससे वह लोगों को बरगला कर अपने साथ समेटने की नाकाम कोशिश करता आ रहा है।

11वीं से 16वीं सदी के बीच मारे गए दस करोड़ हिन्दू

प्रसिद्ध इतिहासकार कोनराड एल्स्ट ने ‘हिन्दू होलोकास्ट; हिन्दू संस्कृति पर दो हजार वर्षों तक हुए हमले’ विषय पर कहा कि हिंदुस्तान में लगभग 336 ई. से हिंसक हमले शुरू हुए। इस हमले में 11वीं शताब्दी से लेकर 16वीं शताब्दी के शुरुआत तक लगभग 8 से 10 करोड़ हिन्दुओं का नरसंहार हुआ।

उन्होंने कहा कि यह आंकड़ा अनुमानित है। 1947 में बंटवारे के समय व 1971 में बांग्लादेश पाकिस्तान के बंटवारे के समय भी यही स्थिति हुई और लाखों लोग मारे गए। उक्त इतिहास में आज तक जितने हिन्दू नरसंहार की बात की गई है, उस पर किसी भी सरकार ने शोध नहीं कराया और न इस पर दृष्टि ही गई। हमलावरों का उद्देश्य धर्मांतरण करवाना था। जिसने धर्मांतरण स्वीकार नहीं किया उसकी हत्या हुई। हिन्दू नरसंहार पर कहा कि नरसंहार शब्द को बहुत आसानी से इधर-उधर फेंक दिया जाता है। हिन्दू वंशसंहार की घटनाएं अभी भी किसी न किसी रूप में चल रही हैं जो दुःखद हैं।

इतिहासकार विक्रम संपथ ने कहा कि भारतीय संस्कृति और हिंदुत्व पर हुए हमलों से हमें सीख लेनी चाहिए और साथ ही होलोकास्ट विषय पर भी चर्चा की जानी चाहिए। अगर आक्रान्ताओं की बात करें तो सबसे अधिक नुकसान उत्तर भारतीय मंदिरों को हुआ। लेकिन दक्षिण भारतीय मंदिरों की स्थिति आज भी पूर्व के समान ही है, क्योंकि आक्रांता वहां तक पहुंच ही नहीं पाए। जिससे उनकी सम्पन्नता आज भी बनी हुई है। हिन्दूकुश और कश्मीरी पंडितों का नरसंहार भी हिन्दू होलोकास्ट की ही परम्परा का भाग है। इस सत्र का संचालन सीपी सिंह ने किया।

पूर्वोत्तर भारत के लोगों से सम्पर्क बढ़ाना आवश्यक

सुनील देवधर ने कहा कि वर्तमान में पूर्वोत्तर भारत में राष्ट्रविरोधी शक्तियां अपना षड्यंत्र चला रही हैं। उसे रोकने के लिए आवश्यक है कि हम पूर्वोत्तर के लोगों से निकटतम सम्बंध बनाएं तथा वहां जाएं। वह ‘पूर्वोत्तर भारत की सांस्कृतिक चुनौतियाँ’ विषय पर बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि पूर्वोत्तर भारत में वर्तमान सरकार के प्रयासों से सकारात्मक वातावरण बन रहा है और इसे बढ़ाने के लिए हमें पूर्वोत्तर भारत के लोगों से सम्पर्क संवाद बढ़ाना चाहिए। इसके लिए पूर्वोत्तर भारत के पर्यटन को भी बढ़ावा देना चाहिए। एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा कि सभी मुसलमान एक ही तरह के नहीं हैं, उसमें भी कुछ राष्ट्रवादी हैं। सत्र का संचालन गंगा महासभा के राष्ट्रीय महामंत्री (संग) गोविंद शर्मा ने किया।

सरकारें मस्जिद और चर्च में नहीं, वरन मंदिर में करती हैं हस्तक्षेप

विश्व हिन्दू परिषद के अंतरराष्ट्रीय कार्याध्यक्ष आलोक कुमार ने 1991 में बने उपासना स्थल कानून के बारे में कहा कि यह कानून अचानक बना दिया गया था। लेकिन लोगों ने मन से इसे स्वीकार नहीं किया। इसे भी बदलना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि किसी ने नहीं सोचा था कि आज अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण होगा। इसी तरह कश्मीर से धारा 370 व 35ए आसानी से हटेगी, यह भी किसी ने नहीं सोचा था। लेकिन यह आज संभव हो पाया है। कुछ वामपंथी एनजीओ और चर्च द्वारा हिन्दुओं में ऐसी भावना पैदा कर दी गई है कि हमें लगे कि हम ही गलत हैं। इसके लिए हमारे त्योहारों को निशाना बनाया जा रहा है। सरकारें मस्जिद और चर्च में तो हस्तक्षेप नहीं करती, लेकिन मंदिर में हस्तक्षेप करती है। अपने शिक्षा संस्थान चलाने का अधिकार सिर्फ अल्पसंख्यकों का है, हमें नहीं।

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‘उपासना स्थल अधिनियम 1991 एवं अन्य धार्मिक कानून, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर हिन्दुओं का दमन’ विषय पर गंगा महासभा और अखिल भारतीय संत समिति के महामंत्री स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती ने कहा कि 1991 में सरकार द्वारा बनाए गए कानून को लोगों ने स्वीकार नहीं किया। 18 इतिहासकारों द्वारा बिना अयोध्या में आए यहां के बारे में गलत इतिहास लिखा गया, जिसे बाद में खारिज कर दिया गया। लेकिन हमारी न्याय प्रणाली ऐसी है, कि इतिहासकारों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। स्वामी ने कहा कि हमारे शिक्षण पाठ्यक्रम में उनके इतिहास पढ़ाए जा रहे हैं। आयोग उन पर भी कोई मुकदमा नहीं कर रहा है। उन्होंने धर्म के आधार पर बंटवारे के संदर्भ में कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी हम अपने अधिकार की लड़ाई लड़ रहे हैं, अल्पसंख्यकों को जितना अधिकार है, उतना अधिकार हिन्दुओं को नहीं है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने कहा कि देश के विकास के लिए एक समान नागरिक संहिता आवश्यक है। समान नागरिक संहिता भारतीय संविधान की आत्मा है। उन्होंने कहा कि सुखदेव और राजगुरु को फांसी देने वाले कानून आज भी हमारे देश में मौजूद हैं, जिनका विरोध कोई नहीं कर रहा। जबकि यह भारतीय नागरिक की जिम्मेदारी है कि वो अंग्रेजी कानूनों का विरोध करे। कांग्रेस पार्टी ने सभी कानून अपने वोट के लिये बनाये जो अंग्रेजों द्वारा बनाए गए कानूनों के समान है। सबके लिए एक नागरिक संहिता होने से न्यायालय का बहुमूल्य समय बचेगा। सत्र का संचालन गोविंद शर्मा ने किया।

निर्मल गंगा हमारी जिम्मेदारी

इंद्रेश कुमार ने कहा कि गंगा हमेशा निर्मल और अविरल रहे, यह हमारी जिम्मेदारी है। इसके लिए भारत सरकार ने एक आयोग बनाया है। वह ‘संस्कृति की अविरल धारा माँ गंगा’ विषयक सत्र में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि गंगा रक्षा के लिए संस्कृत और हिंदी भाषा को विश्व की संवाद भाषा बनाएं। गंगा हमें प्रकृति से प्रेम का संदेश देती है। भारत में अनेक नदियां हैं, लेकिन मन और शरीर को निर्मल करने वाली नदी माँ गंगा है। हमारी संस्कृति में बहुत शक्ति है। गंगा हमेशा निर्मल रहे, स्वच्छ रहे यह हमारी जिम्मेदारी है। हमें संकल्प लेना चाहिए कि गंगा को हमेशा स्वच्छ रखें। सत्र का संचालन स्वामी जितेन्द्रानंद सरस्वती ने किया।

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