बिसारिए न राम को…

सत्ता चरित्र जर्जर न होता तो “न्याय के समक्ष सभी बराबर हैं” संविधान की यह पवित्र मंशा कुछ ही दिनों में जमीनी हकीकत बन गई होती। लेकिन चोरों के संरक्षक बड़ी हैसियत वाले थे, लिहाजा मामला देश की सबसे बड़ी अदालत में है। जबकि जनता को न्याय होता दिखाने के लिए आनन-फानन में छोटे गिरहकटों की निपटान छोटी अदालतों में तत्काल शुरू हो गई थी।
प्रातः स्मरणीय चंपत राय बंसल बाबू ने आखिरकार सिद्ध कर दिया कि, करेजगर (कलेजे वाला) बनने के लिए एक थरिया (एक थाली) भात और 20 रोटी उठाना जरूरी नहीं, बस डेढ़ अदद रोटी और साधारण “बोरन” दबाकर भी दशानन (रावण) से दस गुना ज्यादा करेजगर बना जा सकता है।
चंपत बाबू! दिलेरी में आपने रावण को भी पछाड़ दिया। रघुनाथ की आंखों के सामने, उनके श्रीचरणों से उनका श्रृंगार उठवा लिया। भेष बदलकर, छिपते-छिपाते आने वाला डरपोक रावण आपके कलेजे की बराबरी कर पाएगा क्या? आपके सामने उसकी क्या औकात? वाह, चंपत बाबू! वाह! आपकी दिलेरी देखकर कलेजा गदगद हो गया। जीते रहो शेर। (शेर का मतलब जानवर न लगाएं, प्लीज)।
कोई नहीं है टक्कर में, क्यों पड़े हो..!
हे “इतिहास पुरुष”! आप जैसे देखन में छोटन लगें, वजन धरैं गंभीर वालों का कभी कोई कुछ बिगाड़ पाया है क्या? जांच-पड़ताल से अलमस्त रहिए। जांच-पड़ताल के दायरे में गुड्डू, बबलू, चिंटू, पिंटू जैसे आमलोग आते हैं। आप जैसे VVIP नहीं। आपके दायरे में अयोध्या से लेकर लखनऊ, लखनऊ से लेकर दिल्ली और दिल्ली से लेकर पूना तक सब आता है। हे ठसकधारी! निर्द्वन्द रहिए। निश्चिंत रहिए। दूधों नहाइए, पुतो फलिए। दिमाग में बैठा लीजिए- न्याय के समक्ष सभी समान हैं। संविधान में लिखी इस लाइन का आप VVIP क्लब वालों के लिए कोई अर्थ नहीं है। अब बाबा साहेब ने उक्त लाइन को क्यों और किसके लिए लिखा था, वही जानें। खैर…।
हे! मर्यादा पुरुषोत्तम के हनकोत्तम (हनक में उत्तम) दरबारी-श्रेष्ठ! आपका यह कहना ही पर्याप्त है कि “आपके साथ विश्वासघात हुआ है।” आह! सुनकर कलेजा द्रवित हो गया। आंख भर आई। आपके श्रीमुख से निकला यह एक कथन ही आपके साफ-पाक होने का अकाट्य प्रमाण है, मालिक। आपके इस ब्रह्मवाक्य के बाद रामभक्तों की सुकोमल आस्था और भावनाओं के साथ हुए विश्वासघात का कोई मतलब नहीं रह जाता है। तभी तो राम-कोष में पड़ी भीषण डकैती के बाद जिस कोषाध्यक्ष को अपनी अक्षमता एवं असफलता को स्वीकार करते हुए चुल्लू भर पानी में…। वह कोतवाल की भूमिका में पूरी बेशर्मी के साथ प्रेसवार्ता करते देखा जा रहा है।
5 जून, 2026 को चोरी का पता लगने के बाद हे! बीएचपी कुमार आप सन्न नहीं हुए। स्तब्ध नहीं हुए। आपके पैरों तले पृथ्वी नहीं खिसकी। क्रोध से आपका ब्लडप्रेशर नहीं बढ़ा। बकप बहादुर! आपके इसी कलेजे पर तो पूरा देश बलिहारी (न्योछावर) है। “हे, डेढ़ रोटी वाले महाबली” आपसे बड़े-बड़े बाहुबली (बृजभूषण शरण सिंह) भी कंपित हैं। आपके समक्ष शासन एवं पुलिस प्रशासन भी हकलाता है।
गांव का पटवारी भी जानता कि चोरी होते ही थानें में रिपोर्ट दर्ज कराई जाती है लेकिन, हे चतुर राज! चोरों के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराने की जगह, आप अपने साथ पुलिस वालों को लेकर पहुंच गए। आप आईजी, डीआईजी, एसपी, कोतवाल या हवलदार तो नहीं थे। क्यों गए? इसीलिए न कि आपके सामने हकलाने वाली पुलिस चोरी कांड का स्वच्छंद होकर विधिवत अनावरण न कर सके। “दूध का दूध, पानी का पानी न कर सके।” जो भी हो आपके मन मुताबिक हो। वहां आपकी मौजूदगी न होती तो संभव था आपके चिंटू, पिंटू (चोर) आपका नाम लेकर कोई बड़ा खुलासा कर देते। इसलिए मौके पर आपको डटे रहना जरूरी था न? आपकी चतुराई पर मन बल्लियों उछल रहा है। थामे नहीं थम रहा है।

विश्व प्रसिद्ध इस राम मंदिर में पड़ी ऐतिहासिक डकैती को आपने अपने घर में हुई मामूली चोरी समझकर क्यों रफा-दफ़ा करना चाहा? किस गुमान में आप मान बैठे कि राम मंदिर आपकी जागीर है। वह ब्रह्मस्थान किसी IP या VIP की रियासत नहीं बल्कि करोड़ों-करोड़ रामभक्तों के हृदय की पूंजी और बलिदान की कहानी है। ऊंचे-ऊंचे मठों तक पहुंच रखने वाले हे मठाधीश! राम के मठ से ऊंचा कोई मठ नहीं। उनकी अदालत से बड़ी कोई अदालत नहीं।
वहां न्याय निष्पक्ष होता है। लेकिन यहां जमीनी पंचायत में पंच लोगों ने लगभग मान लिया है कि आपके साथ विश्वासघात हुआ है। हे, राम मंदिर के प्रधानमंत्री! आप अद्भुतासन में चौबीसों घंटे अपनी आंख, कान, नाक बंद रखते थे। अगर ऐसा न होता तो आप “विश्वासघात” की बात न करते और न ही नृपेंद्र मिश्र जैसे दर्जनों प्रभावशाली लोग आपको पाक-साफ बताने की गवाही देते। है ना?
यह बात अलग है कि नौकरी में रहते हुए नृपेंद्र बाबू की आंखे अयोध्या की गलियों, कूचों और गड्ढे, नालों में जान बचाने को छिपते रामभक्तों तक को देख ले रही थीं। लेकिन अब वही आंखे राम मंदिर परिसर में टहलते 6 बाई 3 फिट के लंबे-चौड़े चोरों को नहीं देख पाती हैं। यह भी चमत्कार है। रामधन के आरोपी चोरों की सूची में दर्ज उस अभागे व्यक्ति को भी शर्म नहीं जिसे परमात्मा ने अपने दरबार का प्रथम पुरोहित बनने का सौभाग्य दिया था।
माता सीता के सतीत्व की गवाही देने के लिए पूरा अवध व्याकुल खड़ा था। लेकिन मात्र आरोप भर लगने से माता सीता ने स्वयं को अग्नि परीक्षा के लिए प्रस्तुत कर दिया था। आज भी कहानी उसी “मर्यादा-श्रेष्ठ राम दरबार” की है। जहां रुई के पुतले, अग्नि परीक्षा देने की जगह पूरी निर्लज्जता से एक-दूसरे को ईमानदार बताने की गवाही दे रहे हैं।
हे मंदिर मुखिया! बस, राम धाम में डकैती देखना ही शेष रह गया था। जीवन धन्य हो गया। ऐसी स्थिति में “चंपत” शब्द का अर्थ जानने को मन अकुला पड़ा। गूगल ताऊ से पूछा, उन्होंने बताया कि बेटा, चंपत का अर्थ गायब होना या भाग जाना होता है। गूगल ताऊ के शब्द सुनकर, मन उस घड़ी और मुहूर्त पर जाकर ठहर गया जब श्रीमान को राममंदिर ट्रस्ट का सर्वेसर्वा बनाया गया था। …ओम शांति
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
