भागवत कथा के द्वितीय दिवस आचार्य लाल अणि पाण्डेय ने सुनाए द्रौपदी, कुन्ती और उत्तरा के करुणा और त्याग के प्रसंग
भोपाल: महाराज आचार्य लाल अणि पाण्डेय ने भागवत कथा के द्वितीय दिवस में अत्यंत मार्मिक एवं प्रेरणादायक प्रसंगों का वर्णन करते हुए श्रोताओं को भावविभोल कर दिया। उन्होंने महाभारत के पश्चात द्रौपदी, उत्तरा एवं माता कुन्ती के चरित्र को त्याग, करुणा और भगवान के प्रति अखंड श्रद्धा का अद्भुत उदाहरण बताया।
द्रौपदी ने पुत्रों के हत्यारे अश्वत्थामा को भी क्षमा किया
आचार्य ने बताया कि द्रौपदी ने अपने पांच पुत्रों के हत्यारे अश्वत्थामा को भी क्षमा कर दिया। उनके हृदय में प्रतिशोध नहीं, बल्कि धर्म और करुणा का वास था। उन्होंने कहा कि सच्ची भक्ति वहीं है जहां शत्रु के प्रति भी घृणा न हो, बल्कि करुणा हो।
उत्तरा और कुन्ती की अटूट श्रद्धा का अद्भुत उदाहरण
आचार्य ने आगे बताया कि उत्तरा माता ने भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में अपने गर्भ की रक्षा हेतु प्रार्थना की और भगवान ने उनके गर्भस्थ शिशु महाराज परीक्षित की रक्षा की। वहीं, माता कुन्ती ने भगवान से सुख नहीं, बल्कि दुःख मांगा ताकि उनकी बुद्धि सदैव प्रभु चरणों में लगी रहे और संसार की ममता उन्हें प्रभु से दूर न कर सके। आचार्य ने इसे भक्त के सर्वोच्च समर्पण का दिव्य उदाहरण बताया।

भगवान श्रीकृष्ण का द्वारिका प्रस्थान और परीक्षित का जन्म
कथा के दौरान यह भी बताया गया कि भगवान श्रीकृष्ण ने पितामह भीष्म जी को दर्शन देकर उन्हें सद्गति प्रदान की और तत्पश्चात द्वारिका पुरी प्रस्थान किया। इसी बीच महाराज परीक्षित जी का जन्म हुआ, जो धर्मप्रिय एवं समस्त युगों में सम्मानित राजा बने।
कलियुग को केवल पांच स्थानों में रहने की अनुमति
आचार्य लाल अणि पाण्डेय ने बताया कि महाराज परीक्षित ने कलियुग को नियंत्रित करते हुए उसे केवल पांच स्थानों में रहने की अनुमति दी- जुआ, मदिरा, व्यभिचार, हिंसा और अन्यायपूर्वक अर्जित स्वर्ण एवं संपत्ति। उन्होंने कहा कि इन पांच स्थानों से दूर रहने वाला व्यक्ति कलियुग के प्रभाव से बचा रहता है।
महाराज परीक्षित को मिला सात दिन का श्राप
कथा में यह भी बताया गया कि महाराज परीक्षित को सात दिन में मृत्यु का श्राप मिला। आचार्य जी ने कहा कि वास्तव में हम सभी का जीवन भी अनिश्चित है, इसलिए हर क्षण प्रभु स्मरण में लगाना ही मानव जीवन की सार्थकता है।

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श्री शुकदेव महाराज के तीन उपदेश: श्रवण, कीर्तन, स्मरण
उन्होंने बताया कि भगवान स्वयं श्री शुकदेव महाराज जी के रूप में प्रकट होकर महाराज परीक्षित को श्रीमद्भागवत कथा का अमृत पान कराते हैं और कल्याण का मार्ग बताते हैं। शुकदेव महाराज ने तीन मुख्य साधन बताए श्रवण, कीर्तन और स्मरण। अर्थात प्रभु की कथा सुनो, प्रभु नाम का संकीर्तन करो और प्रभु चरित्रों का स्मरण करो। आचार्य जी ने कहा कि यही मोक्ष प्राप्ति का सर्वोत्तम साधन है। कथा के अंत में उन्होंने सभी श्रोताओं को ‘राधे-राधे’ और ‘जय श्री श्याम’ का मंत्र देते हुए प्रभु भक्ति में लीन रहने का आशीर्वाद दिया।
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