आचार्य लालमणि पाण्डेय ने ध्रुव, अजामिल, प्रह्लाद और गजेन्द्र के प्रसंग सुनाकर सिखाया भक्ति का सच्चा मार्ग

Bhagwat Katha

भोपाल: आचार्य लालमणि पाण्डेय ने भागवत कथा के तृतीय दिवस में भक्त ध्रुव, जड़ भरत, अजामिल, प्रह्लाद एवं गजेन्द्र मोक्ष के प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक एवं सामाजिक जीवन की अमूल्य शिक्षाएँ प्रदान कीं। उनके भावुक उद्बोधन के दौरान पूरा पंडाल भक्तिरस में डूब गया और श्रद्धालुओं की आँखें भर आईं।

पाँच वर्ष की आयु में ध्रुव ने पा लिया भगवान का साथ

महाराज जी ने बताया कि मात्र पाँच वर्ष की अवस्था में भक्त ध्रुव ने अटूट लगन, निष्ठा एवं दृढ़ विश्वास के बल पर भगवान को प्राप्त किया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए इसी प्रकार समर्पण और दृढ़ संकल्प के साथ प्रयास करना चाहिए। भावुक होते हुए उन्होंने कहा, ध्रुव को राजसिंहासन नहीं चाहिए था, उसे तो केवल भगवान की गोद चाहिए थी। यह सुनते ही अनेक श्रद्धालुओं की आँखों से आँसू बहने लगे और हर कोई अपने जीवन की पीड़ा एवं प्रभु से दूरी को महसूस करने लगा।

आसक्ति के दुष्परिणाम और नाम जप की महिमा

जड़ भरत के प्रसंग से उन्होंने शिक्षा दी कि किसी भी व्यक्ति अथवा वस्तु के प्रति अत्यधिक आसक्ति मनुष्य के पतन का कारण बन सकती है। वहीं अजामिल की कथा के माध्यम से उन्होंने कहा कि भगवान के नाम का जप सदैव करते रहना चाहिए। चाहे नाम जप भाव से हो अथवा कुभाव से, प्रभु का नाम अंततः कल्याणकारी ही होता है। उन्होंने कहा, प्रभु इतने दयालु हैं कि मनुष्य एक कदम उनकी ओर बढ़ाए, तो भगवान सौ कदम उसकी ओर दौड़े चले आते हैं।

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प्रह्लाद का भक्ति का अनूठा उदाहरण, गजेन्द्र को मिला उद्धार

प्रह्लाद के चरित्र का वर्णन करते हुए महाराज ने कहा कि मनुष्य को सभी प्राणियों के प्रति दया, धर्म एवं भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव रखना चाहिए। गजेन्द्र मोक्ष की कथा से उन्होंने बताया कि जीवन के संकट काल में केवल प्रभु का ही स्मरण और शरण मनुष्य को बचा सकती है।

ब्राह्मण समाज का शिक्षक, क्षत्रिय रक्षक, वैश्य पोषक और शूद्र सेवक

सामाजिक व्यवस्था पर प्रकाश डालते हुए महाराज ने कहा कि ब्राह्मण समाज का शिक्षक, क्षत्रिय समाज का रक्षक, वैश्य समाज का पोषक तथा शूद्र समाज का सेवक होता है। उन्होंने बताया कि ब्राह्मण ज्ञान प्रधान, क्षत्रिय बल प्रधान, वैश्य अर्थ प्रधान एवं शूद्र सेवा प्रधान माने गए हैं। ब्राह्मण भगवान का मस्तक है, क्षत्रिय उनकी भुजा, वैश्य उनका उदर तथा शूद्र भगवान के चरण स्वरूप हैं। उन्होंने कहा, जिस प्रकार भगवान के चरणों से निकली गंगा समस्त संसार को पवित्र करती है, उसी प्रकार समाज में प्रत्येक वर्ग पूजनीय एवं सम्माननीय है।

जब भगवान वराह अवतार की कथा चली और बताया गया कि कैसे भगवान ने पृथ्वी माता को अपने दाँतों पर उठाकर पाताल से बाहर निकाला, तो पूरा पंडाल ”हरि बोल” के जयघोष से गूंज उठा। महाराज ने कहा, ”जिस प्रकार भगवान ने पृथ्वी को अंधकार से निकाला, उसी प्रकार प्रभु अपने भक्तों को दुःख और पाप के गहरे अंधकार से बाहर निकाल लेते हैं।

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भगवान को सच्चा और रोता हुआ हृदय चाहिए

अपने भावुक स्वर में महाराज जी ने कहा, मनुष्य जीवन बार-बार नहीं मिलता। यह शरीर प्रभु भक्ति के लिए मिला है, लेकिन मनुष्य इसे मोह, माया और अहंकार में खो देता है। भगवान को बड़े-बड़े महल नहीं चाहिए, उन्हें तो एक सच्चा और रोता हुआ हृदय चाहिए। जहाँ प्रेम के आँसू गिरते हैं, वहीं भगवान दौड़े चले आते हैं।

जब तक संसार के लिए रोते हो, दुःख ही मिलता है

अंत में उन्होंने कहा, जब तक मनुष्य संसार के लिए रोता है, उसे केवल दुःख मिलता है। लेकिन जिस दिन वह भगवान के लिए रो देता है, उस दिन उसका जीवन धन्य हो जाता है। प्रभु नाम से बड़ा कोई धन नहीं, भक्ति के आँसुओं से बड़ा कोई तीर्थ नहीं, और संतों की वाणी से बड़ा कोई मार्ग नहीं। कथा के दौरान कहीं सिसकियाँ सुनाई दीं, तो कहीं प्रभु नाम का संकीर्तन हुआ। आँसुओं में भीगी प्रार्थनाओं के बीच महाराज जी ने सभी को ‘राधे-राधे’ और ‘जय श्री श्याम’ का मंत्र देते हुए आशीर्वाद दिया।

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