कर्दम ऋषि, माता देवहूति और भगवान कपिल के प्राकट्य की जानिए अलौकिक कथा
Pauranik Katha: श्रीमद्भागवत महापुराण में विदुर और मैत्रेय के बीच का संवाद मनुष्य को जीवन जीने की कला सिखाता है। ब्रह्मा जी के मानस पुत्र कर्दम ऋषि, जो जन्मजात विरक्त और नारायण के अनन्य प्रेमी थे, उन्होंने पिता की आज्ञा मानकर सृष्टि की रचना के लिए गृहस्थाश्रम में प्रवेश तो किया, लेकिन उससे पहले मुक्त होने का मार्ग भी खोज लिया। कर्दम जी का यह चरित्र बताता है कि गृहस्थ जीवन के झंझटों में फंसने से पहले व्यक्ति को उससे निर्लिप्त रहने की कला सीख लेनी चाहिए।
तपस्या के आंसुओं से बना पवित्र सरोवर
कर्दम ऋषि ने सरस्वती नदी के पावन तट पर लगातार दस हजार वर्षों तक भगवान नारायण की घोर आराधना की। उनकी निष्कपट भक्ति से प्रसन्न होकर शंख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु स्वयं प्रकट हुए। कर्दम जी ने प्रभु से एक ऐसी जीवनसंगिनी मांगी जो उनके गृहस्थ और संन्यास दोनों ही आश्रमों में उनकी साधना की संगिनी बन सके।
कथा का मर्म: भगवान के सामने होने पर भी यदि कोई संसार की नश्वर वस्तुएं (धन, मकान, पत्नी, संतान) मांगता है, तो वह प्रभु की माया से मोहित है। कर्दम जी ने विवाह की अनुमति तो मांगी, लेकिन उसमें भी परमार्थ का भाव छुपा था।
अपने भक्त को संसार के दुखों (गृहस्थाश्रम) की ओर जाते देख भगवान की आंखों से करुणा के आंसू छलक पड़े। प्रभु के उन्हीं आंसुओं से गुजरात में प्रसिद्ध ‘बिंदु सरोवर’ का निर्माण हुआ, जो आज भी एक महान तीर्थ स्थल है। भगवान ने प्रसन्न होकर कर्दम जी को साक्षात उनका पुत्र (कपिल भगवान) बनकर आने का वरदान दिया।
माता देवहूति के दिव्य संस्कार और कर्दम की कठोर शर्त
ब्रह्मा जी के निर्देश पर राजा स्वायंभुव मनु और महारानी शतरूपा अपनी परम विदुषी व शीलवती कन्या देवहूति को लेकर कर्दम जी के आश्रम पहुंचे। विवाह से पूर्व कर्दम ने जब देवहूति के विवेक की परीक्षा ली, तो देवहूति ने होने वाले पति के बिछाए आसन पर बैठने के बजाय मर्यादा का पालन करते हुए अपना दाहिना हाथ आसन पर रखकर नीचे बैठ गईं। उनके इन दिव्य संस्कारों को देखकर कर्दम विवाह के लिए तैयार हो गए, लेकिन उन्होंने एक कठिन शर्त रखी, जैसे ही गृहस्थाश्रम में पुत्र की प्राप्ति होगी, मैं तुरंत संन्यास लेकर वन गमन कर जाऊंगा। महलों की रानी देवहूति ने सहर्ष इस शर्त को स्वीकार किया, क्योंकि वे जानती थीं कि ऐसे आत्मज्ञानी महापुरुष का संग जितने समय के लिए भी मिले, वह सौभाग्य की बात है।
संकल्प से बना हजार कमरों का अलौकिक विमान
विवाह के बाद कर्दम पुनः अपनी कुटिया में भगवद-भजन में ऐसे लीन हुए कि वे यह भी भूल गए कि उनका विवाह हो चुका है। महलों के ऐश्वर्य को छोड़कर आईं देवहूति ने बिना किसी शिकायत के वर्षों तक आश्रम की कठिन सेवा की। जब कर्दम जी की समाधि खुली, तो उन्होंने देवहूति की निष्काम सेवा से प्रसन्न होकर उन्हें दिव्य काया प्रदान की।
कर्दम ऋषि ने अपने तपोबल और संकल्प से एक ऐसा अलौकिक हजार कमरों का विमान बनाया, जो इच्छाशक्ति से चलता था और सातों महाद्वीपों सहित देवराज इंद्र के नंदन वन (स्वर्ग) तक की यात्रा कर सकता था। इसी दिव्य यात्रा के दौरान उनके घर नौ कन्याओं का जन्म हुआ।
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कर्दम ऋषि को मिली जीवन्मुक्ति
नौ कन्याओं के जन्म के बाद माता देवहूति की प्रार्थना पर साक्षात भगवान विष्णु ने उनके गर्भ में प्रवेश किया। प्रभु के गर्भ में आते ही देवताओं ने स्तुति की और भगवान अपने देदीप्यमान स्वरूप में ‘कपिल’ रूप में प्रकट हुए। इसके बाद ब्रह्मा जी ने स्वयं आकर कर्दम जी की नौ कन्याओं का विवाह नौ महान ऋषियों (मरीचि, अत्रि आदि) के साथ संपन्न कराया।
जब कर्दम ऋषि ने पालने में लेटे हुए बाल रूप भगवान कपिल को साष्टांग प्रणाम कर संन्यास की आज्ञा मांगी, तो प्रभु ने पालने से ही उन्हें ज्ञान का दिव्य उपदेश दिया- इस संपूर्ण संसार को मेरा ही रूप जानना और हर जीव में भगवद-दृष्टि रखना, तभी जीवन्मुक्ति का सच्चा आनंद मिलेगा। भगवान कपिल की आज्ञा पाकर कर्दम ऋषि ने उनकी परिक्रमा की और सब कुछ त्यागकर जंगलों की ओर चले गए, जहाँ वे अंततः पूर्ण ब्रह्मलीन होकर साक्षात नारायण में समा गए।
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