Vishnugupta
आचार्य विष्णु गुप्त

गोधरा कांड (Godhra Kand) के दिन मैं एक हिन्दी दैनिक झारखंड जागरण का संपादक था। समय दोपहर का था। संपादकीय पेज का प्रभारी मेरे चैम्बर में आते हैं और मुझसे कहते हैं सर, आज का पेज वन लीड खबर आ गयी है, धमाकेदार है। मैं अपने सहयोगी पर विफर पड़ा। मैंने सीधे तौर पर कहा कि क्या बोलते हो, पेज वन की लीड खबर तो रात दस बजे के बाद तय होती है, अभी तो दोपहर ही है? लाओेेेे दिखाओं खबर। मैंने जब समाचार एजेंसी की खबर देखी तो चौंक गया, मेरी आत्मा कांप गयी, कुछ मिनटों तक मेरी बोलती बंद रही। कोई एक नहीं बल्कि 59 कारसेवकों को जिंदा जलाने की खबर थी। ट्रेन की बोगी में आग लगाने की खबर थी। कुछ देर बाद कारसेवकों की जले हुए शरीर की विभत्स तस्वीरें भी समाचार एजेंसी से आ गयी थी। किन लोगों ने ट्रेन की बोगी जलायी थी और कारसेवकों की विभत्स हत्या की थी उसकी पूरी जानकारी आ गयी थी।

मुझे तो क्या पूरे देश को ऐसी विभत्स और खतरनाक प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी। उस समय धारणा यही थी कि हिन्दू बहुत ही सहनशील होते हैं, हमलावरों और विभत्स चेहरों के प्रति भी हिन्दुओं का सम्मान और प्रेम उमड़ जाता है। इसलिए हिन्दू हिंसक हो नहीं सकते हैं, हिन्दू प्रतिक्रियावादी हो ही नहीं सकते हैं, हिन्दू उसी तरह से व्यवहार और दृष्टि नहीं रख सकते हैं जिस तरह के व्यवहार और दृष्टि से प्रेरित होकर आयातित संस्कृति के लोगों ने गोधरा ट्रेन जलायी थी और निर्दोष कारसेवकों को जिंदा जलाया था।

कारसेवकों के खिलाफ आयातित संस्कृति के विभत्स चेहरों और समूहों की नाराजगी इस बात को लेकर थी कि ये अयोध्या कारसेवा के लिए क्यों गये थे, ये तो उनकी आयातित संस्कृति के खिलाफ गुनाह है। जबकि कारसेवक अपनी देशज संस्कृति के प्रति समर्पित होकर अयोध्या में भगवान श्रीराम की सेवा में गये थे। कारसेवकों की हिंसा या फिर उबाल-उतेजना के प्रति कोई हिस्सेदारी नहीं थी, कोई प्रतिबद्धता नहीं थी। गोधरा कांड ने मेरे जैसे लाखों लोगों को हिंसक मुस्लिम आबादी, तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों और बुद्धिजीवियों के प्रति धारणा बदलने का काम किया, राष्ट्र में राष्ट्रभक्ति जगाने का काम किया।

अति सर्वत्र वर्जते। अति का भयंकर दुष्परिणाम होता है। अति का भयंकर दुष्परिणाम इतिहास में भरे पड़े हैं। शिशुपाल वध की कहानी किसे नहीं पता है। शिशुपाल भगवान श्रीकृष्ण के रिश्ते में भाई थे। शिशुपाल बार-बार गलतियों से बाज नहीं आ रहा था, श्रीकृष्ण ने शिशुपाल से कहा था कि तुम्हारी सौ गलतियां क्षमा है पर उसके आगे तुम्हारी मृत्यु निश्चित है। सौ गलतियों से आगे जैसे ही शिशुपाल बढ़ा वैसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने शिशुपाल की गर्दन काट दी थीं। इस प्रकार शिशुपाल को अति की सजा मिली थी। इसी प्रकार गुजरात के कई दंगों में मुसलमानों की हिंसक प्रवृति खतरनाक थी और जानलेवा थी। बार-बार मुस्लिम आबादी दंगों और अन्य अपराधों में हिन्दुओं को शिकार बनाती थी। कहने का अर्थ यह है कि मुस्लिम आबादी को न तो सरकार का डर होता था, न ही मुस्लिम आबादी को पुलिस का भी भय होता था, मुस्लिम आबादी को कानून का भी डर नहीं होता था।

एक तरह से मुस्लिम आबादी अपने आप को सरकार, पुलिस और कानून भी समझ बैठी थी। खुशफहमी यह पाल रखी थी कि उनकी ताकत के सामने हिन्दू कुछ भी नहीं हैं, हिन्दुओं को तो कीड़े-मकौड़े की तरह रौंद दिया जायेगा, संहार कर दिया जायेगा। ओवैसी ने जिस तरह से बोला था कि पुलिस और सेना को हटा लो तो फिर पन्द्रह मिनट में हिन्दुओं का सफाया कर दिया जायेगा, यानी कि हिन्दुओं का संहार कर दिया जायेगा, भारत के सारे हिन्दुओं को मौत की नींद सुला दिया जायेगा, उसी तरह की सोच उस समय गुजरात की मुस्लिम आबादी ने पाल रखी थी।

एक कहावत है कि मरता क्या नहीं करता। हिन्दू आबादी को लगा कि इनके लिए सरकार, पुलिस और कानून भी बेअर्थ हैं, फिर हम तो स्वाभिमान के साथ सुरक्षित कैसे रहेंगे। प्रतिक्रिया हुई। जब शांत प्रवृति और सहनशील व्यक्ति गुस्सा होता है तो वह तांडव करने लगता है। मुस्लिम आबादी की हिंसा और अन्य अत्याचारों से गुस्से में रहने वाले लोगों ने जब सड़कों पर प्रतिक्रिया दी तो फिर कैसी राजनीतिक उफान पैदा हुआ था, यह भी स्पष्ट है। तीन दिन भयंकर हिंसा हुई। सबककारी प्रतिक्रिया हुई। बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी प्रताड़ित हुई। गुजरात के जगह-जगह पर भयंकर हिंसा हुई। जब लाखों लोग एकाएक सड़कों पर उतर कर हिंसा करने के लिए तत्पर हों, तो फिर पुलिस और सरकार भी असफल हो जाती है। जब तक गुजरात सरकार सेना को बुलाने की कोशिश करती तब तक गुजरात दंगे की हिंसा चरम पर पहुंच गयी थी।

एक तथ्य यह भी है कि जब गुजरात में अ़र्द्धसैनिक बल और सेना की उपस्थिति हुई तब सर्वाधिक पीड़ित और शिकार मुस्लिम आबादी नहीं बल्कि हिन्दू आबादी ही हुई थी। पुलिस और सेना की गोली से करीब तीन सौ से अधिक हिन्दू मारे गये थे। गुजरात दंगे में सिर्फ मुस्लिम ही मारे गये, ऐसी बात नहीं है। तीन सौ से अधिक हिन्दू भी मारे गये हैं। दर्जनों हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार भी हुए थे। सैकड़ों हिन्दुओं की संपत्ति भी स्वाहा हुई थी।

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तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों ने एक तरह गुजरात दंगे की पृष्ठभूमि रखी थी और हिन्दुओं को मुस्लिम आबादी को उनकी हिंसा के खिलाफ प्रतिक्रिया देने के लिए प्रेरित किया था। गोधरा कांड जैसी बड़ी विभत्स घटना होती है, तो फिर राजनीति को ध्यैर्य रखने की जरूरत होती है। शिकार लोगों के प्रति संवेदनाएं जताने की जरूरत होती है, हिंसा में मारे गये लोगों के परिजनों के प्रति सम्मान दर्शाना होता है। पर तथाकथित धर्मनिरपेक्ष दलों और धर्मनिरपेक्ष राजनेताओं ने ऐसी संवेदनाएं और सम्मान प्रकट नहीं की थी। लालू ने कहा था कि कारसेवक कोई मनुष्य थोड़े थे, ये हिंसक थे, आग मुसलमानों ने नहीं बल्कि आरएसएस वालों ने लगायी है, आरएसएस वाले देश में दंगा कराना चाहते हैं।

लालू की तरह ही बयान कम्युनिस्ट पार्टियों के नेताओं और मायावती ने दी थी। कांग्रेस तो मुस्लिम आबादी के प्रति समर्पित ही रही है। कांग्रेस ने भी गोधरा कांड में मारे गये कारसेवकों के खिलाफ बयान दी थी। सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि तथाकथित धर्मनिर्पेक्ष पत्रकारों और बुद्धिजीवियों ने हमलावर मुस्लिम आबादी को नहीं बल्कि गोधरा कांड में मारे गये कारसेवकों और आरएसएस की जमकर खिल्ली उड़ायी थी। लालू के बनर्जी आयोग ने गलत जांच रिपोर्ट देकर कानून की ही खिल्ली उड़ायी थी।

गोधरा कांड के खिलाफ गुजरात दंगे की प्रतिक्रिया को सही नहीं ठहराया जा सकता है। लेकिन मुस्लिम आबादी कभी यह सोचती नहीं है कि आतंकवादियों और दंगाइयों को वह क्यों पालती है और उनका समर्थन करती है। सीधे तौर पर ट्रेन की बोगी जला कर कारसेवकों की हत्या करने के प्रमाण थे, फिर भी मुस्लिम नेता सामने आकर हत्यारों को सबक सिखाने की बात क्यों नहीं की थी? निश्चिततौर पर गोधरा कांड एक गहरी और विभत्स साजिश थी और इस साजिश के तार आईएसआई-पाकिस्तन से जुड़े हुए थे। गोधरा कांड एक तरह से इस्लामिक प्रयोग था। अगर प्रतिक्रिया नहीं होती तो फिर ऐसे प्रयोग देश के कोने-कोने में होते तथा देश को गृहयुद्ध में ढकेल दिया जाता। पर गुजरात की राष्ट्रवादी जनता ने प्रतिक्रिया देकर देश को गृहयुद्ध में ढकेलने की मुस्लिम साजिश को असफल कर दिया था। इसके लिए गुजरात की राष्ट्रवादी जनता प्रशंसा की पात्र है।

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गोधरा कांड ने राष्ट्रभक्ति की अलख जगाई, जिसका सुखद परिणाम नरेन्द्र मोदी की केन्द्र में बनी सरकार है। हिन्दुओं में आयी जागरूकता के पीछे भी गोधरा कांड की भूमिका है। आज हिन्दू आबादी शांति पूर्ण प्रतिक्रया देने के लिए तत्पर रहती है। तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियों, नेताओं और बुद्धिजीवियों के लिए गोधरा कांड एक सबक भी है। अगर उन्होंने गोधरा कांड में मारे गये कारसेवकों की खिल्ली नहीं उड़ायी होती, आरएसएस की खिल्ली नहीं उड़ायी होती और मुस्लिम आबादी को जिम्मेदार ठहरा कर मारे गये कारसेवकों को न्याय दिलाने की बात करते तो फिर उनके बूरे दिन नहीं आते। क्या यह सही नहीं है कि आज तथाकथित धर्मनिरपेक्ष पार्टियां, राजनेता और बुद्धिजीवी बुरे दिन से नहीं गुजर रहे हैं? तीस्ता सीतलवाड़ से लेकर लालू, सोनिया गांधी तक सब बेनकाब हो चुके हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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