ब्राह्मणों से इतनी घृणा क्यों?

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Acharya Shrihari
आचार्य श्रीहरि

मैं हतप्रभ हूं, आश्चर्य हूँ, गुस्से में भी हूँ। कहीं कोई शोर नहीं, कहीं कोई राजनीतिक प्रवाह और विमर्श नहीं। खामोशी से इस ज्वलंत प्रश्न और राजनीतिक घटना को दबा दिया गया। आखिर क्यों? प्रश्न तमिलनाडु की राजनीति से जुड़ा हुआ है, इस राजनीति के शिकार ब्राह्मण हैं। तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में किसी पार्टी ने ब्राह्मण को उम्मीदवार नहीं बनाया। यहां तक कि बीजेपी ने भी ब्राह्मणों को पार्टी की ओर से उम्मीदवार नहीं बनाया है। जबकि तमिलनाडु में ब्राह्मणों की संख्या कम नहीं है, इनकी गोलीबाजी भी चाकचौबंद है, इनकी यूनियन बाजी भी अतुलनीय है, इनकी बुद्धिजीवी वर्ग में दखल और चमक भी वर्चस्व वाला है। धर्म पर इनकी उपस्थिति भी पहले की तरह कायम है, कर्म कांड पर इनकी स्वीकार्यता भी सिर चढ़कर कर बोलती है। फिर भी राजनीतिक पार्टियों ने ऐसी गुस्ताखी क्यों करने का साहस किया? यह एक विचारणीय विषय है, जिस पर सामूहिक और प्रेरक चर्चा, विश्लेषण अति आवश्यक है।

सतही निष्कर्ष और सतही विश्लेषण यह है कि तमिलनाडु की पूरी राजनीति ब्राह्मण विरोधी है, ब्राह्मण विरोध की नीति राजनीतिक पार्टियों के सिर पर चढ़कर बोलती है। राजनीतिक पार्टियों की अपनी समझ भी चाकचौबंद है। राजनीतिक पार्टियों की समझ है कि ब्राह्मण प्रेम का अर्थ चुनावी हार, जनाधार संहार और राजनीतिक हार का प्रतीक है और राजनीतिक तौर पर हाशिए पर चले जाना है।

हमें इसके कारणों की जांच के लिए ब्राह्मण विरोधी राजनीति के आंदोलन और इतिहास को समझना होगा। तमिलनाडु में ब्राह्मण विरोध राजनीति के जनक पेरियार ईवी रामसामी थे। 1879 से लेकर 1973 तक तमिलनाडु की राजनीति मुख्य रूप से आत्मसम्मान आंदोलन, जाति उत्पीड़न के विरोध, संघर्ष और द्रविड़ पहचान पर केंद्रित थी। पेरियार की दो समझ प्रमुख थी। पहली समझ उनकी यह थी कि दलित और पिछड़ी जातियों की बुरी और निर्धन स्थिति के लिए ब्राह्मण वाद की अहंकारी सोच पर केंद्रित है, ब्राह्मण वाद ने पिछड़ी और दलित जातियों के जीवन को नर्क बना दिया, उनकी राजनीति को गौण बना दिया, ब्राह्मण अपनी इस सोच से निकलने के लिए तैयार ही नहीं है। इसलिए ब्राह्मणों के राजनीतिक, सामाजिक संहार का होना जरूरी है।

उनकी दूसरी समझ द्रविड़ अलग पहचान की थी, उनकी द्रविड़ पहचान की समझ में भी ब्राह्मण संयुक नहीं बल्कि पृथक थे। अंग्रेजों ने फूट डालो और राज करो की राजनीति अपनाई थी, अंग्रेजों की भी सोच थी कि पेरियार की सोच और विघटन कारी राजनीति से उनकी सत्ता और औपनिवेशिक हथकंडा जारी रहेगा। भारतीय एक-दूसरे से लड़कर स्वयं अस्थिर और कमजोर रहेंगे। हिंदुओं का विभाजित कर ही सनातन का संहार किया जा सकता है। सनातन संहार होगा, सनातन कमजोर होगा तो ही भारत में क्रिश्चियन का प्रचार प्रसार किया जा सकता है, ईसायत को स्थापित किया जा सकता है, चर्च की स्वीकार्यता को स्थापित किया जा सकता है।

परियार खुद ईसाई मानसिकता के निकट थे और पेरियार के ब्राह्मण विरोधी राजनीति व अभियान को सर्वाधिक लाभ और महत्व ईसायत को ही मिल रहा था, दलित और पिछड़ी जातियों के अंदर हिंदुत्व छोड़ने की होड़ लगी थी। इसी लाभ को देखते हुए अंग्रेजों ने पेरियार के ब्राह्मण विरोधी राजनीति और अभियान को प्रायोजित किया था। सभी प्रकार की सहायताएं दी थी। फिर तमिलनाडु में ब्राह्मणों के खिलाफ विरोध की राजनीति कैसे नहीं मजबूत होती?

आजाद भारत में ब्राह्मण विरोध राजनीति कमजोर होनी चाहिए थी लेकिन कमजोर नहीं हुई। इसके पीछे जवाहरलाल नेहरू की ब्राह्मणवादी राजनीति जिम्मेदार थी। जवाहरलाल नेहरू के समय उनके मंत्रिमंडल और मुख्यमंत्रियों में ब्राह्मणों का आधिपत्य था। मुख्यमंत्री होने की योग्यता ब्राह्मण होना ही थी। तमिलनाडु में करुणानिधि ब्राह्मण विरोधी राजनीति के चेहरा और मुनाफाखोर बन गए। करुणानिधि की पार्टी द्रमुक ब्राह्मण विरोधी राजनीति के सिर पर चढ़कर सत्ता सीन हो गई। इधर ज्योतिराव फुले, करुणानिधि और भीमराव अंबेडकर ब्राह्मण विरोधी राजनीति के अभियानी बन गए।

राजनीति के ये त्रिकोण ने दक्षिण भारत को ब्राह्मण विरोधी राजनीति का केंद्र बना दिया और दक्षिण भारत में ब्राह्मणों की राजनीति कमजोर कर डाली। पिछड़ी और दलित जातियों की राजनीति को खाद और पानी दिया। इसका सुखद स्थिति उत्पन्न हुई और सुखद परिणाम निकला। पिछड़ी और दलित जातियों की राजनीति लहलहा उठी। भीमराव और ज्योतिराव फुले का अवसान हुआ, तो फिर बसपा और कांशीराम की ब्राह्मण विरोधी राजनीति सिर चढ़कर बोलने लगी थी। कांशीराम ने पेरियार की ब्राह्मण विरोधी राजनीति की मानसिकता को दक्षिण भारत से उठाकर उत्तर भारत में स्थापित कर दिया। उत्तर प्रदेश मायावती, मुलायम सिंह यादव, बिहार में लालू प्रसाद यादव आदि का रणनीतिक उदय और विकास इसी सिद्धांत का परिणाम है। कांग्रेस में मलिकार्जुन खरगे भी इसी सोच का परिणाम है। आज बिहार और उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मुख्यमंत्री की कल्पना भी नहीं की जा सकती है।

पेरियार, ज्योतिराव फुले, भीमराव अंबेडकर की ब्राह्मण विरोधी आग को मद्धिम करने में नरेंद्र मोदी का योगदान महान है। जिस ब्राह्मणवाद की आग की मारक क्षमता को परियार, फुले, करुणानिधि, अंबेडकर और कांशीराम ने शक्तिहीन कर दिया था, उस ब्राह्मणवाद की संस्कृति और राजनीति को नरेंद्र मोदी ने खाद और पानी देकर शक्तिशाली बना दिया। नरेंद्र मोदी की ब्राह्मणवादी विचारधारा और राजनीति का अवलोकन कीजिए। महाराष्ट्र और राजस्थान के मुख्यमंत्री ब्राह्मण हैं, बीजेपी शासित राज्यों में जहां मुख्यमंत्री ब्राह्मण नहीं हैं, उन राज्यों में अधिकतर उप मुख्यमंत्री ब्राह्मण हैं।

नरेंद्र मोदी सरकार में सर्वाधिक मंत्री ब्राह्मण हैं, बीजेपी के सांसदों में ब्राह्मणों का आधिपत्य जनसंख्या से अधिक है। केंद्रीय विश्वविद्यालय और बीजेपी शासित राज्यों में विश्व विद्यालयों के कुलपतियों में ब्राह्मणों का आधिपत्य है। बीजेपी के अंदर प्रचारकों और पार्टी पदाधिकारियों में ब्राह्मणों की उपस्थितियां सर्वाधिक और सर्वश्रेष्ठ है। सबसे बड़ी बात यह है कि सवर्ण जातियों को मोदी ने दस प्रतिशत आरक्षण दिया है, जबकि सवर्ण जातियों की देश भर में जनसंख्या पंद्रह प्रतिशत तक ही बताई जाती है। सबसे बड़ी बात यह है कि सवर्णों के दस प्रतिशत आरक्षण का सर्वाधिक लाभ ब्राह्मण उठा रहे हैं।

पिछड़ों का आरोप है कि उनका आरक्षण ब्राह्मण खा रहे हैं। इसी कारण राहुल गांधी पिछड़ों और दलितों को ब्राह्मण विरोधी राजनीति का हथकंडा बना कर जातीय जनगणना के लिए अभियानरत हैं। संघ ने मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का कार्ड दांव नहीं खेला होता तो फिर संघ का ब्राह्मणवाद दफन हो जाता। क्योंकि मोदी के नाम पर ही दलित और पिछड़ी राजनीति की गोलबंदी बीजेपी के पक्ष में हुई थी।

ब्राह्मण ही इस राजनीति के लिए दोषी हैं, ब्राह्मण कभी भी संतुष्ट नहीं होने वाले हैं। राष्ट्रपति, उप राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सांसद के सभी पद इन्हें दे दिया जाएगा, तो भी ये संतुष्ट होने वाले नहीं हैं। इसका उदाहरण नरेंद्र मोदी हैं। आज ब्राह्मण नरेंद्र मोदी के खिलाफ जिस तरह की साजिश में लगे हुए हैं, जिस तरह से सरेआम गलियां बकने का काम करते हैं। मोदी को प्रधानमंत्री पद से बेदखल करना चाहते हैं, इससे यही साबित होता है कि ये अपनी जाति से बाहर जाकर कुछ भी सोचना नहीं चाहते हैं। लोकतांत्रिक गणराज्य में जनसंख्या महत्वपूर्ण स्थान रखती है, यह बात ब्राह्मणों को समझनी होगी।

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आज नितिन गडकरी या संजय जोशी के ब्राह्मणवादी सोच से बीजेपी को सत्ता नहीं मिलने वाली है। अगर मोदी की सत्ता डूबेगी तो फिर ब्राह्मणों का जातिवाद सबसे पहले डूबेगा। राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, स्टालिन आदि ब्राह्मणों के आधिपत्य की राजनीति का संहार कर देंगे। ब्राह्मणों ने परशुराम के नाम पर यूनियन बाजी खड़ा कर हिंदुत्व के अंदर भी डर, भय कायम कर दिया है।

ब्राह्मणों की भलाई और उचित सम्मान, राजनीति प्रतिनिधित्व कैसे संभव होगा। ब्राह्मणों को सर्वश्रेष्ठता का अहंकार छोड़ना होगा। मांस, मदिरा का सेवन करने वाले और अनैतिक ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ और पवित्र कैसे? फिर मदिरा, मांस का सेवन करने वाली दलित और पिछड़ी जातियां अशुद्ध कैसे? इस कसौटी पर ब्राह्मण भी गंदे और पथ भ्रष्ट कैसे नहीं हैं। ब्राह्मणों को ऊंच नीच की मानसिकता भी छोड़नी होगी। ब्राह्मणों को सनातन का विरासत और संरक्षक बनना चाहिए। अगर फिर भी ब्राह्मण लोकतांत्रिक गणराज्य की इस अनिवार्यता को नहीं समझ सके, तो फिर उनकी स्थिति तमिलनाडु जैसी पूरे देश में होने लगेगी। सनातन की अन्य जातियां भी ब्राह्मण उम्मीदवारों के वोट देने से परहेज करेगी। राजनीतिक पार्टियों भी इस स्थिति में ब्राह्मण उम्मीदवारों पर दांव लगाना छोड़ देंगी।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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