नाम-साधना और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के महानायक थे मौनी महाराज: डॉ. अभिषेक उपाध्याय

Shri Mouni Ji Maharaj

लुधियाना/सिवान: भारतीय सनातन संस्कृति में संतों का प्राकट्य समाज के कल्याण और ईश्वर की अहैतुकी कृपा का साक्षात प्रमाण होता है। साकेतवासी श्री श्री 1008 मौनी महाराज एक ऐसे ही दिव्य युगपुरुष थे, जिन्होंने गृहस्थ जीवन में रहते हुए भी वैराग्य, तपस्या और अखण्ड नाम-साधना का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया। यह उद्गार जम्मू-कश्मीर प्रांत के मंदिर एवं गुरुकुल सेवा योजना प्रमुख और श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट के मुख्य न्यासी पं. डॉ. अभिषेक कुमार उपाध्याय ने व्यक्त किए। उन्होंने महाराज के जीवन और उनके सामाजिक अवदान पर विस्तार से प्रकाश डाला।

गृहस्थ जीवन में सिद्धत्व और 12 वर्षों की कठिन हिमालय साधना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के बागी बलिया की पावन धरती पर जन्मे मौनी जी महाराज ने यह सिद्ध कर दिया कि परमात्मा की प्राप्ति केवल संन्यासियों का विशेषाधिकार नहीं है। वे अयोध्या धाम स्थित तपस्वी छावनी (श्रीरामघाट) के सिद्ध संत रामगुलाम दास महाराज (बलुईया बाबा) के दीक्षित शिष्य थे। महाराज के जीवन का सबसे अलौकिक पक्ष उनकी 12 वर्षों की कठिन और गुप्त हिमालय साधना रही। लोक-प्रशंसा से दूर रहकर उन्होंने कंदराओं में जो तप किया, उसने भावी समाज के आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त किया। साधना पूरी होने के बाद उनका पूरा जीवन श्रीसीताराम नाम संकीर्तन के प्रचार-प्रसार में समर्पित हो गया।

Shri Mouni Ji Maharaj

लोकपरम्परा और सामाजिक समरसता के प्रणेता

महाराज ने जटिल दार्शनिक बहसों के बजाय आम जनमानस को श्रीसीताराम नाम का सीधा और सरल मार्ग दिखाया। उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों में सियाराम विवाहोत्सव और श्रीराम कलेवा जैसी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं की शुरुआत की। उनकी जन्मभूमि बलिया में पिछले 76 वर्षों से लगातार पौष मास में आयोजित होने वाला दुल्हा सरकार का भव्य विवाहोत्सव और बिहार सहित देश के कई राज्यों में चल रहे अखंड कीर्तन इसके जीवंत प्रमाण हैं।

वर्ष 1986 में आषाढ़ शुक्ल अष्टमी के दिन महाराज साकेतवासी हो गए, परंतु उनके विचार और संस्कार आज भी लाखों अनुयायियों का मार्गदर्शन कर रहे हैं। वर्तमान समय में जहाँ समाज नैतिक अवमूल्यन और मानसिक अशांति से जूझ रहा है, वहाँ उनका संदेश और अधिक प्रासंगिक हो जाता है।

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सिवान में जुटेगा संतों का समागम, सजेगा महाभंडारा

इसी पावन स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए बिहार के सिवान जिले के श्रीनगर (पिहुली मंदिर) स्थित श्रीरामजानकी मंदिर में 20-21 जुलाई 2026 को महाराज की 41वीं साकेतवास पुण्यतिथि भव्य रूप से मनाई जा रही है। श्रीरामजानकी मंदिर के महंत राघव दास महाराज और श्री मौनी बाबा चैरिटेबल ट्रस्ट के संयोजन में आयोजित होने वाले इस दो दिवसीय महोत्सव में अखंड श्रीरामचरितमानस पाठ, सुंदरकांड, सामूहिक हनुमान चालीसा, भजन संध्या, संत प्रवचन और विशाल महाप्रसाद-भंडारे का आयोजन किया जाएगा।

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