स्कंद पुराण में वर्णित है श्री हनुमानगढ़ी: नवाब का दावा झूठा, 2200 साल पहले सम्राट विक्रमादित्य ने कराया था निर्माण

श्री अयोध्या में स्थित प्रसिद्ध श्री हनुमानगढ़ी मंदिर के स्वरूप का निर्माण लगभग 2200 वर्ष पूर्व महान सनातन सम्राट विक्रमादित्य ने कराया था। लगभग 5000 वर्ष प्राचीन स्कंद पुराण में श्री अयोध्या जी में श्री हनुमान गुफा या टीले का स्पष्ट वर्णन मिलता है। सम्राट विक्रमादित्य ने अयोध्या नगरी के पुनरुद्धार के साथ ही इसे एक विशाल मंदिर-रूपी किले (गढ़) के रूप में विकसित किया था, जिसे समय के साथ गढ़ी के नाम से मान्यता मिली।
प्राचीन भारतीय सनातन वैदिक आर्ष ऐतिहासिक ग्रंथ और विभिन्न शिलालेख इस बात का ठोस प्रमाण हैं। हाल के दिनों में यह झूठा नैरेटिव प्रचारित किया जा रहा है कि हनुमानगढ़ी का निर्माण किसी इस्लामी शासक की देन है, जो पूरी तरह काल्पनिक और ऐतिहासिक तथ्यों के विपरीत है। श्री अयोध्या महात्म्य, वैदिक शास्त्रीय अन्वेषणों और श्री काशी विद्वत परिषद के विद्वानों द्वारा शोध के बाद यह ऐतिहासिक सत्य सामने आया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीराम के साकेत गमन (स्वर्ग प्रस्थान) के समय हनुमान जी ने अयोध्या में ही निवास किया था। प्रभु श्रीराम ने उन्हें कल्प-कल्प तक अयोध्या के रक्षक और श्रद्धालुओं के मार्गदर्शक के रूप में बने रहने का आशीर्वाद दिया था।
स्कंद पुराण में श्री अयोध्या और हनुमान जी के दिव्य संबंध का वर्णन
स्कंद पुराण के मुख्य रूप से वैष्णव खंड और नागर खंड में हनुमान जी और अयोध्या जी के पावन संबंध का विस्तृत उल्लेख मिलता है।
अयोध्या के सर्वशक्तिशाली रक्षक (कोतवाल): स्कंद पुराण (वैष्णव खंड, अयोध्या महात्म्य) के अनुसार भगवान श्रीराम ने हनुमान जी को अयोध्या का रक्षक नियुक्त किया था (अयोध्यां रक्षितुं त्वं चिरं तिष्ठ महाकपे). इसी कारण प्राचीन काल से यह मान्यता चली आ रही है कि “हनुमान जी के बिना अयोध्या अधूरी है”। उन्हें अयोध्या का सर्वशक्तिशाली रक्षक या ‘कोतवाल’ माना जाता है, इसलिए रामलला के दर्शन करने से पूर्व हनुमानगढ़ी में अनुमति लेना अनिवार्य माना गया है।
कलियुग में स्थायी वास: स्कंद पुराण के अनुसार, कलियुग में हनुमान जी अयोध्या में सूक्ष्म रूप में निवास करते हैं। राम जन्मभूमि क्षेत्र होने के कारण यहाँ हनुमान जी का नित्य एवं स्थायी वास है।
श्री हनुमानगढ़ी की उत्पत्ति: स्कंद पुराण (नागर खंड) के अनुसार लंका विजय के बाद लौटे हनुमान जी ने सरयू तट पर एक ऊंचे टीले पर बैठकर राम नाम का जप किया था (हनुमत्ता स्थापितं स्थानं अयोध्यायां मनोहरम्). वही तप स्थान आज हनुमानगढ़ी के रूप में विख्यात है।
धर्म रक्षक का पद: प्रभु राम ने हनुमान जी को निर्देशित किया था कि जब तक पृथ्वी पर राम कथा रहेगी, तब तक वे अयोध्या की रक्षा करेंगे। इसीलिए अयोध्या में हर मंगलवार और शनिवार को हनुमान जी की विशेष आराधना की जाती है।
360 मंदिरों के साथ निर्माण और रहस्यमयी गुफा
ऐतिहासिक और पौराणिक उल्लेखों के आधार पर, जब उज्जैन के चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य ने अयोध्या का जीर्णोद्धार कराया, तब उन्होंने 360 प्रमुख मंदिरों के साथ हनुमानगढ़ी के मूल विग्रह और किले का निर्माण कराया था।
76 सीढ़ियों और रहस्यमयी गुफा का टीला: हनुमानगढ़ी मंदिर अयोध्या के मध्य में एक ऊंचे टीले पर स्थित है, जहाँ गर्भगृह तक पहुँचने के लिए 76 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। यह स्थल प्राचीन काल की रहस्यमयी गुफा के रूप में विख्यात है।
माता अंजनी की गोद में बाल रूप: आमतौर पर हनुमान जी की मूर्तियाँ प्रभु राम के चरणों में या विशाल रूप में होती हैं, परंतु हनुमानगढ़ी के गर्भगृह में बाल हनुमान अपनी माता अंजनी की गोद में विराजमान हैं और उनके पीछे प्रभु राम की मूर्ति स्थापित है।
गुप्त सुरंगों का रहस्य: मान्यताओं के अनुसार, संकट के समय रामलला के दरबार तक पहुँचने के लिए हनुमानगढ़ी और रामजन्मभूमि के बीच एक गुप्त सुरंग मार्ग हुआ करता था।
इसे भी पढ़ें: संसद मार्च हिंसा में घायलों का हाल जानने RML अस्पताल पहुंचे जेपी नड्डा
नवाब शुजाउद्दौला के निर्माण का दावा पूरी तरह काल्पनिक
कतिपय औपनिवेशिक और पक्षपातपूर्ण इतिहासकारों द्वारा यह लिखा गया कि 18वीं शताब्दी में नवाब शुजाउद्दौला ने अपने पुत्र की बीमारी ठीक होने पर बाबा से आशीर्वाद पाकर 52 बीघा जमीन दान दी थी और मंदिर बनवाया था। विद्वानों के अनुसार यह दावा आधारहीन है और इसका कोई ऐतिहासिक या प्रामाणिक साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।
स्कंद पुराण के अनुसार अयोध्या का अलौकिक स्वरूप
स्कंद पुराण के वैष्णव खंड (अयोध्या माहात्म्य) में वर्णन है कि ‘अ’ का अर्थ ब्रह्मा, ‘य’ का अर्थ विष्णु और ‘ध’ का अर्थ रुद्र (शिव) है। तीनों देवों के योग से ‘अयोध्या’ नाम सुशोभित होता है। यह नगरी भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र पर स्थित है और इसका आकार जल में तैरती मछली जैसा बतलाया गया है। इसका मस्तक पश्चिम में गो-प्रतार तीर्थ (गुप्तार घाट) से लेकर असी तीर्थ तक है, जबकि पूर्व में पुच्छ भाग और उत्तर-दक्षिण में मध्य भाग विस्तृत है।
(लेखक संस्कृति पर्व पत्रिका के संपादक हैं।)
इसे भी पढ़ें: Yogi Cabinet Decisions: छात्राओं को मिलेगी फ्री स्कूटी और पेट्रोल
