देश की वैश्विक पहचान बनाने और जड़ों से जोड़ने में मिली है कामयाबी

indian journalism history
Sanjay Dwivedi
प्रो. संजय द्विवेदी

इन दिनों भारत की मीडिया में बंदिशों और लोकतंत्र के सिकुड़ते जाने की कथाएं हवा में तैर रही हैं। लोकतंत्र बचाने में वे सब आगे हैं जिनके शासन की कथाएं उन्हें खुद मुंह चिढ़ा रही हैं। मीडिया को दबाने, नियंत्रित करने की कहानियां आज की नहीं हैं। लेकिन मीडिया की हिम्मत भी आज की नहीं है। हमारे देश में पत्रकारिता की शुरुआत ही जेम्स आगस्टस हिकी की क्रांतिकारी लेखनी से प्रारंभ होती है, जिसने अंग्रेज लाट साहबों की बैंड बजा दी।

अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध फूंककर उसने अंग्रेज होकर भी जेलें झेलीं, जुर्माने चुकाए और खामोश मौत पाई। किंतु हिकी यह बता गया कि पत्रकारिता क्यों और कैसे करनी है। इसके बाद आजादी के आंदोलन में यही पत्रकारिता ‘खबर’ की जगह ‘पैगाम’ देने वाली बन गयी। जिसके कारण शायर को कहना पड़ा कि जब तोप मुकाबिल तो अखबार निकालो।

सुनने और देखने का समय

हमारे देश के हर क्रांतिकारी और आजादी के नायकों ने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पत्रकारिता को एक अस्त्र की तरह इस्तेमाल किया। लोकमान्य तिलक, विपिन चंद्र पाल, लाला लाजपत राय, सुभाषचंद्र बोस, महात्मा गांधी, माधवराव सप्रे, गणेशशंकर विद्यार्थी, माखनलाल चतुर्वेदी सबने पत्रकारिता के माध्यम से राष्ट्र को जागृत किया। पत्रकारिता की भावभूमि आजादी के आंदोलन ने तय कर दी। वह थी जनपक्षधरता, न्याय के लिए संघर्ष और सत्यान्वेषण। आजादी के बाद देश के नवनिर्माण का काम हो या आपातकाल विरोधी संघर्ष हमारे पत्रकारों ने हर जगह अपने उजले पदचिन्ह छोड़े।

आज मीडिया का स्वरूप बहुत व्यापक हो गया है। वह अनेक मंचों से की जा रही है। प्रिंट, टीवी, रेडियो से अलग मोबाइल पर हो रही पत्रकारिता गजब कर रही है। कहा जा रहा कि डिजिटल का सूरज कभी नहीं डूबता। इसलिए आप देखें तो पाएंगे मीडिया की पहुंच मोबाइल के माध्यम से ज्यादातर लोगों तक हो रही है। मीडिया कन्वर्जेंस का माध्यम मोबाइल बने हैं। ऐसे में ज्यादातर चीजें सुनी और देखी जा रही हैं। पठनीयता के सामने गंभीर चुनौतियां हैं। फिर भी इतना बड़ा देश अगर कुछ प्रतिशत में भी पढ़ता है तो भी संख्या आसानी से करोड़ों में होती है। दुनिया के तमाम देश एक भाषा में सोचते, पढ़ते और बोलते हैं। हिंदुस्तान 22 बड़ी भाषाओं और तमाम बोलियों में सुनता, पढ़ता और देखता है। इसलिए भारत के मीडिया का आकार बहुत व्यापक है।

वैश्विक पटल पर उभरा भारत

डिजिटल मीडिया ने हमारे माध्यमों को वैश्विक किया है। भारतीय भाषाओं को वैश्विक किया है। कभी फिल्में हमारे भारतीय समाज का वैश्विक चेहरा बनाती थीं। अब मीडिया इसके केंद्र में है। यू-ट्यूब, सोशल मीडिया, वेब माध्यमों, ई-पेपर और ई-बुक्स से एक नई दुनिया बन रही है, जिसने भारत की वैश्विक छवि बनाने का काम किया है। आज भारत और उसकी भाषाओं के साथ अंग्रेजी भाषा में भी भारतीयों की खास उपस्थिति है। वे जो लिख, कह और कर रहे हैं उसने देश को दुनिया में व्यक्त किया है।

हिंदुस्तानी जहां-जहां गए अपनी भाषा और संस्कृति के साथ गए और वहां एक लघु भारत खड़ा किया। यह लघु भारत आज मीडिया और संचार माध्यमों से शक्ति पाता है। अपनी जड़ों से जुड़ा हुआ महसूस करता है। एक समय में अपनी भाषा के प्रकाशनों, पत्र-पत्रिकाओं, किताबों और मनोरंजन को प्राप्त करना मुश्किल था, किंतु डिजिटल माध्यमों ने इसे संभव किया है। दूरियां, भूगोल और भाषा सबके अंतर को पाटकर भारत आपके घर पहुंच जाता है। इससे भारत की शक्ति बन रही है। साफ्टपावर क्या कर सकती है, इसे हम सब महसूस कर रहे हैं।

नया भारत बनाने में खास भूमिका

एक नया भारत बनाने और उसके एकीकरण में भारतीय मीडिया की भूमिका को स्वीकार करना चाहिए। अपने प्रारंभ से ही उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम भारतीय पत्रकारिता और साहित्य का स्वर एक रहा है। सबने भारत बोध को स्वर दिया है। एकत्व को स्थापित किया है। जगदगुरु शंकराचार्य के बाद भारत के एकीकरण का काम पत्रकारिता और साहित्य ने ही किया है। अपने राष्ट्रीय विचारों के समाचार पत्र से तमिलनाडु के सुब्रम्यण्यम भारती जो कर रहे थे, वही काम हिंदी में माखनलाल चतुर्वेदी कर रहे थे। उनके साहित्य और पत्रकारिता दोनों में भारत बोलता है।

इस तरह हम देखते हैं कि समाचार माध्यमों ने न सिर्फ सूचनाओं का आदान-प्रदान किया बल्कि एक देश में एक भाव भी भरा। यही हमारी पत्रकारिता की मूल शक्ति है। पत्रकारिता के नायक लोकमान्य तिलक का वाक्य स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है, देश की वाणी बन गया। देश ने आजादी के सपने देखने प्रारंभ किए। उनकी प्रेरणा से अनेक लोग पत्रकारिता में आए और उसी भाव को लेकर आगे बढ़े।

इनमें हिंदी के माधवराव सप्रे का उदाहरण सबसे खास है, जिन्होंने तिलक जी के मराठी अखबार ‘केसरी’ से प्रेरणा लेकर ‘हिंदी केसरी’ प्रारंभ किया। ऐसे अनेक नायक देश को जोड़ने के सूत्र खोजकर पत्रकारिता के माध्यम से सामने आते रहे। समस्त भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ संपादकों ने इस दौर में जो भाव जागरण किया है, वह अप्रतिम है।

सांस्कृतिक प्रवाह है एकत्व का कारण

इतनी सारी भाषाओं, बोलियों, खानपान, स्थानीय प्रतीकों को लेकर चलता हुआ देश अगर एक है तो इसका कारण है, उसके सांस्कृतिक प्रवाह का एक होना। लंबी गुलामी, वैचारिक दासता से घिरे बुद्धिजीवियों द्वारा किए लंबे अनर्थ चिंतन के बाद भी इस देश की प्रज्ञा अगर सो नहीं गयी तो इसका कारण इस देश की गहरी सांस्कृतिक जड़ें हैं। समय-समय पर नायक आते रहे हैं। जो हमें याद दिलाते हैं कि सब कुछ कभी खत्म नहीं हो सकता।

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भारतेंदु हरिश्चंद्र उनमें एक हैं, गांधी हैं, बाद के दिनों में दीनदयाल उपाध्याय, डा. राममनोहर लोहिया, अटलबिहारी वाजपेयी हैं। इनमें से सब पत्रकारिता को अपनी अभिव्यक्ति का केंद्र बनाते हैं। मीडिया के माध्यम से समाज को उसके बोध से जोड़ते हैं। उसी समय समाज को राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त याद दिलाते हैं–

हम कौन थे, क्या हो गये हैं, और क्या होंगे अभी
आओ विचारें आज मिल कर, यह समस्याएं सभी।

जाहिर है हमारी चुनौतियां अभी समाप्त नहीं हुई हैं। हमें नित अपने राष्ट्र के समक्ष उपस्थित संकटों के ठोस और वाजिब हल तलाशने हैं। पत्रकारिता, साहित्य और प्रदर्शन कलाओं में यह सामर्थ्य है कि वे समाज को संबल देते हुए उन्हें एकजुट कर सकते हैं। उनको रास्ता दिखा सकते हैं। भारतीय पत्रकारिता कमोबेश अपनी इस भूमिका पर आज भी कायम है। अपनी इस भूमिका को और प्रखर करते हुए पत्रकारिता जगत को वह सब करना ही होगा, जो अपेक्षित है। इसकी कसौटी भी तय है- जनपक्ष और सत्यान्वेषण। इसी में भारतीय पत्रकारिता की मुक्ति है, इसी में उसका गौरव है।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)

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