लखनऊ के सरकारी अस्पताल में दलालों के अड्डे, तीमारदारों की बेबसी पर फल रहा है रैकेट और सो रही है पुलिस!
Lucknow News: राजधानी लखनऊ के बड़े सरकारी अस्पताल लोहिया संस्थान, केजीएमयू, पीजीआई और बलरामपुर अस्पताल अब सिर्फ मरीजों के इलाज का केंद्र नहीं, बल्कि एम्बुलेंस माफिया और निजी अस्पतालों के दलालों का मुख्य अड्डा बन चुके हैं। दूर-दराज के गांवों और कस्बों से बेहतर इलाज की उम्मीद लेकर आने वाले गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार यहाँ कदम रखते ही बीमारी से ज्यादा इन ‘गिद्धों’ के खौफ से जूझने लगते हैं। स्थिति इतनी बदतर हो चुकी है कि मरीजों को जबरन खींचने और कमीशन की बंदरबांट को लेकर इन दलालों के बीच बीच-सड़क पर लाठी-डंडे चलना और मारपीट होना अब यहाँ की ‘रोजमर्रा की बात’ बन गई है।
डर का धंधा और सड़कों पर गुंडागर्दी
अस्पताल के गेट पर तैनात ये गुर्गे सीधे-साधे तीमारदारों को यहाँ बेड खाली नहीं है, डॉक्टर हड़ताल पर हैं या वेंटिलेटर नहीं मिलेगा जैसी झूठी बातें कहकर इस कदर डरा देते हैं कि वे घबरा जाते हैं। इसके बाद शुरू होता है उन्हें उन निजी नर्सिंग होमों में शिफ्ट करने का गंदा खेल, जहाँ इन दलालों का मोटा कमीशन पहले से तय होता है।
इसे भी पढ़ें: सहारा शहर की जमीन पर बनेगा उत्तर प्रदेश का नया विधानभवन
हद तो तब हो जाती है जब एक ही मरीज को हथियाने के लिए दो अलग-अलग गैंग आपस में भिड़ जाते हैं और अस्पताल परिसर इलाज की जगह गैंगवार का मैदान बन जाता है। इस पूरे अराजक माहौल में सबसे बड़ा सवाल स्थानीय पुलिस और एलआईयू (LIU) की कार्यशैली पर उठता है। क्या चौकियों और थानों के पुलिसकर्मियों को अपनी नाक के नीचे चल रहा यह गुंडाराज दिखाई नहीं देता? या फिर सुविधा शुल्क के फेर में कानून ने अपनी आँखों पर पट्टी बांध ली है?
सच तो यह है कि जब तक कोई बड़ी वारदात नहीं होती, पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है, जिससे मुख्यमंत्री के जीरो टॉलरेंस के दावों की खुलेआम धज्जियां उड़ रही हैं। अब वक्त आ गया है कि इन अस्पतालों के बाहर सादी वर्दी में पुलिस तैनात हो और इस संगठित सिंडिकेट के खिलाफ गैंगस्टर एक्ट के तहत कड़ी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जाए।
इसे भी पढ़ें: ऐशबाग रेलवे स्टेशन पर स्काउट और गाइड ने बुझाई यात्रियों की प्यास
