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Acharya Shrihari
आचार्य श्रीहरि

मैं अभी दिल्ली से बहुत दूर हूं और सुदूर गांवों, कस्बों, मध्यम शहरों का राजनीतिक मिजाज को जानना चाहता हूं। खासकर नरेंद्र मोदी के 56 इंच के सीने की राजनीतिक छवि और शक्ति को। नरेंद्र मोदी की कट्टरवादी शक्ति को, बीजेपी और संघ के हिंदुत्व वाद को। मुझे देखकर और सुनकर बहुत ही हैरानी हो रही है। अचंभित होना पड़ रहा है कि बीजेपी के आम लोग जो काफी आक्रामक रहा करते थे। हिंदुत्व विरोधियों को बेनकाब करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ते थे। विरोधियों पर वैचारिक रूप से विजयी हासिल करते थे। अपना परचम लहराते हैं, सांप्रदायिकता की एकांकी परिभाषा के लिए विरोधियों को कोसते थे। यह सब ओझल हो गया है।

बीजेपी के आम लोग जो वोट की असली शक्ति होते हैं, वे सब खामोश हैं। उनमें बीजेपी के बचाव करने की अब इच्छा नहीं रही। खामोशी भी धारण कर लिया है। विरोधियों के तर्क के सामने बीजेपी के आमलोग निरुत्तर भी हो रहे हैं। ऐसी स्थिति सिर्फ सुदूर गांवों, कस्बों और मध्यम शहरों की ही नहीं है बल्कि प्रदेश और राष्ट्रीय मुख्यालयों पर भी है।

प्रदेश और राष्ट्रीय मुख्यालयों पर बीजेपी के प्रवक्ता और बीजेपी के बड़े पदाधिकारी भी आक्रामकता भूल गए हैं, या फिर वे भी हताश-निराश हैं। उनके पास भी बचाव के तथ्य और तर्क कमजोर पड़ गए हैं। शीर्ष नेतृत्व भी अपनी पार्टी को आक्रामकता की घुट्टी पिलाने में असमर्थ है। कई ऐसे अवसरों का दुष्परिणाम भी सामने आया है, जिसमें उन्हें अपनी सरकार की कमजोरी दिखी है। अपनी सरकार की रक्षात्मक नीति उनके मनोबल को तोड़ दिया। उनकी शिकायत होती है कि विरोधी दल के छुटभैया नेता भी बीजेपी और नरेंद्र मोदी पर अश्लील और आपत्तिजनक टिप्पणियां कर खुलेआम घूमते हैं, पर हमारी राज्य सरकारें और केंद्रीय सरकार ऐसे लोगों को कानून का पाठ पढ़ाने में असमर्थ रहती हैं। सोशल मीडिया पर अफवाहें आम हैं। गलत जानकारियां सोशल मीडिया पर डालकर बीजेपी और हिंदुत्व को न केवल गलत छवि बनाई जाती है बल्कि दाग़दार भी बनाई जाती है। सोशल मीडिया को जिम्मेदार बनाने और अफवाहों को रोकने के लिय कानून की आवश्यकता है पर इस प्रसंग पर मोदी सरकार की कोई पहल ही नहीं हुई।

हमने बीजेपी के लोगों से यह जानने की कोशिश की कि आखिर क्यों आप लोग खामोश हैं। क्यों आक्रामक नहीं हैं। विरोधियों की आपत्तिजनक बातों पर भी आपका खून क्यों नहीं खोलता है। क्या आप लोग यह मान लिए हैं कि अब बीजेपी के चाल-चरण बदल गए हैं। बीजेपी आपकी उम्मीदों के प्रति खरी नहीं उतरी। क्या अब नरेंद्र मोदी की आक्रामक छवि सही में कमजोर साबित हो गई। बीजेपी में आपका सम्मान बीते दिनों की बात हो गई है? इस पर बीजेपी के लोग कहते हैं कि हमारे मुंह पर पट्टी लगा दी गई है। हमें कथित अनुशासन में बांध दिया गया है। हमें यह कह दिया गया है कि आप पार्टी की जिम्मेदारी से अलग हटकर काम नहीं कर सकते हैं। विरोधियों से लड़ने के लिए प्रवक्ता हैं, पार्टी के बड़े पदाधिकारी है, इसलिए आप उलझने और तकरार लेने के लिए खतरे न लें।

सबसे बड़ी बात यह है कि बीजेपी में प्रचारक शैली का सत्यानाश हो गया है। आम कार्यकर्ताओं के यहां ठहरने और भोजन करने की परंपरा का भी संहार हो चुका है। गरीब और छोटे कार्यकर्ताओं के लिए बीजेपी के दरवाजे लगभग बंद हो गए हैं। कहने का सीधा अर्थ है कि बीजेपी के बड़े पदाधिकारी छोटे कार्यकर्ताओं को सम्मान देने और उनके दुख-दर्द में शामिल होने से परहेज करते हैं। यहां तक कि जीवन भर जनसंघ और बीजेपी के लिए समर्पित और सबकुछ झोंक देने वाले कार्यकर्ता जब मुसीबत में आते हैं तो फिर बीजेपी के बड़े नेता काम नहीं आते। यहां तक उनकी मृत्यु यात्रा में भी शामिल नहीं होते है। ऐसे उदाहरण गांव से लेकर देश की राजधानी दिल्ली तक असंख्य मिल जाएंगे। इसका दुष्परिणाम यह होता कि इस तरह के उदाहरण देखकर बीजेपी के सामान्य कार्यकर्ता पार्टी के प्रचार-प्रसार के प्रति उदासीनता की ओर गमन करने में ही अपनी भलाई समझता है।

बीजेपी के राष्ट्रीय संगठन मंत्री बीएल संतोष की सीख, विजन और नसीहत भी गुनहगार की श्रेणी में खड़ी है। गुनहगार क्यों? इसलिए की बीएल संतोष की सीख, विजन, नसीहत बीजेपी के आम कार्यकर्ताओं के मनोबल तोड़ने और खामोश रहने के लिए कह दिया है। एक बैठक में बीएल संतोष ने साफ कह दिया था कि कार्यकर्ता पुलिस और चौकी तथा अफसर का चक्कर लगाना बंद करें। कार्यकर्ताओं को सिर्फ पार्टी कार्यक्रमों में दरी बिछाने और पोस्टर बैनर लगाने का काम करना चाहिए। बीएल संतोष की यह सीख, विजन और नसीहत ने कार्यकर्ता प्रधान कहे जाने वाली बीजेपी की संपूर्ण सोच को उदासीनता और स्लीपिंग मोड़ में धकेल दिया है।

बीजेपी के एक समर्पित कार्यकर्ता का साफ कहना है कि बीएल संतोष का यह विजन यह दर्शाता है कि बीजेपी के शीर्ष स्तर पर कैसे-कैसे बचकाने लोग बैठाये गए हैं। अगर कोई कार्यकर्ता को पुलिस ने गलत मामले में फंसा दिया तो फिर उसे छुड़ाने के लिए पुलिस चौकी की दौड़ लगाने की अनिवार्यता तो पूरी करनी ही होगी। सबसे बड़ी बात यह है कि बीएल संतोष के इस विजन का कोई पार्टी वर्कर विरोध भी नहीं कर सकता है। विरोध करने वाले पर अनुशासन का डंडा चलेगा और उसे पार्टी से बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया जाएगा।

इस विषय पर हमने बीजेपी के सामान्य कार्यकर्ताओं के मन को टटोलने की पूरी कोशिश की है। निष्कर्ष आया कि हमारी यानी बीजेपी की जड़ें खोदने का काम नौकरशाही और पुलिस ही करती है। पुलिस की बदनाम करतूतें कौन नहीं जानता है, जो नहीं जानता है वह एक बार पुलिस थाने जाकर देख ले, पता चल जाएगा। जहां तक नौकरशाही की बात है तो फिर नौकरशाही की असंवेदनशीलता और उनकी जनविरोधी करतूत भी सर्वविदित है। नौकरशाही मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने में भी रिश्वतखोरी करती हैं। सरकारी योजनाएं भी इसी कारण जमीन पर नहीं उतर पाती हैं, यानी कि सफल नहीं हो पाती हैं।

छोटे कार्यकर्ताओं की ही नहीं बल्कि विधायक और सांसदों की भी बात पुलिस और नौकरशाही नहीं सुनती है। यही कारण है कि नरेंद्र मोदी की विकास योजनाओं का भी संहार नौकरशाही ने किया है। जब नौकरशाही बंदरबांट कर मोदी योजनाओं संहार करती है तो फिर बीजेपी के कार्यकर्ता नौकरशाही के खिलाफ कैसे नहीं असहिष्णुता बरतेंगे। पुलिस और नौकरशाही के खिलाफ करने से कार्यकर्ताओं को रोकने का अर्थ मोदी की छवि और बीजेपी के ईमानदार होने वाली छवि का संहार करना है। बीएल संतोष जैसे लोग क्या नरेंद्र मोदी की राजनीतिक कब्र खोद रहे हैं, इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। आम बीजेपी के कार्यकर्ता ऐसा ही सोचते हैं।

सर्वाधिक नुकसान दलबदलुओं ने बीजेपी की पहुंचाई है। दलबदलुओं के पाप को धोते-धोते बीजेपी खुद भी भ्रष्ट, अनैतिकता, बइमानी और शुचिता खोर बन गई हैं। गंदगी की प्रतीक बन गई हैं। लोमहर्षक उदाहरण बन गई हैं। अब तो बीजेपी को भ्रष्टाचार, बेइमानी और अपराधी का वाशिंग मशीन कहा जाता है। बेइमान, अपराधी और अनैतिक लोग बीजेपी में ज्वाइन कर सदाचारी बन जाते हैं। समाजसेवी बन जाते हैं, जनता का भाग्य विधाता बन जाते हैं। मानवता के पुजारी बन जाते हैं। विधायक और सांसद के उम्मीदवार बन जाते हैं। बीजेपी के लिए आइकन बन जाते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि बीजेपी के स्वाभिमानी कार्यकर्ताओं को भी इनकी चरण वंदना करनी पड़ती है। आधे से अधिक सांसद विधायक दलबदलू हैं और बीजेपी के विचार का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं।

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दलबदलू बीजेपी में रहकर भी बीजेपी के विचार के प्रति सहानुभूति नहीं रखते हैं, समर्पित नहीं होते हैं। उन पर सेक्युलर वाद हावी रहता है। ऐसे लोग सत्ता के सहचर होते हैं, जिसकी सत्ता उसकी बांसुरी बजाने लगते हैं। जब तक सत्ता होती है तबतक ऐसे लोग साथ होते हैं। सत्ता जाते ही ऐसे लोग विद्रोह हो जाते हैं, बगावत कर देते हैं। सांप्रदायिकता का आरोप लगा देते हैं। सेक्युलर राजनीति का सहचर बन जाते हैं। बीजेपी के सामान्य कार्यकर्ता बोलते हैं कि हमें मजबूर होकर दलबदलू नेताओं की चरण वंदना करनी पड़ती है। उनके लिए प्रचार करना पड़ता है, उनका भाषण सुनना पड़ता है। जब विधायक और सांसद का टिकट ऐसी राजनीतिक श्रेणी को ही मिलना है तो फिर हम बीजेपी के लिए मरने-मिटने की वीरता और सक्रियता क्यों दिखाएंगे। मोदी-मोदी का जाप क्यों करे? इस गुनाह के लिए जिम्मेदार तो नरेंद्र मोदी ही है। मोदी ने ही बीजेपी का दलबदलू कारण किया है।

निश्चित तौर पर बीजेपी अब कार्यकर्ता नहीं बल्कि नेता आधारित पार्टी बन गई हैं। नरेंद्र मोदी की छवि दरकी है, कमजोर पड़ी है। मोदी का रक्षात्मक होना बीजेपी की साख के लिए भारी पड़ रहा है। मोदी की रक्षात्मक नीति से बीजेपी के सामान्य कार्यकर्ता हताश और निराश है। आम कार्यकर्ता ही पार्टी की पूंजी और समृध्दि होते हैं। कमजोर विपक्ष के कारण मोदी को थोड़ी राहत जरूर है। राजनीति में विकल्प भी रातोंरात तैयार हो जाता है। निश्चित तौर पर मोदी अब अपने कार्यकर्ताओं में भी उतने लोकप्रिय नहीं रहे। आक्रामकता के सहचर नहीं रहे। मोदी युग का परचम अब और ऊपर जाएगा नहीं बल्कि नीचे ही लुढ़केगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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