गुरुपूर्णिमा: सद्गुरु-तत्त्व, आत्मजागरण और भारतीय ज्ञान-परम्परा का सनातन महापर्व

भारत की सनातन संस्कृति महज पर्वों और अनुष्ठानों की श्रृंखला नहीं, बल्कि मानव चेतना को ब्रह्मज्ञान और अलौकिकता की ओर ले जाने वाली एक दिव्य जीवन-शैली है। आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा यानी गुरुपूर्णिमा (व्यासपूर्णिमा), हमारी महान ऋषि-परम्परा और गुरु-शिष्य संस्कृति के प्रति असीम कृतज्ञता प्रकट करने का पावन अवसर है।
भारतीय दर्शन के अनुसार, गुरु केवल मार्गदर्शक नहीं, बल्कि जीव को उसके वास्तविक स्वरूप से मिलाने वाले सेतु हैं। मुण्डकोपनिषद् में स्पष्ट कहा गया है कि आत्मज्ञान के लिए ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरु की शरण में जाना अनिवार्य है। ‘गुरु’ शब्द स्वयं में गूढ़ है—’गु’ का अर्थ अज्ञान का अंधकार है और ‘रु’ का अर्थ उसका विनाश। जो अविद्या और अहंकार को नष्ट कर ज्ञान का दीप जलाए, वही सच्चा गुरु है। श्रीमद्भगवद्गीता में श्रीकृष्ण और अर्जुन का संवाद सिखाता है कि परम ज्ञान विनम्रता, सेवा और जिज्ञासा से ही संभव है।
आषाढ़ पूर्णिमा को भगवान वेदव्यास के प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। वेदों का वर्गीकरण, महाभारत, अठारह महापुराणों और ब्रह्मसूत्र की रचना कर उन्होंने मानवता को ज्ञान का अक्षय भंडार सौंपा। प्राकृतिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह दिन अत्यंत महत्वपूर्ण है; इसी समय से चातुर्मास की शुरुआत होती है, जिसमें साधु-संत एक स्थान पर रहकर जप, ध्यान और समाज-शिक्षण करते हैं। महर्षि वशिष्ठ, चाणक्य, समर्थ रामदास और स्वामी विवेकानन्द जैसी विभूतियों ने इसी परंपरा के बल पर राष्ट्र चेतना को सदैव जीवित रखा।
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आज के डिजिटल और सूचना-क्रांति के युग में जानकारी तो प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है, लेकिन मानसिक शांति और ‘विवेक’ का अभाव दिख रहा है। सूचना बुद्धि को प्रखर बना सकती है, पर उसे ‘प्रज्ञा’ में बदलने का सामर्थ्य केवल सद्गुरु के पास है। गुरुपूर्णिमा का यह पर्व केवल औपचारिक पूजन तक सीमित न रहकर आत्म-समीक्षा का दिन है। अहंकार, आलस्य और अज्ञान का त्याग कर सत्य, करुणा और सेवा के मार्ग पर चलना ही गुरुदेव के चरणों में सच्ची गुरुदक्षिणा है।
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