कांग्रेस से बगावत कर ममता ने खड़ी की थी तृणमूल, आज पार्टी के अस्तित्व पर मंडराया खतरा
Newschuski Digital Desk: पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी पार्टी अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC) इस समय अपने 28 साल के इतिहास के सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। कोलकाता में पार्टी के 80 में से 60 विधायकों द्वारा अलग गुट बनाने की बगावत के बाद, अब यह आग दिल्ली में संसदीय दल तक पहुंच चुकी है।
सूत्रों के मुताबिक, कभी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की बेहद करीबी रहीं लोकसभा सांसद काकोली घोष दस्तीदार की अगुवाई में कई सांसद सामूहिक रूप से बागी रुख अख्तियार करने जा रहे हैं। यह बागी गुट मंगलवार को लोकसभा अध्यक्ष (स्पीकर) को अपनी अलग राह चुनने से संबंधित पत्र सौंप सकता है, जिसके बाद इस विवाद के चुनाव आयोग पहुंचने की भी पूरी अटकलें हैं।

बगावत से हुआ था जन्म, अब बगावत से ही टूटने की कगार पर
दिलचस्प बात यह है कि आज टीएमसी जिस दौर से गुजर रही है, उसकी नींव भी कभी ऐसी ही एक बगावत से पड़ी थी। छात्र राजनीति से अपने सफर की शुरुआत करने वाली ममता बनर्जी 1984 में पहली बार कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुनी गई थीं। हालांकि, 1990 में वामपंथी कार्यकर्ताओं द्वारा किए गए जानलेवा हमले के बाद कांग्रेस आलाकमान के साथ उनके मतभेद बढ़ने लगे।
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ममता का मानना था कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व राष्ट्रीय राजनीति में वामपंथियों के समर्थन पर निर्भर होने के कारण बंगाल में उनके आंदोलन को दबा रहा था। नतीजा यह हुआ कि 1997 में कांग्रेस से निष्कासित होने के बाद ममता ने मुकुल रॉय जैसे दिग्गजों के साथ मिलकर 1 जनवरी 1998 को तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था।

34 साल के वामपंथी किले को ढहाकर पाई थी सत्ता
लंबे संघर्ष के बाद साल 2011 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने कांग्रेस के साथ मिलकर पश्चिम बंगाल से 34 साल पुराने वामपंथी शासन को उखाड़ फेंका था। उस चुनाव में गठबंधन को 227 सीटें मिली थीं, जिनमें से अकेले टीएमसी ने 187 सीटें जीतकर पूर्ण बहुमत हासिल किया था। इसके बाद लगातार दो और विधानसभा चुनावों में ममता बनर्जी ने अपनी सत्ता बरकरार रखी। हालांकि, हालिया विधानसभा चुनाव के बाद (4 मई से) पार्टी के भीतर शुरू हुई अंतर्कलह, बैठकों से विधायकों की दूरी, और वरिष्ठ नेताओं के निष्कासन ने आखिरकार इस ऐतिहासिक टूट का रूप ले लिया है।
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