Pauranik Katha: जगन्नाथ पुरी में क्यों नहीं हैं राधा रानी, फैली आंखें और जानें अधूरे विग्रह का क्या है रहस्य
Pauranik Katha: ओडिशा का जगन्नाथ धाम पूरी दुनिया के श्रद्धालुओं के लिए असीम आस्था और आश्चर्य का केंद्र है। मंदिर के गर्भगृह में विराजमान मूर्तियों को देखकर अक्सर भक्तों के मन में दो बड़े सवाल उठते हैं— पहला यह कि भगवान श्रीकृष्ण के साथ राधा रानी के बजाय उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा क्यों विराजमान हैं और उनकी आंखें इतनी फैली हुई क्यों हैं? दूसरा यह कि इन तीनों विग्रहों के हाथ-पैर अधूरे क्यों बने हुए हैं? इन रहस्यों के पीछे पौराणिक काल की दो बेहद रोचक और भावुक कथाएं जुड़ी हुई हैं।
माता यशोदा सुना रही थीं गोपियों की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार माता यशोदा और माता देवकी द्वारका पधारीं। वहां भगवान कृष्ण की रानियों ने माताओं से प्रभु के बचपन की लीलाओं और गोपियों के साथ उनके अनन्य प्रेम का वर्णन करने का आग्रह किया। उनके साथ कृष्ण की बहन सुभद्रा भी वहीं मौजूद थीं। माता यशोदा ने शर्त रखी कि वह यह कथा सुना तो देंगी, लेकिन यह बात कृष्ण और बलराम के कानों तक बिल्कुल नहीं पहुंचनी चाहिए। कथा के दौरान कोई अंदर न आ सके, इसके लिए बहन सुभद्रा खुद मुख्य द्वार पर पहरा देने के लिए खड़ी हो गईं।
इसके बाद जैसे ही माता यशोदा ने कृष्ण की मधुर बाल-लीलाओं और गोपियों के प्रेम का गान शुरू किया, सभी रानियां भाव-विभोर होकर अपनी सुध-बुध खो बैठीं। द्वार पर खड़ी सुभद्रा भी कथा के रसपान में इतनी लीन हो गईं कि उन्हें पता ही नहीं चला कि कब भगवान श्रीकृष्ण और बलराम वहां आ पहुंचे। अपने बचपन की लीलाओं और ब्रज-प्रेम की बातें सुनते-सुनते तीनों भाई-बहन भाव-समाधि में चले गए। अति-आनंद की स्थिति में उनकी आंखें फैलने लगीं और शरीर कांति से पिघलने लगा।
कलयुग में दर्शन देने का भगवान ने दिया था वचन
ठीक उसी समय वहां देवर्षि नारद का आगमन हुआ। किसी के आने की आहट से कथा वहीं रुक गई। नारद जी ने जब श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के उस अलौकिक, भाव-विभोर और फैली आंखों वाले रूप को देखा, तो वे मोहित हो गए। नारद जी ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की- हे प्रभु! आपका यह रूप अत्यंत विहंगम और सुंदर है। कृपा कर सामान्य जन-मानस के कल्याण के लिए भी इस रूप में दर्शन दें। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें वचन दिया कि कलयुग में वे अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के साथ इसी विग्रह रूप में अवतरित होंगे। यही वजह है कि पुरी में राधा जी के बजाय तीनों भाई-बहन एक साथ विराजमान हैं और उनकी आंखें विशाल रूप में फैली हुई हैं।
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आखिर क्यों अधूरे रह गए भगवान के हाथ
जगन्नाथ पुरी की मूर्तियों के अधूरे निर्माण के पीछे एक अन्य प्रसिद्ध पौराणिक कथा प्रचलित है। परंपरा के अनुसार, भगवान जगन्नाथ की मूल मूर्ति इंद्रनील (नीलमणि) से निर्मित थी, जो एक वृक्ष के नीचे मिली थी। उसकी चकाचौंध इतनी तीव्र थी कि धर्म ने उसे पृथ्वी के भीतर छुपा दिया। मालवा के राजा इंद्रद्युम्न को स्वप्न में इसी मूर्ति के दर्शन हुए। राजा की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें निर्देश दिया कि वे पुरी के समुद्र तट पर जाएं, जहां उन्हें लकड़ी का एक विशाल लट्ठा (दारु) मिलेगा, जिससे वे मूर्तियों का निर्माण करवाएं।
राजा को तट पर वह दिव्य लकड़ी मिल गई। इसके बाद स्वयं भगवान विष्णु और देव-शिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के रूप में राजा के सामने प्रकट हुए। उन्होंने मूर्तियां बनाने का बीड़ा उठाया, लेकिन एक शर्त रखी— वे एक महीने तक एक बंद कमरे में मूर्तियां बनाएंगे और जब तक काम पूरा न हो जाए, राजा या कोई भी अन्य व्यक्ति उस कमरे का दरवाजा नहीं खोलेगा।
उत्सुकता में खुला दरवाजा और देव-विधान से स्थापित हुए अधुरे विग्रह
महीने के अंतिम दिनों में कमरे के भीतर से आ रही औजारों की आवाजें अचानक बंद हो गईं। कई दिनों तक कोई हलचल न होने पर राजा इंद्रद्युम्न उत्सुकता और चिंता में आ गए। उन्होंने कमरा खोलकर अंदर झांक दिया। शर्त टूटते ही वृद्ध रूपधारी मूर्तिकार बाहर आ गया और उसने राजा से कहा कि यह सब दैवयोग (देव-विधान) से हुआ है। मूर्तियां अभी अपूर्ण हैं और उनके हाथ-पैर नहीं बन पाए हैं। राजा को अपने किए पर भारी पछतावा हुआ, लेकिन मूर्तिकार ने सांत्वना देते हुए कहा कि भगवान इसी अपूर्ण रूप में ही धरती पर पूजे जाएंगे। इसके बाद वही अधूरे हाथ-पैर वाले तीन विग्रह— जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा— पुरी के भव्य मंदिर में स्थापित किए गए।
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