भगवान शिव के आराध्य श्रीराम की शरण में कल्याण सिंह

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Kalyan Singh
Sanjay Tiwari
संजय तिवारी

भगवान शिव के आराध्य भगवान श्रीराम ने सावन के आखिरी दिन की पूर्वसंध्या पर उन्हें अपने श्री चरणों में स्थान दे दिया। श्रीराम मंदिर के महानायक कल्याण सिंह अपनी महायात्रा पर निकल पड़े। श्री अयोध्या जी में श्रीराम के भव्य मंदिर के निर्माण की आधारशिला भी देख लिया और श्रीराम की प्रसंगिकता भी। वे पुनः श्री अयोध्या जी लौटेंगे, किसी अन्य स्वरूप में क्योकि ऐसा उनका सपना भी था और संकल्प भी।

कल्याण सिंह का जन्म 6 जनवरी, 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में हुआ था। उनके पिता का नाम तेजपाल लोधी और माता का नाम सीता देवी था। कल्याण सिंह के एक पुत्र एक पुत्री है। कल्य़ाण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह राजू भैया भारतीय जनता पार्टी के एटा से सांसद हैं। वे जून, 1991 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उन्होंने इसकी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुये 6 दिसम्बर, 1992 को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। वे 1993 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में अत्रौली और कासगंज से विधायक निर्वाचित हुये। चुनावों में भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभरा लेकिन मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में समाजवादी-बहुजन समाज पार्टी ने गठबन्धन सरकार बनायी। विधान सभा में कल्याण सिंह विपक्ष के नेता बने।

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वे सितम्बर, 1997 से नवम्बर, 1999 तक पुनः उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। 21 अक्टूबर, 1997 को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने कल्याण सिंह सरकार से समर्थन वापस ले लिया। कल्याण सिंह पहले से ही कांग्रेस विधायक नरेश अग्रवाल के सम्पर्क में थे और उन्होंने तुरन्त शीघ्रता से नयी पार्टी लोकतांत्रिक कांग्रेस का घटन किया और 21 विधायकों का समर्थन दिलाया। इसके लिए उन्होंने नरेश अग्रवाल को ऊर्जा विभाग का कार्यभार सौंपा। दिसम्बर, 1999 में कल्याण सिंह ने पार्टी छोड़ दी और जनवरी, 2004 में पुनः भाजपा से जुड़े। 2004 के आम चुनावों में उन्होंने बुलन्दशहर से भाजपा के उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ा। 2009 में उन्होंने पुनः भाजपा को छोड़ दिया और एटा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय सांसद चुने गये। कल्याण सिंह ने 4 सितम्बर, 2014 को राजस्थान के राज्यपाल पद की शपथ ली। उन्हें जनवरी, 2015 में हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया।

श्रीराम, अयोध्या, बाबरी और कल्याण

अपने एक साक्षात्कार में कल्याण सिंह ने कहा था कि उन्हें 6 दिसंबर, 1992 को अयोध्या में कार सेवकों पर गोलीबारी करने की अनुमति देने के सवाल पर लिखित में अनुमति देने से इनकार करने के अपने फैसले पर गर्व है। दरअसल, राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद स्थल पर मस्जिद का विरोध करने के लिए कार सेवक एकत्र हुए थे। माना जाता है कि मस्जिद का निर्माण वहीं हुआ है, जहां कभी भगवान राम का जन्म हुआ था और राम मंदिर था। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल दशकों पुराने विवाद पर फैसला सुनाया और उस विवादित स्थल पर राम मंदिर के निर्माण का आदेश दिया।

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बाबरी विध्वंस

यह तो सभी जानते हैं कि 6 दिसंबर, 1992 को विरोध प्रदर्शन बेकाबू हो गया और कथित कार सेवकों ने बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया। उस वक्त उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह की सरकार थी। इस घटना के बाद कल्याण सिंह की सरकार गिर गई और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। 88 साल के कल्याण सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा कि एक तरह से देखा जाए तो बाबरी विध्वंस ने ही 5 अगस्त को होने वाले राम मंदिर भूमि-पूजन कार्यक्रम के लिए मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने कहा, ‘मैं अयोध्या में मंदिर के दर्शन करने के बाद मरना चाहता हूं और फिर राम नगरी में ही दोबारा जन्म लेना चाहता हूं। मैं इसे विधि का विधान कहूंगा।

साल 1528 में मुगल शासक बाबर के सेनापति मीर बाक़ी ने अयोध्या में राम मंदिर को ध्वस्त कर दिया, ऐसा इसलिए नहीं कि वह पूजा का दूसरा स्थान बनाना चाहता था, बल्कि इसलिए कि वह हिंदुओं का अपमान करना चाहता था। शायद यह तय था कि मुख्यमंत्री के रूप में मेरे साथ ही ढांचा ध्वस्त हो जाएगा। अगर कोई विध्वंस नहीं हुआ होता, तो शायद अदालतें भी यथास्थिति का आदेश दे देतीं। इसलिए एक अर्थ में देखा जाए तो इस विध्वंस ने ही वास्तव में 5 अगस्त को भूमि-पूजन का मार्ग प्रशस्त किया ।

सरकार से महत्वपूर्ण था कारसेवकों को बचाना

वह कहते थे कि 6 दिसंबर, 1992 को मेरे लिए सरकार बचाने से ज्यादा महत्वपूर्ण कारसेवकों का जीवन बचाना था। कल्याण सिंह के सामने हमेशा ये सवाल उठे कि क्या मुख्यमंत्री के रूप में आपने अपने कर्तव्य का निर्वहन किया और मस्जिद की रक्षा के लिए कुछ पर्याप्त किया? इस प्रश्न का उत्तर वह बहुत बेबाकी से देते रहे। वह बताते थे- उस दिन (6 दिसंबर) तनाव के बीच मुझे अयोध्या के जिला मजिस्ट्रेट का फोन आया, जिसमें कहा गया था कि करीब 3.5 लाख कार सेवक एकत्र हुए हैं। मुझे बताया गया कि केंद्रीय बल मंदिर की ओर आ रहे हैं, मगर साकेत कॉलेज के बाहर कार सेवकों द्वारा उनके मुवमेंट को रोक दिया गया था। मुझसे पूछा गया था कि फायरिंग (कार सेवकों पर) करने का आदेश देना है या नहीं।

मैंने लिखित रूप में अनुमति देने से इनकार कर दिया और अपने आदेश में कहा, जो अभी भी फाइलों में दर्ज है, उस गोलीबारी से देश भर में कई लोगों की जानें जाएंगी, अराजकता फैलेगी और कानून-व्यवस्था का मुद्दा आ जाएगा। मुझे अपने फैसले पर गर्व है क्योंकि आज मैं गर्व के साथ कह सकता हूं कि मैंने अपनी सरकार खो दी होगी, मगर कार सेवकों को बचा लिया। अब मुझे लगता है कि उस विध्वंस ने अंततः राम मंदिर का मार्ग प्रशस्त कर दिया। 1990 में कार सेवकों पर गोलीबारी गलत फैसला था। लोगों को मारना कोई मज़ाक नहीं है।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूमि पूजन के कार्यक्रम में प्रमुख विपक्षी नेताओं जैसे कांग्रेस के प्रमुख सोनिया गांधी, समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव, बसपा प्रमुख मायावती और अन्य लोगों को निमंत्रण नहीं दिए जाने को सही ठहराते हुए उन्होंने कहा था- यद्यपि राम सभी के हैं, मगर इनमें से अधिकांश ने राम मंदिर का विरोध किया है। ऐसे में इन्हें बुलाया ही क्यो जाए।

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नई अयोध्या, नया भारत

वह हमेशा कहते थे- राम रोटी भी सुनिश्चित करेंगे। राम मंदिर अयोध्या को विश्व स्तर पर प्रसिद्ध पर्यटन स्थल बनाएगा। एक नई अयोध्या आने वाली है, जो प्राचीन के साथ सह अस्तित्व में होगी। ये सब नौकरियों और समृद्धि की शुरूआत करेगा। मैं राम मंदिर बन जाने तक जीना चाहता हूं और फिर अयोध्या में ही जन्म लेना चाहता हूं। नई अयोध्या और नए भारत मे श्रीराम की शरण ही सौभाग्य है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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