सम्राट चौधरी के ‘सम्राट’ बनने की कहानी, विरासत और संघर्ष का अनूठा सफर
पटना: बिहार की राजनीति में आज जब भी किसी आक्रामक और कुशल रणनीतिकार का नाम लिया जाता है, तो सम्राट चौधरी का चेहरा सबसे पहले उभरता है। उपमुख्यमंत्री और भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने वाले सम्राट चौधरी अब बिहार के मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभालने जा रहे है। उन्होंने अपनी मेहनत से न केवल अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ाया, बल्कि भाजपा की राज्य में सरकार बनाने में सफल रहे।
पारिवारिक पृष्ठभूमि और राजनीतिक विरासत
सम्राट चौधरी का जन्म 16 नवंबर, 1968 को मुंगेर के लखनपुर में हुआ था। उनकी रगों में राजनीति जन्म से ही दौड़ रही है। उनके पिता शकुनी चौधरी बिहार की राजनीति के कद्दावर नेता रहे हैं, जो सात बार विधायक और सांसद रहे। सम्राट ने राजनीति की शुरुआती बारीकियां अपने पिता से सीखीं, लेकिन अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने संघर्ष का रास्ता चुना।
सबसे कम उम्र के मंत्री बनने का गौरव
सम्राट चौधरी के नाम बिहार राजनीति का एक बड़ा कीर्तिमान दर्ज है। साल 1999 में, राबड़ी देवी की सरकार में वे मात्र 31 साल की उम्र में कृषि मंत्री बने थे। वे उस समय बिहार के सबसे कम उम्र के मंत्रियों में से एक थे। उन्होंने अपने राजनीतिक सफर में राजद (RJD), जदयू (JDU) और अब भाजपा (BJP) में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं। 2017 में भाजपा में शामिल होने के बाद उनका कद लगातार बढ़ता गया।
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भाजपा में संकटमोचक की भूमिका
भाजपा ने सम्राट चौधरी को 2023 में प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी, जिसके बाद उन्होंने पार्टी में एक नई ऊर्जा का संचार किया। सम्राट चौधरी बिहार में कुशवाहा समाज के सबसे बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। पार्टी ने उनके जरिए पिछड़ों और अति-पिछड़ों को एकजुट करने में बड़ी सफलता पाई।
नीतीश कुमार के साथ गठबंधन टूटने के दौरान उन्होंने अपनी मुरैठा (पगड़ी) को लेकर जो कसम खाई थी, वह बिहार की राजनीति में एक बड़ा टर्निंग पॉइंट साबित हुई। 2024 में बिहार में बनी नई एनडीए सरकार में उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया, जो उनके संगठनात्मक कौशल और नेतृत्व क्षमता पर पार्टी के भरोसे को दर्शाता है।
आज सम्राट चौधरी न केवल एक राजनेता हैं, बल्कि बिहार के युवाओं के लिए एक प्रेरणा भी हैं। उनका ध्यान राज्य में बुनियादी ढांचे के विकास, कानून-व्यवस्था की मजबूती और युवाओं को रोजगार दिलाने पर केंद्रित है।
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