बदरीनाथ धाम में क्यों नहीं बजाया जाता शंख, जानें इसके पीछे की पौराणिक कथा और वैज्ञानिक रहस्य
बदरीनाथ (उत्तराखंड): हिमालय की गोद में अलकनंदा नदी के तट पर स्थित भगवान विष्णु का भव्य बदरीनाथ मंदिर रहस्यों और प्राचीन मान्यताओं से भरा हुआ है। जहाँ देश के अन्य सभी मंदिरों में शंख की ध्वनि को शुभ और अनिवार्य माना जाता है, वहीं बदरीनाथ के प्रांगण में शंख बजाना पूरी तरह वर्जित है। सदियों से चली आ रही इस परंपरा के पीछे दो मुख्य कारण बताए जाते हैं।
माता लक्ष्मी की तपस्या में विघ्न का भय
धार्मिक कथाओं के अनुसार, इस परंपरा का मूल भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के प्रेम और त्याग में छिपा है। पौराणिक काल में जब भगवान विष्णु बदरीनाथ धाम में तपस्या में लीन थे, तब माता लक्ष्मी ने एक विशाल बेरी (बदरी) के वृक्ष का रूप धारण कर उनकी रक्षा के लिए स्वयं भी कठोर तप किया था।
तपस्या के दौरान भगवान विष्णु ने एक असुर का संहार किया। शास्त्रों के अनुसार, विजय के बाद शंख बजाना विजय का प्रतीक होता है, लेकिन श्रीहरि ने शंख नहीं बजाया। मान्यता है कि भगवान विष्णु नहीं चाहते थे कि शंख की तीव्र ध्वनि से माता लक्ष्मी का ध्यान भटके या उनकी तपस्या में कोई बाधा आए। तभी से मंदिर परिसर में शंख का उपयोग न करने की परंपरा स्थापित हो गई।
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वैज्ञानिक कारण: ध्वनि कंपन और हिमस्खलन का खतरा
धार्मिक आस्था के साथ-साथ इस परंपरा के पीछे एक प्रबल प्राकृतिक कारण भी माना जाता है। बदरीनाथ धाम ऊंचे और बर्फ से ढके पहाड़ों के बीच स्थित है। भौतिक विज्ञान के अनुसार, शंख की ध्वनि से उत्पन्न होने वाली तरंगें (Frequency) बहुत तीव्र होती हैं। सर्दियों में यहाँ भारी बर्फबारी होती है। यदि शंख जैसी तेज ध्वनि पहाड़ों से टकराती है, तो उससे पैदा होने वाला कंपन बर्फ की संवेदनशील परतों को हिला सकता है, जिससे हिमस्खलन का बड़ा खतरा पैदा हो सकता है। प्रकृति के संतुलन को बनाए रखने और श्रद्धालुओं की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए भी यहाँ शांति बनाए रखना अनिवार्य है।
शांति और दिव्यता का अनुभव
भले ही यहाँ शंख न बजता हो, लेकिन बदरीनाथ में प्रतिदिन विधि-विधान से होने वाली आरती, वेद पाठ और मंत्रोच्चार श्रद्धालुओं को एक अलग ही मानसिक शांति प्रदान करते हैं। यहाँ की नीरवता में ही प्रभु का वास माना जाता है, जो श्रद्धालुओं को आध्यात्मिकता की गहराई में ले जाती है।
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