samajhdar bahu

सुबह का समय था। रसोई से बर्तनों की हल्की-हल्की आवाज आ रही थी और साथ ही चाय की खुशबू पूरे घर में फैल रही थी। पूजा हमेशा की तरह सबसे पहले उठ गई थी। उसने नहाकर भगवान के आगे दीपक जलाया और फिर रसोई में आकर सबके लिए नाश्ता बनाने लगी।

सास शारदा देवी आंगन में बैठकर तुलसी को पानी दे रही थीं। तभी उनकी नजर रसोई में काम करती पूजा पर पड़ी। उन्हें अपनी बहू का हर काम सलीके से करना अच्छा तो लगता था, लेकिन कहीं न कहीं उनके मन में एक बात हमेशा खटकती रहती थी कि पूजा घर के काम करने के साथ-साथ एक स्कूल में टीचर की नौकरी भी करती थी।

थोड़ी देर बाद पूजा ट्रे में चाय के चार कप लेकर आंगन में आई और मुस्कुराते हुए बोली, मम्मी जी, आपकी चाय। शारदा देवी ने चाय का कप लिया लेकिन उनके चेहरे पर हल्की सी गंभीरता थी। पूजा समझ गई कि सास के मन में कोई बात जरूर चल रही है। तभी शारदा देवी बोलीं, बहू, तुमसे एक बात कहनी थी। पूजा ने आदर से जवाब दिया, जी मम्मी जी, कहिए। शारदा देवी ने थोड़ा झिझकते हुए कहा, कल पड़ोस की कमला आई थी। वो कह रही थी कि आजकल की बहुएं घर से ज्यादा बाहर की दुनिया में दिलचस्पी लेने लगी हैं। उसने तो यहां तक कह दिया कि तुम्हारी बहू भी दिन भर बाहर रहती है।

पूजा कुछ पल चुप रही। उसने चाय का कप धीरे से नीचे रखा और सास की तरफ देखा। शारदा देवी आगे बोलीं, मुझे लोगों की बातें सुनना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता। घर की बहू अगर घर पर रहे तो ही अच्छा लगता है। मुझे लगता है कि तुम्हें अब अपनी नौकरी छोड़ देनी चाहिए और घर पर ध्यान देना चाहिए।

यह सुनकर पूजा के दिल में हल्की सी टीस उठी, लेकिन उसने अपनी आवाज में कोई शिकायत नहीं आने दी। वह शांत स्वर में बोली, मम्मी जी, मैं समझती हूं कि आपको लोगों की बातें बुरी लगती हैं… लेकिन क्या लोग हमारी खुशी से ज्यादा जरूरी हैं?

शारदा देवी को पूजा का यह सवाल थोड़ा अजीब लगा। उन्होंने तुरंत कहा, बहू, समाज में रहना है तो समाज की बात भी सुननी पड़ती है। पूजा ने धीरे से सिर झुका लिया और बोली, ठीक है मम्मी जी, अगर आपको यही सही लगता है तो मैं इस बारे में सोचूंगी। इतना कहकर वह अंदर चली गई। उस दिन पूजा पूरे दिन कुछ ज्यादा ही शांत रही। उसके पति रोहित ने भी नोटिस किया कि आज पूजा ज्यादा बातें नहीं कर रही थी।

शाम को जब रोहित ऑफिस से लौटा तो उसने देखा कि पूजा बालकनी में खड़ी आसमान की तरफ देख रही थी। रोहित उसके पास आया और बोला, क्या बात है पूजा, आज तुम बहुत चुप हो? पूजा ने हल्की सी मुस्कान दी और बोली, कुछ नहीं… बस सोच रही थी कि जिंदगी में सबसे जरूरी चीज क्या होती है। रोहित ने हंसते हुए कहा, मेरे लिए तो सबसे जरूरी तुम हो। यह सुनकर पूजा की आंखों में हल्की सी नमी आ गई।

अगले दिन सुबह पूजा हमेशा की तरह जल्दी उठी, लेकिन आज उसने स्कूल जाने की तैयारी नहीं की। उसने पूरा दिन घर के कामों में लगा दिया। शारदा देवी यह देखकर खुश तो थीं, लेकिन कहीं न कहीं उन्हें यह भी महसूस हो रहा था कि पूजा की मुस्कान पहले जैसी नहीं रही। दो-तीन दिन ऐसे ही गुजर गए। पूजा अब घर पर ही रहने लगी थी, लेकिन घर का माहौल पहले जैसा खुशहाल नहीं रहा।

एक दिन शाम को शारदा देवी मंदिर से लौट रही थीं। रास्ते में उन्हें वही पड़ोस वाली कमला मिल गई। कमला ने हंसते हुए कहा, अरे शारदा, तुम्हारी बहू तो बहुत समझदार निकली। मैंने सुना है उसने नौकरी छोड़ दी। कमला के चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी, जैसे वह खुश हो कि उसकी बात मान ली गई। उस समय शारदा देवी को पहली बार महसूस हुआ कि उन्होंने अपनी बहू की खुशी से ज्यादा दूसरों की बातों को महत्व दे दिया।

घर पहुंचते ही उन्होंने देखा कि पूजा रसोई में चुपचाप काम कर रही है। पहले वह काम करते समय गुनगुनाती रहती थी, लेकिन अब वह बिल्कुल खामोश रहती थी। शारदा देवी का दिल भर आया। उन्होंने पूजा को आवाज दी, बहू, जरा इधर आओ। पूजा तुरंत उनके पास आकर बोली, जी मम्मी जी? शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया और धीरे से बोलीं, बहू, तुम कल से फिर से अपनी नौकरी पर जाओ।

पूजा ने हैरानी से उनकी तरफ देखा। लेकिन मम्मी जी… आपने ही तो कहा था… शारदा देवी ने उसकी बात काटते हुए कहा, हाँ, मैंने कहा था… लेकिन अब समझ में आया कि मैंने गलती की थी। मैंने लोगों की बातों में आकर तुम्हारी खुशी छीन ली। मुझे माफ कर दो बहू। पूजा की आंखों में आंसू आ गए। उसने तुरंत सास के पैर छू लिए और बोली, मम्मी जी, आप ऐसा मत कहिए। आपने जो कहा, वो घर की भलाई के लिए ही कहा था।

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इतने में रोहित और उसके पिता भी वहां आ गए। रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा, माँ, आपने आज बहुत बड़ा फैसला लिया है। शारदा देवी ने प्यार से पूजा के सिर पर हाथ रखते हुए कहा, बहू, घर की इज्जत सिर्फ साड़ी या घूंघट से नहीं बढ़ती… बल्कि उस खुशी से बढ़ती है जो घर के हर सदस्य के चेहरे पर दिखती है।

अगले दिन पूजा फिर से अपने स्कूल जाने के लिए तैयार हुई। जब वह बैग लेकर दरवाजे पर पहुंची तो शारदा देवी ने खुद उसके हाथ में टिफिन दिया और मुस्कुराते हुए बोलीं, जल्दी आ जाना बहू… शाम की चाय तुम्हारे हाथ की ही अच्छी लगती है। पूजा मुस्कुरा दी। उस दिन पूरे घर का माहौल पहले से भी ज्यादा खुशहाल था, क्योंकि अब इस घर में लोगों की बातों से ज्यादा अपने रिश्तों की खुशी को महत्व दिया जाने लगा था।

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