क़लम की इच्छा

0
172
अरबिन्द शर्मा अजनवी
अरबिन्द शर्मा अजनवी

क़लम हमारी, हमसे बोली,
कविता कोई, प्यारी लिख दो।
विरह व्यथा तुम, बहुत लिख चुके,
अब प्रेम प्यार पर, कुछ लिख दो।।

गिरि से गिरते, निर्मल झरने,
आलिंगन करते नदियों को।
मधुकर को, फूलों संग हँसते,
उपवन में खिलते कलियों को।।

प्रणय मिलन अलबेली का तुम,
प्रेम भरा कोई, राग लिख दो।
क़लम हमारी, हमसे बोली,
कविता कोई, प्यारी लिख दो।।

हो कोयल जैसी, कूक सुहानी,
अंतर्मन की, जो ललक बढ़ाये।
मिलें संग जब, राग रागिनि,
आंनद ह्रदय में छा जाये।।

नवयौवना के, मदमस्त नैन को,
मधुशाला का जाम, लिख दो।
क़लम हमारी, हमसे बोली,
कविता कोई, प्यारी लिख दो।।

मेरी प्यारी क़लम सुनो!
जो तुम कहती हो, बात सही है!
पर, जो ह्रदय प्रेम से वंचित हो,
वह प्रेम राग कैसे, लिख दे?

सदा रहा दु:ख, जिसका साथी,
सुख, जिससे नफ़रत करती हो।
वह प्रेम गीत कैसे लिख दे?
जब दर्द ह्रदय से उठती हो।।

इसे भी पढ़ें: मोर साजन

Mob- 08736945889
Email- [email protected] Com

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here