अपने आप पर हंस रहा है, जनार्दन

सारे छोटे-बड़े नेता कहते रहते हैं कि हम छात्रों के साथ, नौजवानों के साथ, किसानों के साथ और पीड़ितों के साथ हैं। आह! ऐसे उदार वचन को सुनकर कलेजा मोम की तरह पिघल जाता है। लेकिन क्या आपने किसी बड़े नेता को कभी छात्रों, किसानों या नौजवानों के साथ अनशन करते देखा है? क्या आपने, किसी नेता को किसी दूसरे नेता के खिलाफ FIR करते देखा है?
पर्दा गिर गया। अब दूसरा दृश्य
देश या प्रदेश के सालाना बजट में पाई-पाई खर्च होने का ब्यौरा दिया जाता है। जैसे देश या प्रदेश का बजट 100 रुपये है। तो बताया जाता है, 10 रुपये फलां चीज के लिए, 30 रुपये फलां चीज के लिए, 2 रुपये फलां चीज के लिए, 8 फलां चीज के लिए, 7 रुपये फलां चीज के लिए 3 रुपये फलां चीज के लिए आदि। इस तरह स्पष्ट कर दिया जाता है कि खर्च करने के लिए देश की तिजोरी में 100 रुपये हैं और मुकम्मल 100 रुपये फलां, फलां मद में खर्च होंगे।
मीडिया बजट को आकर्षक हेडिंग में छापता है। टीवी पर बैठकर अर्थशास्त्री तथा पक्ष, विपक्ष के लोग नुक्ताचीनी करते हैं- अबकी बार शिक्षा में उतना नहीं मिला, कृषि में कटौती हुई आदि। लेकिन कभी किसी के दिमाग में यह प्रश्न क्यों नहीं आया कि आजादी से लेकर आज तक के बजट में- माननीयों की वातानुकूलित गाड़ी, मोटर, बंगले, नौकरों-चाकरों की फौज, बिजली, पानी, बंगले की सुरक्षा से लेकर साथ चलने वाले हजारों सुरक्षा कर्मियों के वेतन, देशी-विदेशी पर्यटन, फर्स्ट क्लास रेल यात्रा, हवाई यात्रा, टेलीफोन, क्लब, अन्य आयोजन आदि पर हर साल खर्च होने वाले अरबों रुपयों का जिक्र बजट में क्यों नहीं होता है? जब देश की तिजोरी (बजट) में खर्च करने के लिए 100 रुपये ही थे और सब जनकल्याण में खर्च हो गए या होने हैं तो फिर माननीयों का पालन-पोषण कैसे और किन पैसों से होता है?
जब बजट में सुई से लेकर उपग्रह तक पर होने वाला खर्च बताया जाता है, तो देश के खून पसीने से नेताओं पर खर्च होने वाले अथाह धन को बताने में हिचक क्यों? उस पर परदेदारी क्यों?
तीसरा दृश्य
जनता को जनार्दन- कहने की यह परम्परा पूरी शिद्दत के साथ आजादी के बाद से ही जारी है। लेकिन जर्नादन को यह जानने का हक नहीं है कि उनके प्रतिनिधियों के ऐश्वर्य पूर्ण जीवन पर प्रति वर्ष खर्च होने वाली आवंटित धनराशि कितनी होती है? क्या वह राशि रेल, रक्षा, शिक्षा, स्वास्थ और कृषि जैसे अति महत्वपूर्ण विषयों से ज्यादा है? बराबर है? कम है? क्या है? जनार्दन (हा, हा, हा,..)। आजाद देश के जनार्दन का “स्तर” इस खर्च को जानने लायक नहीं है।
प्रजातंत्र तंत्र जिंदाबाद। संविधान जिंदाबाद। कांग्रेस जिंदाबाद। भाजपा जिंदाबाद। सपा, बसपा जिंदाबाद। सारी चिलगोजा पार्टियां जिंदाबाद।
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सच तो सियासत भी जानती है कि जनता “जनार्दन, जनार्दन नहीं, बल्कि पीढिय़ों से मति मारे जाने के कारण (दूसरे शब्दों में अपने को अति बुद्धिमान मानने के कारण) ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, अगड़ा, पिछड़ा, हिंदू और मुसलमान नामक घंटा बन चुकी है। जिसे हर राजनीतिक दल अपने-अपने स्वार्थ, खुदगर्ज़ी और अहंकार तृप्ति के लिए समय-समय पर बजाते रहते हैं।
जातीय जनगणना, उसी घंटे को तेजी से बजाने का ताजा इंतजाम है। ठहरिए! अंत में एकबार फिर शुरुआत का पहला पैराग्राफ अवश्य पढ़े। यह जनार्दन का जनार्दन से निवेदन है। हा, हा, हा, हा….। हंस रहा हूं क्योंकि अपने पर हंसने और अपने में रोने के अलावा जनार्दन किस लायक है? अपनी इस स्थिति का कारण अनपढ़, लम्पट, मावली और अपराधी नेता नहीं, बल्कि उनको संसद पहुंचाने वाला हमारा लम्पट, मावली और अपराधी मन है। यही सच है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)
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