भारत लौटीं रोहिणी घावरी, चंद्रशेखर आजाद को दे सकती हैं टेंशन

Rohini Ghavari

Bijnor News: उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव से पहले दलित वोट बैंक पर कब्जे को लेकर राजनीतिक बिसात बिछने लगी है। एक तरफ जहां भाजपा, सपा और बसपा दलित मतदाताओं को अपने पाले में लाने की कोशिशों में जुटी हैं, वहीं नगीना से आजाद समाज पार्टी के सांसद चंद्रशेखर आजाद के लिए एक नई राजनीतिक चुनौती खड़ी होती दिख रही है। सामाजिक कार्यकर्ता और स्विट्जरलैंड से पीएचडी पूरी कर चुकीं रोहिणी घावरी भारत वापस लौट आई हैं। उनके आगमन से बिजनौर से लेकर लखनऊ तक उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है।

स्विट्जरलैंड और संयुक्त राष्ट्र तक का सफर

मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली रोहिणी घावरी एक साधारण सफाई कर्मचारी परिवार से आती हैं। उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत और प्रतिभा के बल पर वर्ष 2019 में स्कॉलरशिप हासिल की और पीएचडी की पढ़ाई के लिए स्विट्जरलैंड गईं।

रोहिणी तब राष्ट्रीय सुर्खियों में आईं जब उन्होंने संयुक्त राष्ट्र (UN) के मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए अपने भाषण की शुरुआत जय श्रीराम के उद्घोष से की थी। इसके अलावा, भीम आर्मी प्रमुख व नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद के साथ प्रेम संबंध, आरोप-प्रत्यारोप और तीखे विवादों के बाद सोशल मीडिया पर रोहिणी घावरी का नाम काफी चर्चा में आया था।

Rohini Ghavari

भारत वापसी की सोशल मीडिया पोस्ट वायरल

स्विट्जरलैंड में अपनी 6 साल की पढ़ाई पूरी करने के बाद रोहिणी घावरी ने भारत लौटने की जानकारी खुद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर साझा की। उन्होंने एयरपोर्ट की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा कि 6 साल पहले वह 3 बैग लेकर स्विट्जरलैंड गई थीं और अब डॉक्टर की उपाधि व ढेर सारी यादों के साथ वापस भारत आ रही हैं। उन्होंने लिखा कि स्विट्जरलैंड ने उन्हें डॉक्टरेट की डिग्री और यूएन में भाषण के जरिए एक वैश्विक पहचान दी है।

Rohini Ghavari

चंद्रशेखर आजाद के खिलाफ मोर्चा खुलने की संभावना

रोहिणी घावरी की वापसी को पश्चिमी उत्तर प्रदेश और नगीना लोकसभा क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से काफी अहम माना जा रहा है। रोहिणी कई मौकों पर बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती के पक्ष में बयान देती रही हैं। साथ ही, वह दलितों के हिंदू पहचान और गर्व पर आधारित राजनीति की समर्थक हैं, जो चंद्रशेखर आजाद की वैचारिक राजनीति से काफी भिन्न है।

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अब तक सोशल मीडिया तक सीमित रहने वाला रोहिणी और चंद्रशेखर का विवाद अब जमीनी स्तर पर देखने को मिल सकता है। कयास लगाए जा रहे हैं कि आगामी विधानसभा चुनाव से पहले रोहिणी कोई बड़ा राजनीतिक कदम उठा सकती हैं, जिससे दलित मतदाताओं के बीच चंद्रशेखर आजाद के लिए मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।

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