राजनीति में दम दिखाएगी CJP! जानिए आंदोलन से उपजी राजनीतिक पार्टियां देश-दुनिया में कितनी सफल रहीं
नई दिल्ली: नीट प्रश्नपत्र लीक मामले को लेकर पिछले कई दिनों से जंतर-मंतर पर डटी कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने आखिरकार अपना आंदोलन समाप्त करने का ऐलान कर दिया है। संगठन की सबसे प्रमुख मांग—केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा—पूरी हो चुकी है, जिसके बाद इस आंदोलन को एक ऐतिहासिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।
हालांकि, इस बड़ी सफलता के बावजूद कॉकरोच जनता पार्टी ने फिलहाल अपनी कोई राजनीतिक महत्वाकांक्षा जाहिर नहीं की है। चुनाव लड़ने और औपचारिक पार्टी के रूप में खुद को स्थापित करने को लेकर कानूनी और रणनीतिक अड़चनें बनी हुई हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या किसी आंदोलन की कोख से जन्म लेने वाली पार्टियां मुख्यधारा की राजनीति में सफल हो पाती हैं? भारत से लेकर दुनिया भर के इतिहास पर नजर डालें, तो आंदोलन से उपजे राजनीतिक दलों का सफर मिला-जुला रहा है।
1. आम आदमी पार्टी (AAP): आंदोलन से सत्ता तक का सबसे चर्चित भारतीय उदाहरण
भारत में जनआंदोलन से उपजी राजनीतिक पार्टियों का सबसे आधुनिक और सफल उदाहरण आम आदमी पार्टी (AAP) को माना जाता है। 6 अप्रैल, 2011 को भ्रष्टाचार विरोधी कड़े जन लोकपाल कानून की मांग को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल ने जंतर-मंतर पर ऐतिहासिक अनशन शुरू किया। वैचारिक मतभेदों के बाद 2 अक्टूबर, 2012 को अरविंद केजरीवाल ने आम आदमी पार्टी का गठन किया।
2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में आप ने 70 में से 28 सीटें जीतीं और कांग्रेस के सहयोग से 49 दिनों की पहली सरकार बनाई। इसके बाद 2015 में 67 सीटें और 2020 में 62 सीटें जीतकर इतिहास रचा। पिछले चुनावों में सत्ता गंवाने के बावजूद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि एक गैर-राजनीतिक आंदोलन से निकलकर लगभग 15 वर्षों तक देश की राजधानी में सरकार चलाना और राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करना एक अत्यंत सफल प्रयोग रहा।
2. तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS/BRS): पृथक राज्य के आंदोलन की जीत
पूर्व मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव (KCR) ने तेलुगु देशम पार्टी (TDP) से अलग होकर तेलंगाना राष्ट्र समिति का गठन किया था। KCR ने पृथक तेलंगाना राज्य की मांग को लेकर 2009 में ऐतिहासिक आमरण अनशन और देशव्यापी आंदोलन चलाया। इस उग्र आंदोलन के दबाव में केंद्र सरकार को नए राज्य का गठन करना पड़ा। आंदोलन के दम पर ही KCR पहली बार तेलंगाना के मुख्यमंत्री बने और उनकी पार्टी ने लंबे समय तक राज्य पर शासन किया।
3. अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस (ANC): रंगभेद के खिलाफ विश्व की सबसे बड़ी लड़ाई
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन से सत्ता में आने का सबसे बड़ा उदाहरण दक्षिण अफ्रीका की अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस है। 1912 में स्थापित इस संगठन ने दशकों तक रंगभेद (Apartheid) और अश्वेतों पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ ऐतिहासिक आंदोलन, हड़तालें और बहिष्कार कार्यक्रम चलाए। आंदोलन के सबसे बड़े चेहरे नेल्सन मंडेला को 27 साल जेल में बिताने पड़े। 1994 में जब सभी नस्लों को पहली बार मतदान का अधिकार मिला, तब नेल्सन मंडेला ने भारी जीत दर्ज की और देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बनकर इतिहास रचा।
4. ब्राजील की वर्कर्स पार्टी: ट्रेड यूनियन के आंदोलन से राष्ट्रपति पद तक
1980 के दशक में ब्राजील में सैन्य तानाशाही के दौर में जब मजदूरों के अधिकारों का दमन हो रहा था, तब कई ट्रेड यूनियनों, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मिलकर ‘वर्कर्स पार्टी’ की नींव रखी। इस जनआंदोलन के शीर्ष नेता लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा (Lula da Silva) बने। लूला दा सिल्वा ने मजदूरों के इस आंदोलन को राजनीतिक ताकत में बदला और 2003 में पहली बार ब्राजील के राष्ट्रपति चुने गए।
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विफल उदाहरण भी कम नहीं
जहां एक तरफ AAP, TRS, ANC और वर्कर्स पार्टी जैसे आंदोलनों ने सत्ता के शिखर को छुआ, वहीं दुनिया में कई ऐसे विरोध प्रदर्शन भी रहे जिनसे पार्टियां तो बनीं लेकिन वे लंबी सफलता हासिल नहीं कर सकीं। इनमें जर्मनी की ‘पाइरेट पार्टी’, अमेरिका का ‘ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट’ आंदोलन और इटली का ‘फाइव स्टार मूवमेंट’ शामिल हैं, जो शुरुआत में लोकप्रिय होने के बाद धीरे-धीरे मुख्यधारा में अपनी पकड़ खो बैठे। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कराने के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन तक ही सीमित रहती है या भविष्य में किसी राजनीतिक विकल्प के रूप में उभरती है।
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