कौन हैं निहंग सिख, क्या है इनका गौरवशाली इतिहास, जानें सेवादार से जांबाज सैनिक बनने का सफर
Newschuski Digital Desk: सिख धर्म के भीतर निहंग सिख या निहंग सिंह को बेहद सम्मानित और पारंपरिक योद्धा का दर्जा प्राप्त है। चटक नीले रंग के वस्त्र, आसमान छूती बड़ी पगड़ी (दस्तार) और पारंपरिक हथियारों से लैस निहंगों की पहचान पहली नजर में ही सबसे जुदा नजर आती है। सिख इतिहास में इन्हें हमेशा एक रक्षक और जांबाज योद्धा के रूप में देखा गया है। निहंग शब्द मूल रूप से फारसी भाषा से आया है, जिसका अर्थ होता है निष्कलंक या निडर यानी ऐसा योद्धा जिसे मौत का कोई भय न हो।
इस संप्रदाय की शुरुआत साल 1699 में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह जी द्वारा खालसा पंथ की स्थापना के साथ मानी जाती है। कुछ इतिहासकार इनकी विशेष पोशाक का संबंध गुरु गोविंद सिंह के छोटे बेटे साहिबजादा फतेह सिंह द्वारा पहने गए नीले वस्त्रों की ऐतिहासिक घटना से भी जोड़ते हैं।
मुगलों से लोहा लेने वाले छापामार युद्ध के उस्ताद
18वीं शताब्दी में जब सिख समुदाय मुगल शासकों और अहमद शाह अब्दाली जैसे क्रूर विदेशी आक्रांताओं के हमलों का सामना कर रहा था, तब निहंग सिखों ने पूरे समाज की ढाल बनकर हिफाजत की। ये योद्धा गुरिल्ला युद्ध (छापामार रणनीति) में माहिर थे। 19वीं सदी की शुरुआत में महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में निहंग सिखों की सेना (अकाली) ने कई ऐतिहासिक जंग जीतीं, जिसमें निहंग योद्धा अकाली फूलो सिंह का योगदान स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है।
पंजाब के वरिष्ठ विश्लेषकों के अनुसार, निहंगों को गुरु की लाडली फौज भी कहा जाता है। इनका पूरा जीवन गुरबाणी, सिख इतिहास, रहित मर्यादा, घुड़सवारी, शस्त्र-विद्या (गतका), कड़े अनुशासन और निस्वार्थ सेवा के इर्द-गिर्द घूमता है।
भुजंगी से योद्धा बनने का सफर, कैसे होती है दीक्षा
कोई भी सिख जन्म से निहंग नहीं होता। बेहद कठोर अनुशासन और धार्मिक नियमों की कसौटी पर खरा उतरने के बाद ही यह गौरव प्राप्त होता है।
अमृत छकना (दीक्षा): निहंग बनने की पहली और अनिवार्य शर्त यह है कि व्यक्ति को पूरी मर्यादा के साथ अमृत पान करना होता है और सिख आचार संहिता का कड़ाई से पालन करना होता है।
सेवादार के रूप में शुरुआत: शुरुआती चरण में नए सदस्य को भुजंगी कहा जाता है। उसे छावनी या डेरे में रहकर गुरुद्वारे की सेवा, लंगर बनाना, घोड़ों की देखरेख और साफ-सफाई जैसे बुनियादी काम करने होते हैं।
कठोर सैन्य व आध्यात्मिक प्रशिक्षण: सेवा के साथ-साथ इन्हें सिख युद्ध कला गतका और घुड़सवारी में पारंगत किया जाता है। साथ ही गुरुग्रंथ साहिब और दसम ग्रंथ की बाणी का गहरा अध्ययन कराया जाता है। जब जत्थेदार (प्रमुख) को लगता है कि शिष्य हर तरह से तैयार है, तब उसे औपचारिक रूप से निहंग स्वीकार कर नीले वस्त्र और हथियार सौंपे जाते हैं।
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संत-सिपाही का जीवन और इनकी अनोखी कूट भाषा
निहंग सिख धर्म के सिद्धांतों की रक्षा, गुरुद्वारों की सुरक्षा और किसी भी गरीब, असहाय या महिला पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ 24 घंटे हथियारों से लैस रहते हैं। ये सिखों के पंच ककार (केश, कंगा, कड़ा, कछैरा और कृपाण) को हमेशा धारण करते हैं। यह एक खानाबदोश जीवन है, जो अलग-अलग जत्थों (जैसे बुड्ढा दल, तरना दल) के शिविरों और छावनियों में बीतता है। आज भी होला मोहल्ला और बैसाखी जैसे त्योहारों पर इनका शौर्य देखते ही बनता है।
निहंगों के बोल
निहंग सिखों की अपनी एक अनोखी कूट भाषा (कोड लैंग्वेज) होती है, जिसे गार्गोआ या खालसाई बोले कहा जाता है। इसमें सामान्य शब्दों को बेहद वीर रस और ऊंचे दर्जे के प्रतीकों में बोला जाता है। उदाहरण के लिए दूध को ये समुद्र कहते हैं। अकेले व्यक्ति को सवा लाख कहा जाता है। हरी मिर्च को ये लड़ाकू विमान या अक्कल दाढ़ कहते हैं।
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