छह साल बाद भी कागजों में अयोध्या की मस्जिद, इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन ने बयां किया दर्द

Ayodhya Dhannipur Mosque

Ayodhya Dhannipur Mosque: अयोध्या के ऐतिहासिक राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले को आए छह साल से अधिक का समय बीत चुका है। एक तरफ जहां विवादित स्थल पर भव्य राम मंदिर बनकर तैयार है, वहीं दूसरी तरफ अदालत के निर्देश पर मस्जिद निर्माण के लिए मिली पांच एकड़ जमीन आज भी तकनीकी और प्रशासनिक दांव-पेंचों में उलझी हुई है। हालत यह है कि धन्नीपुर गांव में आवंटित जमीन पर मस्जिद निर्माण शुरू होना तो दूर, अब यह एक ‘दूर की कौड़ी’ साबित हो रहा है।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मस्जिद निर्माण के लिए गठित ‘इंडो-इस्लामिक कल्चरल फाउंडेशन’ (IICF) ट्रस्ट के चेयरमैन जुफर अहमद फारूकी ने इस देरी की जमीनी वजहों का खुलासा किया है। फारूकी के मुताबिक, कागजी अड़चनों से इतर सबसे बड़ी समस्या फंड (चंदे) की कमी और आम मुस्लिम समाज की बेरुखी है।

उन्होंने कहा, यह आस्था का विषय नहीं है, इसलिए आम जनता की इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है। तमाम मुस्लिम संगठन शुरू से ही सरकार द्वारा दी गई इस जमीन को लेने के खिलाफ थे। जब कोई चंदा ही नहीं दे रहा है, तो काम कैसे बढ़े? अब हम कोशिश कर रहे हैं कि अगर बड़ी परियोजना संभव न हो, तो कम से कम छोटे स्तर पर ही कुछ निर्माण करा दिया जाए।

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दरअसल, उत्तर प्रदेश सरकार ने साल 2020 में अयोध्या कस्बे से करीब 25 किलोमीटर दूर रौनाही थाने के पीछे धन्नीपुर गांव में यह जमीन आवंटित की थी। बाबरी मस्जिद के मुख्य पक्षकार रहे हाजी महबूब का कहना है कि अयोध्या के स्थानीय मुसलमानों की इसमें कोई रुचि नहीं है, क्योंकि कोई भी नमाज पढ़ने इतनी दूर नहीं जाएगा। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने भी सुन्नी वक्फ बोर्ड पर इस जमीन को स्वीकार न करने का दबाव बनाया था।

हालांकि, ट्रस्ट ने शुरुआत में इस 5 एकड़ जमीन पर एक आलीशान मस्जिद के साथ 200 बेड का अस्पताल, म्यूजियम, लाइब्रेरी और कम्युनिटी किचन बनाने का बड़ा ले-आउट तैयार किया था, लेकिन अयोध्या विकास प्राधिकरण (ADA) की तकनीकी आपत्तियों और आंतरिक विरोध के चलते आज भी जमीन पर सिर्फ एक पुरानी दरगाह के सिवा कुछ नहीं बदल सका है।

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