एससी/एसटी एक्ट: संरक्षण, न्याय और निष्पक्षता के संतुलन पर एक गंभीर विमर्श
Newschuski Digital Desk: जब किसी कानून का उद्देश्य समाज के वंचित और शोषित वर्गों को सुरक्षा देना हो, तो उसकी महत्ता सर्वोपरि होती है। 1989 का अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम इसी विचार की उपज है। हालांकि, जब किसी कठोर कानून के संभावित दुरुपयोग या सामान्य विवादों को जातिगत रूप दिए जाने के आरोप सामने आते हैं, तो न्यायपालिका और समाज दोनों के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो जाती है। सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर स्वतंत्र भारद्वाज से जुड़ा हालिया मामला इसी बहस को दोबारा चर्चा के केंद्र में ले आया है।
विवाद, एफआईआर और दो अलग पक्ष
7 सितंबर को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट ने स्वतंत्र भारद्वाज को 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेजा। यह मामला जून में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान आंबेडकरवादी कार्यकर्ता संजय आजाद के साथ हुई कथित मारपीट से जुड़ा है, जिसमें बाद में दिल्ली पुलिस ने एससी/एसटी एक्ट और आपराधिक धमकी की धाराएं जोड़ीं।
संजय आजाद और सीजेपी से जुड़े कार्यकर्ताओं का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान उनके साथ मारपीट की गई और जातिगत उत्पीड़न के तहत कार्रवाई की मांग की गई। भारद्वाज का दावा है कि 25-30 लोगों की भीड़ ने उन पर हमला किया था और उन्होंने केवल आत्मरक्षा में प्रतिक्रिया दी। उनका कहना है कि हाथ के कड़े से अनजाने में चोट लगी, जिसे शुरुआती जांच और वीडियो साक्ष्यों में भी साधारण चोट के रूप में देखा गया था।
सामान्य विवाद बनाम जातिगत अपराध
अदालतों ने बार-बार स्पष्ट किया है कि हर व्यक्तिगत झगड़े, संपत्ति विवाद या कार्यस्थल के मतभेद को एससी/एसटी एक्ट के तहत नहीं लाया जा सकता।
कलकत्ता हाईकोर्ट (फरवरी 2026): कोर्ट ने टिप्पणी की कि कार्यस्थल पर हर अपमान या विवाद तब तक एससी/एसटी एक्ट का अपराध नहीं बनता, जब तक कि स्पष्ट रूप से सार्वजनिक रूप से जातिगत दुर्व्यवहार या अपमान का तत्व न मौजूद हो।
सुप्रीम कोर्ट (डॉ. सुभाष काशीनाथ महाजन मामला, 2018): शीर्ष अदालत ने कानून के संभावित दुरुपयोग पर चिंता जताते हुए कहा था कि किसी निर्दोष व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता बिना पर्याप्त जांच के नहीं छीनी जानी चाहिए।
अन्य उच्च न्यायालय: बॉम्बे, कर्नाटक और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी व्यक्तिगत दुश्मनी या आर्थिक लाभ के लिए कानून के कथित दुरुपयोग को रोकने और निष्पक्ष जांच की आवश्यकता पर बल दिया है।
एनसीआरबी आंकड़े और मुआवजे का पहलू
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़ों के अनुसार, एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में उतार-चढ़ाव देखा गया है:
वर्ष दर्ज मामलों की संख्या
2020 45,995
2022 52,866
2023 53,372 (5-वर्षीय उच्च स्तर)
2024 48,669
ध्यान देने योग्य बात यह है कि केवल एफआईआर की संख्या से किसी अपराध की अंतिम पुष्टि नहीं होती। कम दोषसिद्धि (Conviction Rate) के पीछे कमजोर जांच, गवाहों का मुकरना या आपसी समझौते जैसे कई कारण हो सकते हैं, इसलिए हर बरी हुए मामले को फर्जी कहना भी उचित नहीं है।
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समस्या का समाधान कानून को कमजोर करना या उसकी मूल भावना को समाप्त करना नहीं है। वास्तविक पीड़ितों को त्वरित न्याय और सामाजिक सुरक्षा मिलना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन साथ ही, पुलिस जांच इतनी निष्पक्ष और पारदर्शी होनी चाहिए कि कोई निर्दोष व्यक्ति केवल आरोपों के आधार पर अपनी स्वतंत्रता और सम्मान न गंवाए। कानून की विश्वसनीयता तभी बनी रहेगी जब वह पीड़ित का ढाल बने, न कि किसी के खिलाफ हथियार।
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