दुनिया का सबसे प्रदूषित देश बना पाकिस्तान, छठे पायदान पर भारत, जानें पड़ोसी मुल्कों का हाल

global air quality report

India Pollution Rank 2025: वायु प्रदूषण वर्तमान में केवल एक पर्यावरणीय संकट नहीं रह गया है, बल्कि यह सीधे तौर पर मानव जीवन और स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका है। जहरीली हवा हमारे फेफड़ों, हृदय और मस्तिष्क को गंभीर नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ बच्चों के विकास को भी अवरुद्ध कर रही है। इसी संवेदनशील मुद्दे की गंभीरता को समझने के लिए वैश्विक स्तर पर देशों की वायु गुणवत्ता (Air Quality) रिपोर्ट जारी की गई है। इस रिपोर्ट के अनुसार, हमारा पड़ोसी देश पाकिस्तान वैश्विक स्तर पर सबसे प्रदूषित हवा वाला देश बनकर उभरा है।

क्या है PM2.5 और क्यों यह है सबसे खतरनाक

हवा में तैरने वाले अति-सूक्ष्म कणों को PM2.5 कहा जाता है, जिनका आकार 2.5 माइक्रोन या उससे भी कम होता है (हमारे बाल से लगभग 30 गुना छोटे)। ये कण इतने बारीक होते हैं कि सांस लेते समय हमारे नाक के फिल्टर इन्हें रोक नहीं पाते और ये सीधे फेफड़ों व रक्तप्रवाह में मिलकर कैंसर, अस्थमा और दिल के दौरे जैसी घातक बीमारियों का कारण बनते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, सुरक्षित और सेहतमंद हवा के लिए वार्षिक PM2.5 का स्तर 5 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से अधिक नहीं होना चाहिए। हालांकि, पहले स्थान पर मौजूद पाकिस्तान में यह आंकड़ा 67.3 दर्ज किया गया है, जो सुरक्षित सीमा से करीब 13 गुना अधिक है।

भारत की स्थिति और मुख्य चुनौतियाँ

इस रैंकिंग में भारत छठे स्थान पर है। हालांकि शीर्ष 5 से बाहर होना एक आंशिक राहत दे सकता है, लेकिन जमीनी हकीकत अब भी डरावनी है। उत्तर भारत के कई हिस्से, विशेषकर दिल्ली-एनसीआर और प्रमुख औद्योगिक शहर, आज भी वर्ष के अधिकांश समय स्मॉग की चादर में लिपटे रहते हैं।

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भारत में प्रदूषण के मुख्य कारण

परिवहन और ट्रैफिक जाम: सड़कों पर गाड़ियों की लगातार बढ़ती संख्या और डीजल इंजनों से निकलने वाला काला धुआं।

औद्योगिक उत्सर्जन: फैक्ट्रियों, बिजली संयंत्रों और लघु उद्योगों द्वारा नियमों की अनदेखी कर धुआं छोड़ना।

धूल और निर्माण कार्य: अनियंत्रित कंस्ट्रक्शन साइट्स और मलबे के कारण हवा में उड़ने वाले धूल कण।

पराली और कचरा दहन: सर्दियों के मौसम में उत्तर भारत में फसल के अवशेष (पराली) और खुले में प्लास्टिक-कूड़ा जलाना।

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समाधान की राह

साफ हवा में सांस लेना कोई विलासिता नहीं बल्कि हर नागरिक का मौलिक अधिकार है। इस संकट से निपटने के लिए कोयले और गंदे ईंधनों की जगह सौर व पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ विकल्पों को अपनाना होगा। इसके अलावा, सार्वजनिक परिवहन (मेट्रो, इलेक्ट्रिक बसें) को बढ़ावा देने, निर्माण स्थलों पर पानी के छिड़काव को अनिवार्य करने और कचरा प्रबंधन के कड़े नियम लागू करने की तत्काल आवश्यकता है।

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