देश में शिक्षा का हाल, आंकड़ों से समझें भारतीय स्कूली व्यवस्था की हकीकत

Indian Education System

UDISE Plus Report: राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर देश के सरकारी स्कूलों की दशा सुधारने को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। स्कूल ठीक करो जैसी मुहिमों के तहत विभिन्न राज्यों के सरकारी स्कूलों का दौरा कर व्यवस्था और जवाबदेही पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे में यह समझना जरूरी हो जाता है कि भारतीय स्कूली शिक्षा की वास्तविक तस्वीर आंकड़ों के आईने में कैसी दिखती है।

स्कूलों, छात्रों और शिक्षकों का आंकड़ा

शिक्षा मंत्रालय के यूनिफाइड डिस्ट्रिक्ट इनफॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (UDISE+) के डेटा के अनुसार, भारत में कुल 14.67 लाख स्कूल संचालित हो रहे हैं। इनमें से 12.03 लाख स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में हैं, जबकि 2.64 लाख स्कूल शहरी इलाकों में स्थित हैं। कुल स्कूलों में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी लगभग 69 प्रतिशत (10.05 लाख) है। देश में कुल स्कूली छात्रों की संख्या 24.72 करोड़ है, जिन्हें पढ़ाने के लिए 1.02 करोड़ शिक्षक तैनात हैं।

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बड़ी कक्षाओं तक पहुंचते-पहुंचते कम हो जाते हैं छात्र

UDISE+ (2025-26) की रिपोर्ट एक गंभीर समस्या की ओर इशारा करती है। प्राथमिक कक्षाओं में बच्चों का रिटेंशन रेट 98.5 फीसदी रहता है, जो तीसरी-चौथी कक्षा तक घटकर 91.1 फीसदी और छठी से आठवीं तक 83.7 फीसदी रह जाता है। माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर (9वीं से 12वीं) तक पहुंचते-पहुंचते यह आंकड़ा गिरकर महज 51.9 प्रतिशत पर आ जाता है। हालांकि, अगली कक्षा में प्रमोट होने के मामले में लड़कों की तुलना में लड़कियों का प्रदर्शन बेहतर देखा गया है।

कक्षाओं में तेजी से छात्र छोड़ रहे पढ़ाई

स्कूली शिक्षा के दौरान या बाद में पढ़ाई छोड़ देने यानी ड्रॉपआउट रेट का पैटर्न भी चिंताजनक है। UDISE+ रिपोर्ट के अनुसार, कक्षा 1 से 5 तक प्रति 100 में से केवल 0.3 बच्चे ही स्कूल छोड़ते हैं। कक्षा 6 से 8 के बीच यह संख्या बढ़कर 3.5 हो जाती है, जबकि 9वीं और 10वीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते हर 100 में से 12 बच्चे पढ़ाई बंद कर देते हैं।

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पढ़ने की क्षमता और गुणवत्ता पर सवाल

द एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER 2024) के सर्वेक्षण से पता चलता है कि बच्चे स्कूल तो पहुंच रहे हैं, लेकिन उनकी बुनियादी पढ़ाई का स्तर काफी कमजोर है। कक्षा 3 के सरकारी स्कूलों के मात्र 23.4% बच्चे ही कक्षा 2 का पाठ पढ़ पाते हैं (निजी में 35.5%)। कक्षा 5 में यह आंकड़ा सरकारी में 44.8% और निजी में 59.3% है। वहीं कक्षा 8 में सरकारी स्कूलों के 67.5% और निजी के 80% छात्र ही कक्षा 2 का पाठ पढ़ सके। 2014 से 2024 के बीच 10 वर्षों के रुझान देखें तो कक्षा 8 के छात्रों की पढ़ने की क्षमता में सुधार के बजाय गिरावट दर्ज की गई है।

स्कूलों में कहीं टॉयलेट-पानी का अभाव, तो कहीं शून्य नामांकन

ASER और नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, पेयजल (77.7%) और बालिकाओं के लिए शौचालय (72%) की स्थिति में बीते वर्षों में सुधार हुआ है। इसके बावजूद नीति आयोग का डेटा बताता है कि देश के 1.19 लाख स्कूलों में बिजली नहीं है, 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए उपयोग योग्य टॉयलेट नहीं हैं, 14,505 में पानी और 59,829 स्कूलों में हाथ धोने का प्रबंध नहीं है।

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इसके अलावा, देश में 1.04 लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं (जिनमें 89% ग्रामीण क्षेत्रों में हैं)। वहीं UDISE+ के अनुसार, 5,663 स्कूल ऐसे हैं जहां शिक्षक तो हैं पर छात्र एक भी नहीं हैं; इस सूची में पश्चिम बंगाल (2,200) और तेलंगाना (1,400) सबसे ऊपर हैं। हालांकि, शून्य नामांकन वाले स्कूलों की संख्या में 2022-23 (10,294) के मुकाबले कमी आई है।

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शिक्षकों के लाखों पद रिक्त, बजट आवंटन के रुझान

देश में शिक्षकों की भारी कमी बनी हुई है। प्राथमिक और उच्च प्राथमिक स्तर पर 7.5 लाख पद तथा माध्यमिक व उच्च माध्यमिक स्तर पर विषय विशेषज्ञ शिक्षकों के 4.09 लाख से अधिक पद खाली हैं। केंद्रीय विद्यालयों में 13.1% और नवोदय विद्यालयों में 24.8% शिक्षण पद रिक्त चल रहे हैं।

वित्तीय आंकड़ों की बात करें तो UDISE+ के अनुसार, 2024-25 की तुलना में 2025-26 में शिक्षकों के वेतन पर खर्च में 25.13% की कमी आई है (₹8,133.91 करोड़ से घटकर ₹13,576.20 करोड़), जबकि इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च 74.96% बढ़ाकर ₹4,629.52 करोड़ कर दिया गया है। वहीं कुल राष्ट्रीय बजट में शिक्षा की हिस्सेदारी 2013-14 के 4.6% से घटकर 2025-26 में 2.5% रह गई है, जो बीते 12 वर्षों में 46% की गिरावट को दर्शाती है।

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