अज्ञान का अंधकार मिटाकर ज्ञान का सूर्य उदय करती है गायत्री साधना: स्वामी शिवाधर दुबे महाराज

swami shivadhar dubey maharaj

तीर्थगुरु पुष्कर: ब्रह्मा जी की आदि तपोस्थली पुष्कर में आयोजित महायज्ञ के पावन अवसर पर स्वामी श्रीगुरु शिवाधर दुबे महाराज ने गायत्री मंत्र और यज्ञ परंपरा की सूक्ष्म व्याख्या करते हुए मानवता को आत्म-जागरण का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि गायत्री केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि चेतना का वह दिव्य प्रकाश है जो मनुष्य के भीतर सोई हुई दिव्यता को जागृत करने की क्षमता रखता है।

महाराज जी ने यज्ञ के वास्तविक स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल अग्नि में समिधा और आहुतियां देने का कर्म मात्र नहीं है। उन्होंने आध्यात्मिक संदेश देते हुए कहा, यह महायज्ञ अपने भीतर के विकारों—क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह को समर्पित करने का दिव्य अवसर है। जैसे हम अग्नि में समिधा अर्पित करते हैं, वैसे ही हमें अपने नकारात्मक भावों को भी समर्पित करना चाहिए, तभी सच्चे अर्थों में यज्ञ पूर्ण होता है।

गायत्री: बुद्धि की निर्मलता और जीवन जीने की कला

स्वामी जी ने गायत्री साधना के महत्व को रेखांकित करते हुए बताया कि जो साधक श्रद्धा और नियमपूर्वक इस मार्ग पर चलता है, उसके जीवन में अकल्पनीय परिवर्तन आते हैं।

निर्मल बुद्धि: गायत्री साधना से बुद्धि शुद्ध होती है और हृदय में करुणा का भाव जागता है।

पवित्र संकल्प: गायत्री को धारण करने से मनुष्य का हर विचार और कर्म पवित्र होने लगता है।

जीवन का उद्देश्य: यह शक्ति न केवल व्यक्तिगत उन्नति, बल्कि राष्ट्र कल्याण के लिए भी प्रेरित करती है।

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यहाँ का प्रत्येक कण तप की गाथा कहता है पुष्कर

पुष्कर की दिव्यता पर चर्चा करते हुए महाराज ने कहा कि यह भूमि स्वयं ब्रह्मा जी की साधना की साक्षी रही है। उन्होंने श्रद्धालुओं को संदेश दिया कि पुष्कर में किया गया जप और तप अनंत गुना फलदायी होता है। उन्होंने भक्तों का आह्वान किया कि जैसे पुष्कर का सरोवर निर्मल है, वैसे ही मनुष्य को अपने भीतर विचारों और भावनाओं का एक पवित्र सरोवर बनाना चाहिए।

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दिव्य प्रकाश को जीवन में धारण करने का आह्वान

महाराज ने अंत में सभी भक्तों और साधकों को इस दिव्य यज्ञ में सहभागी बनने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि ऋषियों की यह महान परंपरा इसलिए अमर है क्योंकि यह हमें संयम, सेवा, साधना और समर्पण का मार्ग दिखाती है। जो साधक इस मार्ग पर निष्ठा से चलता है, वह स्वयं प्रकाशित होकर संपूर्ण संसार को आलोकित करने का माध्यम बनता है।

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