संकल्प से सिद्धि की ओर शत (100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ
– डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय
शत (100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ आध्यात्मिक, आत्म-साक्षात्कार एवं वैज्ञानिक ऊर्जा के रूपान्तरण का सुमेलित महाप्रयोग है। यह भारतीय संस्कृति में न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह सूक्ष्म वैज्ञानिक चेतना का अद्भुत संगम है। सनातन वैदिक एवं आध्यात्मिक परम्परा की संवाहक भारतभूमि में ऋषियों द्वारा सदा से ही चराचर जगत के कल्याण हेतु बहुत से याज्ञिक महाप्रयोग होते रहे हैं। चूँकि भारत ही वैदिक यज्ञ-यज्ञादि के लिए शास्त्रानुसार उपयुक्त भूमि है, जहाँ युगों-युगों से याज्ञिक महाप्रयोग होते रहे हैं। वैसे ही तीर्थगुरु पुष्कर में महर्षि विश्वामित्र द्वारा शत (100) गायत्रीपुरश्चरण करके सृष्टि में आमूल-चूल परिवर्तन किया गया था। जिसका वर्णन वेद से लेकर ब्रह्मपुराण में मिलता है। वर्तमान में भी समस्त विश्व की कुछ ऐसी स्थिति बनी हुई है जिसका परिणाम बहुत ही भयावह रहने वाला है।
विश्व में जब भी कोई कठिन समस्या आती है तब वैश्विक समाधान हेतु चाहे वह आध्यात्मिक स्तर का हो, वैज्ञानिक स्तर का हो या सामाजिक स्तर का हो सबकी दृष्टि बस एक ही ओर आशा के साथ टिक जाती है और वह है दैविक शक्तियां और इन दैविक शक्तियों को जागृत करने के लिए भारतीय कर्मकाण्ड की प्राच्य परम्परा जिसे व्यवस्थित ढंग से हमारे ऋषियों ने संभाल करके रखा है और वे बहुत ही कारगर सिद्ध होती हैं। इसके साथ ही हजारों वर्षों से भारतीय ज्ञानपरम्परा के मूल वेद एवं पुराणों पर निरन्तर उच्चस्तरीय शोधकार्य होते रहे हैं और उसका परिणाम यह है कि नित्य प्रतिदिन हमारे धर्मशास्त्र अपनी प्रमाणिकता को सिद्ध करते हैं।
हमारे यहाँ देवता-आराधना की आध्यात्मिक पद्धति इतनी विहंगम है जिसके माध्यम से समृद्धिपूर्वक अनुष्ठान आदि करने पर सकारात्मक ऊर्जा का सृजन होता है। यज्ञादि की परम्परा और उसकी एक दीर्घ-श्रृंखला हमारे शास्त्रों में प्राप्त है। उदाहरण की बात करें तो, जब भगवान श्रीराम एवं माता सीताजी का जन्म की बात करें तो दोनों का जन्म यज्ञ से सम्बन्धित हैं।
इसके साथ ही भगवान श्रीरामजी ने लंका विजय के लिए भी 100 योजन तक समुद्र पर पुल बांधने हेतु तीन दिन तक एक भव्य यज्ञ का अनुष्ठान किया था। उन्हीं सभी शास्त्रीय सन्दर्भों को ध्यान करके यह विषय ज्ञात हुआ कि जब भी मानवता पर कोई भीषण समस्या आती है तो उन समस्याओं के समाधान हमारे वैदिक यज्ञपरम्परा में ही प्राप्त होते हैं। ऐसी ही विकट समस्या आज विश्वभर में दिखायी दे रही है और उसके सम्यक् समाधान के लिए यह विराट् महायज्ञ किया जा रहा है।
यज्ञ का स्वरूप एवं इसकी आवश्यकता की बात करें तो तीर्थगुरु पुष्कर, राजस्थान में इस कलयुग का यह प्रथम शत (100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ हो रहा है, इसके प्रेरणा-स्त्रोत हैं परम श्रद्धेय महामण्डलेश्वर यज्ञसम्राट् स्वामी श्रीप्रखर महाराज। समस्त विश्व में शान्ति एवं वैश्विकस्तर पर आतंकवाद के शमन के साथ ही सनातन वैदिकधर्म की स्थापना हो। ऐसे कई महत्वपूर्ण विषयों को लेकर इस यज्ञ का शंखनाद हुआ है उसके पश्चात यह महायज्ञ 8 मार्च, 2026 को आरम्भ होकर 19 अप्रैल, 2026 तक पूर्णाहुति के साथ सम्पन्न होगा। मानव इतिहास में समय-समय पर ऐसे यज्ञ आयोजित होते रहे हैं लेकिन यह महायज्ञ जो केवल धार्मिक विधि-विधान या सांस्कृतिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि सभ्यता के आत्मबोध, सामूहिक चेतना और वैश्विक दिशा को प्रभावित करने वाला हैं।
प्रस्तुत “शत(100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ” उसी श्रेणी का एक अद्वितीय, विराट् और दिव्य आयोजन है, जो सनातन वैदिकपरम्परा की गहन साधना, अनुशासन और सामूहिक ऊर्जा का वैश्विक समकालिक संकल्प के साथ शास्त्रीय विधि से होने वाला कलिकाल का प्रत्यक्ष उदाहरण है।
यह आयोजन केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक संगठित आध्यात्मिक प्रयोग है, जहाँ मन्त्र, यज्ञ, साधना और संकल्प के माध्यम से मानवता के कल्याण, मानसिक शान्ति, नैतिक जागरण और वैश्विक समरसता की स्थापना को स्थापित करने का एक विहंगम प्रयास किया जा रहा है। सतयुग में पुष्करतीर्थ में श्रीब्रह्मा जी द्वारा एवं महर्षि विश्वामित्र द्वारा अनेक महत्त्वपूर्ण यज्ञ अनुष्ठान किये गये, जिसमें शत (100) गायत्रीपुरश्चरणजप महत्वपूर्ण था।
उन्हीं सभी महत्त्वपूर्ण शास्त्रीय तथ्यों को वेद एवं पद्मपुराण जैसे और भी प्रमाणिक ग्रन्थों से प्रमाण के रूप में तथ्यों को ग्रहण करके एवं काशी के विशिष्ट विद्वानों के साथ विचार-विमर्श के उपरान्त परम महामण्डलेश्वर यज्ञसम्राट् स्वामी श्रीप्रखर महाराज द्वारा महाकुम्भ तीर्थराज प्रयागराज में एक दिव्य अलौकिक संकल्प से विश्वभर में चल रही विभीषिकाओं से मुक्ति दिलाने हेतु एवं विश्वकल्याणार्थ इस महायज्ञ का याज्ञिक महाप्रयोग शास्त्रीय विधि-विधान द्वारा करवाया जा रहा है।
यदि हम शास्त्रीय पद्धति एवं परम्परा की बात करें तो इस महायज्ञ की संरचना अत्यंत सुव्यवस्थित, वैज्ञानिक और शास्त्र सम्मत है। इसमें निम्नलिखित प्रमुख आयाम सम्मिलित हैं। 08 मार्च, 2026 से 19 अप्रैल, 2026 तक कुल 2000 ब्राह्मणों द्वारा प्रतिदिन 60 लाख जप किया जा रहा है और शास्त्रानुसार उसके दशांश हवन, तर्पण एवं मार्जन के साथ त्रिकालिक संध्यानिष्ठ गायत्रीपुरश्चरण करने वाले विप्रों को भोजन प्रसाद भी करवाया जा रहा है। संकल्पित कुल 27 करोड़ गायत्रीमन्त्र जप की संख्या केवल परिमाण नहीं, बल्कि एक सामूहिक चेतना की पराकाष्ठा है। इतने व्यापकस्तर पर मन्त्रजप का सुव्यवस्थित और अनुशासित आयोजन वैश्विकस्तर पर अत्यंत दुर्लभ है।
2000 से अधिक ऋत्विजों की सहभागिता के साथ प्रशिक्षित वैदिक विद्वानों द्वारा निरन्तर यज्ञीय क्रियाओं का संचालन, इस आयोजन को शास्त्रीय प्रमाणिकता और अनुशासन प्रदान करने वाला है। 200 यज्ञ कुण्डों में सूर्योदय से सूर्यास्त तक यज्ञ होना इसकी भव्यता और सामूहिक ऊर्जा का सजीव प्रमाण है। 43 दिनों तक निरन्तर चलने वाला यह अनुष्ठान केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक साधना-श्रृंखला है, जिसमें निरन्तरता, अनुशासन और आध्यात्मिक समर्पण का अद्वितीय समन्वय है।
इस भव्य दिव्य विप्र-महाकुम्भ का आयोजन राजस्थान के पुष्करतीर्थ में स्थित मणिवेदिकापीठ गायत्री शक्तिपीठ के मध्य (100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ के रूप में हो रहा है, जहां एक ओर पहाड़ी पर माता सावित्री तथा दूसरी ओर पहाड़ी पर माता गायत्री का भव्य स्वरूप विराजमान हो रहा है। पुष्कर भारतीय आध्यात्मिक परम्परा में एक अद्वितीय स्थान रखता है, जहाँ ब्रह्मा जी का एकमात्र प्राचीन मन्दिर स्थित है और अनादिकाल से यहाँ यज्ञ, तप और साधना की परम्परा प्रवाहित होती रही है। ऐसे पवित्र स्थल पर इस स्तर का आयोजन, उसकी आध्यात्मिक ऊर्जा को और अधिक व्यापक और प्रभावी बनाता है।
इस महायज्ञ का संचालन एक सुदृढ़ प्रशासनिक, आध्यात्मिक एवं वैदिक संरचना के अन्तर्गत किया जा रहा है। इस महायज्ञ के संकल्प को वैश्विक स्तर पर सफल बनाने हेतु कई प्रकार के धर्मशास्त्रीय नियमों का न केवल विधि-विधान के साथ कड़ायी से पालन किया जा रहा हैबल्कि इसमें सूचिता का भी विशेष ध्यान रखा जा रहा है। जिसमें प्रथम तो यह कि गायत्रीपुरश्चरण केवल ब्राह्मणों के धन से एवं ब्राह्मणों के द्वारा ही किया जाता है और यहाँ भी यह इसी विधि से हो रहा है। यह विशिष्ट महायज्ञ त्रैकालिक संध्या-गायत्री-तर्पण करने वाले विश्वभर में रहने वाले विप्रों के धन एवं अन्य आवश्यक सामग्री के सहयोग से हो रहा है।

विद्वानों की मानें तो अभी तक गायत्रीपुरश्चरण ब्राह्मण अपने तपोबल एवं तेज को बढ़ाने के लिए करते रहे हैं, लेकिन समस्त विश्व के कल्याण के संकल्प से स्वामी जी द्वारा शत (100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ का कलिकाल में जो अकल्पनीय संकल्प किया गया है यह वास्तव में सराहनीय कार्य है। यह समन्वय सुनिश्चित करता है कि आयोजन शास्त्रसम्मत, अनुशासित और वैश्विक स्तर पर प्रस्तुत करने योग्य है। यह महायज्ञ केवल व्यक्तिगत साधना का माध्यम नहीं, बल्कि एक व्यापक वैश्विक दृष्टि का प्रतिनिधित्व करता है। इससे मानवता में आन्तरिक शान्ति और मानसिक संतुलन की स्थापना, आतंकवाद का समूल विनाश, हिंसा और नैतिकपतन के विरुद्ध आध्यात्मिक प्रतिरोध, पर्यावरणीय शुद्धि एवं सकारात्मक ऊर्जा के प्रसार के साथ ही वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना को व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करना, सनातनधर्म की वैश्विक स्वीकार्यता और समझ को इस आयोजन के माध्यम से भारत की आध्यात्मिक नेतृत्व क्षमता का वैश्विकस्तर पर पुनःस्थापना, वैदिकयज्ञ परम्परा का वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक पुनरुत्थान, मानसिक स्वास्थय और सामाजिक सन्तुलन में योगदान, वैश्वीकस्तर पर सकारात्मक ऊर्जा और शान्ति का प्रसार भारत के सांस्कृतिक विकास को भी सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध होगी।
यह शत (100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ मानवचेतना को उच्चस्तर पर ले जाने में भी सहायक सिद्ध होगा। इसकी विश्वव्यापकता, शास्त्रीयता, अनुशासन और उद्देश्य इसे वैश्विकस्तर पर अद्वितीय बनाने में मील का पत्थर सिद्ध होगा। यह महायज्ञ न केवल विश्व में शान्ति स्थापित करने में महनीय योगदान की क्षमता रखता हैं बल्कि यह विश्व को संदेश देने में भी सक्षम है, जो बहुत ही सराहनीय कार्य है। जब मानवता एकत्रित होकर सकारात्मक संकल्प के साथ आगे बढ़ती है, तो वह न केवल अपने भीतर परिवर्तन लाती है, बल्कि समस्त विश्व के लिए एक नई दिशा भी निर्धारित करने मे भी सहायक सिद्ध होती हैं।
इस महायज्ञ को वैश्विक संकल्पके साथ सिद्धि को प्राप्त करवाने वाले साधक संन्यासी महामण्डलेश्वर यज्ञसम्राट् स्वामी श्रीप्रखर महाराज है। इस महायज्ञ को पुष्कर जैसे पवित्र धार्मिकक्षेत्र मे करने की आवश्यकता क्यों? यदि इस विषय पर चिन्तन किया जाए तो बहुत ही महत्त्वपूर्ण तथ्य शास्त्रों से निकलकर आते हैं। भगवान ब्रह्मा जी और विश्वामित्र जी ने इस पावन पवित्र भूमि पर बहुत से यज्ञीय प्रयोग किये थे। इसलिए इस महायज्ञ के द्वारा विश्व में एक विशेष परिवर्तन की आशा से महाराज जी पुष्कर में इस महायज्ञ को करवा रहे हैं। वेद, पुराणों में पुष्करतीर्थ के विषय में अत्यंत मार्मिक वर्णन मिलते हैं। यथा
महोदधेस्तुल्यो चान्योऽस्ति जलाशयः।
तथा वै पुष्करस्यापि समं तीर्थं न विद्यते।।
पद्मपुराण में वर्णित इस श्लोक का अर्थ है कि जैसे समुद्र के समान कोई जलाशय नहीं है, वैसे ही पुष्कर के समान कोई तीर्थ नहीं है। पुष्कर को तीर्थगुरु एवं ब्रह्मतीर्थ भी कहा जाता है। देवीपुराण में पुष्कर को नौ पवित्र अरण्यों में से एक बताया गया है। पद्मपुराण के सृष्टिखण्ड में वर्णित कथा के अनुसार एक समय यहाँ पर वज्रनाभ नाम का एक अत्यंत क्रूर राक्षस रहता था। उस राक्षस के आतंक से मुक्ति दिलाने के लिए भगवान ब्रह्माजी ने अपने प्रिय पुष्प कमल का प्रहार कर उस राक्षस को मार दिया था। तब उस कमल की पंखुड़ियाँ पुष्कर के तीन स्थानों पर गिरीं और जहाँ गिरीं वहीं जलधारा फूट पड़ी।
कालान्तर में ये तीन स्थान ज्येष्ठपुष्कर, मध्यपुष्कर और कनिष्ठपुष्कर के नाम से विख्यात हैं। ज्येष्ठपुष्कर के देवता ब्रह्मा जी हैं, यही मुख्य सरोवर है जिसे ब्रह्मपुष्कर कहते हैं। मध्य पुष्कर के देवता विष्णु हैं और कनिष्ठ पुष्कर के देवता शिव हैं, जिसे हम बूढ़ापुष्कर के नाम से जानते हैं। विष्णुसहस्त्रनाम में भगवान विष्णु के 108 नामों में एक नाम पुष्कर बताया गया है- पुष्करं पुष्कराक्षं च वाराहं धरणीधरम्।
यदि ऐतिहासिक दृष्टि से विचार करें तो विश्वभर में एकमात्र ब्रह्मा मन्दिर पुष्कर में ही है। भगवान राम ने अपने पिताश्री दशरथ जी का श्राद्ध भी मध्यपुष्कर के निकट गयाकुण्ड में ही किया था। माना जाता है कि महाभारत में पाण्डवों ने भी वनवास काल के दौरान कुछ दिन यहीं बिताए थे, उन्हीं के नाम से यहाँ पञ्चकुण्ड नामक स्थान प्रसिद्ध है।

वनपर्व के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने भी पुष्कर में दीर्घकाल तक तपस्या की थी। इसी पुष्कर को वेदमाता गायत्री की जन्मभूमि भी माना जाता है, यहीं शिव, पार्वती और अन्य देवी, देवताओं के शक्तिपीठ भी हैं। प्राचीनकाल से ही पुष्करराज में ऋषि-मुनि और संत महात्माओं के आश्रम रहे हैं। पुष्कर केवल तीर्थ ही नहीं, तीर्थगुरु भी है। पृथ्वी पर जितने भी तीर्थ हैं वहाँ स्नान एवं दानादि करने पर ही पाप से मुक्ति मिलती है, परन्तु पुष्करतीर्थ के दर्शन मात्र से ही समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। यही नहीं, केवल पुष्कर का दूरस्थ स्थान पर अनायास ही स्मरण हो जाने से भी पाप नष्ट हो जाते हैं-फिर दर्शन, स्नान, दान का तो कहना ही क्या है! पुष्कर का स्मरण ही पुष्कर स्नान है – स्मरण मात्र से ही स्नान का फल मिल जाता है। ऐसा विस्तार से वर्णन नारदपुराण में मिलता है। यथा-
पुष्करं चिन्तयेद् भक्त्या स तत्स्नान फलम् लभेत्।
प्राचीनकाल से शास्त्रों की ऐसी मान्यता है कि गुरु और आचार्यों द्वारा गुरुमन्त्र की दीक्षा तथा शिष्यों द्वारा उनका जप-अनुष्ठान पुष्करराज में शीघ्र सिद्धि के लिए किया जाता रहा है। ब्रह्मवैवर्तपुराण में गुरुमन्त्र की दीक्षा के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। यही कारण है कि पुष्कर सभी तीर्थों का गुरु कहलाता है।
तीर्थ धाम इन्द्र सब देवा । आई करहिं पुष्कर पद सेवा॥
दश कोटि सहस्राणि तीर्थानां वै महामते।
सान्निध्यं पुष्करे येषां त्रिसंध्यं कुरुनन्दन।। महाभारत 82/21।।
यही नहीं- सभी तीर्थों का फल बिना पुष्कर सेवन के सफल भी नहीं होता है। पुष्कर में भगवान् के नाभि कमल में पहले देवताओं और फिर ऋषियों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? इस विषय पर भी अत्यंत मार्मिक वर्णन मिलता है-
प्रभावं पद्मनाभस्य स्वपत: सागराम्भसि।
पुष्करे वै यथोद्भूता देवाः सर्षिगणाः पुरा।।
पुष्करतीर्थ, गुरुमन्त्र की भाँति शीघ्र फलदायी, सिद्धि और भक्ति-मुक्ति का प्रदाता है। पुष्करतीर्थ कर्म और मोक्ष की क्रीड़ास्थली है। यह सभी तीर्थों में श्रेष्ठ है। त्रिभुवनगुरु ब्रह्माजी की दृष्टि से पवित्र है-“त्रिभुवनगुरुणां ब्रह्मणा दृष्टिपूतम्”। इसी कारण पुष्कर को सब तीर्थों का गुरु कहते हैं। सभी सम्प्रदायों, आचार्यों, संत-महात्माओं और ऋषि-मुनियों के यहाँ आश्रम हैं और मंदिर एवं गुफाएँ भी हैं। इतना ही नहीं, शास्त्रों में पुष्कर को पृथ्वी का नेत्र भी कहा जाता है अर्थात् यहाँ आकर सृष्टि को देखने की दृष्टि मिलती है। तीर्थगुरु श्रीपुष्कर की छत्र-छाया में आकर मनुष्य देवतुल्य हो जाता है। दिव्यशक्ति से सम्पन्न देवता, दैत्य तथा ऋषि-मुनि यहाँ तपस्या कर महान पुण्य के भागी हुए हैं और परमसिद्धि को प्राप्त किये हैं।
पुष्करतीर्थ पुण्यभूमि है- पुष्करं पुण्य निलयं तीर्थब्रह्म निषेवितम्। पद्मपुराण में लिखा है कि जो कोई मन से भी पुष्करतीर्थ के सेवन की इच्छा रखता है, उस मनस्वी के सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। महाभारत में तो यहाँ तक कहा गया है कि जो सायं-प्रातः पुष्करतीर्थ का स्मरण कर हाथ जोड़ प्रणाम करता है, वह समस्त तीर्थों में आचमन करने का फल प्राप्त कर लेता है। यथा-
सायं प्रातः स्मरेद्यस्तुः पुष्कराणि कृताञ्जलि।
उपस्पष्टं भवेतेनः सर्वतीर्थेषु भारतः।।
पुष्करक्षेत्र में स्नान, ध्यान, दान, संध्या, श्राद्ध-तर्पण, तपस्या और प्रवास का अक्षय फल प्राप्त होता है, इसीलिए कहा गया है–
पुष्करे दुष्करो वासः पुष्करे दुष्करं तपः।
पुष्करे दुष्करं दानं गन्तुं चैव सुदुष्करम्।।
यही नहीं, पुष्करक्षेत्र में मृत्यु को महोत्सव, भिक्षा से जीवन निर्वाह को भी जीवन का श्रृंगार कहा गया है। भला पुष्करतीर्थ की समानता और कौन कर सकता है। जीवों पर कृपा करने के उद्देश्य से ही ब्रह्माजी ने पुष्करतीर्थ को प्रकट किया है। “पुष्करं पुष्करं तीर्थ”। पुष्कर से बढ़कर इस पृथ्वी पर दूसरा कोई तीर्थ नहीं है, इसीलिए मनुष्य को प्रयत्नपूर्वक पुष्करतीर्थ का सेवन अवश्य करना चाहिए। इस महायज्ञ के माध्यम से महाराज जी ने लाखों लोगों को ऐसा अवसर प्रदान किया है जो भगवती गायत्री की कृपा एवं कई जन्मों के पुण्य से ही संभव हो सकता है। वे बड़भागी लोग हैं जिन्हें इस महायज्ञ में किसी भी प्रकार जप, तप एवं साधना का अवसर मिला है तो हम यह कह सकते है कि उनका जीवन निश्चित रूप से धन्य हो जाएगा।
यदि हम निष्कर्ष रूप में बात करें तो यह शत (100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ ब्राह्मणों में उनके अस्तित्व की खोज की विशिष्ट पहल है, जिसे महाराजश्री द्वारा त्रैकालिकसंध्या, गायत्रीजप के प्रति जागरूक करके भूले हुए संस्कार एवं तपोनिष्ठ ब्राह्मण को उनके कर्तव्य के साथ जोड़कर एक अलौकिक कार्य किया जा रहा है। आजकल शिखा सूत्र विहीन संध्या-गायत्री जपने वाले ब्राह्मणों की संख्या बढ़ती जा रही है, जिसके चलते यह वर्ग अपनी दुर्दशा को प्राप्त हो रहा है।
इसे भी पढ़ें: कौन हैं प्रफुल्ल हिंगे, महाराष्ट्र की राजनीति और समाज सेवा में उभरता एक जाना-माना चेहरा
ब्राह्मण उपनीत होकर द्विज हो जाता है और नियमित संध्या-गायत्री करके ब्रह्मवर्चस्व को प्राप्तकर तपोधन हो जाता है और इसके बाद अपने वैदिक कर्मकाण्ड द्वारा समाजहित में कार्य करके सभी का कल्याण करता है। आजकल अनुष्ठान, कर्मकाण्ड एवं हर प्रकार की शान्ति हेतु कथाएं भी बहुत हो रही है लेकिन उनका सम्यक् प्रकार से फल किसी को प्राप्त नहीं हो पा रहा है ऐसा क्यों? क्योंकि जब कोई व्यक्ति पिस्टल आदि को खरीदता है अपनी सुरक्षा हेतु तो सबसे पहले उसके नियम एवं विधि को पालन करते हुए प्रथमतया लाइसेन्स लेना पड़ता है। फिर व्यवहार में रक्षा हेतु उसमें गोली डालनी पड़ती है।
सटीक निशाना लगाकर लक्ष्य वेधा जाता है, कहने का आशय है कि विप्रों को शास्त्रीय विधि-पूर्वक उपनीत करके द्विज होने की विधि का पालन करना चाहिए अर्थात लाइसेन्स प्राप्त करना, उसके बाद नियमित त्रैकालिक संध्या, गायत्री करके स्वस्थ होना अर्थात स्वयं को पुष्ट करना फिर उसके बाद ही अपने शिष्य एवं यजमान आदि का अनुष्ठान करने पर ही संकल्प सिद्ध होगा। यदि स्वयं विधि-पूर्वक अनुष्ठान आदि नहीं करते हैं तो कार्य सिद्ध नहीं होगा। इस महायज्ञ का महत्वपूर्ण विषय यह है कि इस शत (100) गायत्रीपुरश्चरण महायज्ञ में शास्त्रीय विधि को किसी प्रकार से अनदेखा न करके सविधि पूर्वक किया जा रहा है। जो वर्तमान में कुछ संस्थाओं के द्वारा अशास्त्रीय विधि से पाखंड पोषण करके समाज को दिग्भ्रमित करने का प्रयास किया जा रहा है।
वास्तव में वितंडा ही हो रहा है सनातन धर्मियों के साथ। इस महायज्ञ के माध्यम से पुष्करतीर्थ भी पुनः जागृत हो गया है अर्थात रिचार्ज होकर पुनः अपनी पूर्व स्थिति में आ गया है जैसा की यहाँ के तीर्थपुरोहित बता रहे हैं। इतना ही नहीं जितनी निष्ठा से यहाँ महाराज के सहित इससे जुड़े एक-एक पात्र अपने-अपने दायित्वों का निर्वहन कर रहे हैं, निश्चित रूप से यह महायज्ञ संकल्प से सिद्धि की ओर पूर्णता को प्राप्त हो जायेगा इसी विश्वास से श्रीराघवशरणानुरागी यह विश्वव्यापी संकल्प पूर्ण हो ऐसी भगवती से प्रार्थना करते हैं।
इसे भी पढ़ें: सम्राट चौधरी के ‘सम्राट’ बनने की कहानी, विरासत और संघर्ष का अनूठा सफर
