भारत के वे ऐतिहासिक जन-आंदोलन, जिन्होंने बदल दी देश की राजनीति
Historical protests in India: जब भी देश की राजधानी दिल्ली की सड़कों पर युवा, छात्र संगठन या विपक्षी दल लोकतांत्रिक पारदर्शिता, चुनावी निष्पक्षता या प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर उतरते हैं, तो इतिहास के पन्ने खुद-ब-खुद पलट जाते हैं। सत्ता पक्ष भले ही ऐसे आंदोलनों को कानून-व्यवस्था का संकट या राष्ट्रविरोधी करार देने की कोशिश करे, लेकिन राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि जन-आंदोलन ही भारतीय लोकतंत्र का वास्तविक लाइफब्लड (प्राणतत्व) हैं।
आइए एक नजर डालते हैं भारत के उन ऐतिहासिक और प्रभावशाली विरोध प्रदर्शनों पर, जिन्होंने न केवल देश की नीतियां बदलीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों को भी पूरी तरह उलट दिया।
दक्षिण भारत का हिंदी विरोधी आंदोलन (1965)
संविधान के तहत 26 जनवरी 1965 से केंद्र सरकार के कामकाज में हिंदी को प्राथमिक आधिकारिक भाषा बनाने की योजना थी, जिसके खिलाफ तमिलनाडु में रोजगार और प्रशासनिक अवसरों को लेकर गहरी आशंकाएं पैदा हुईं। द्रविड़ मुनेत्र कषगम (DMK) के शीर्ष नेता सी.एन. अन्नादुरई और एम. करुणानिधि के नेतृत्व में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने आश्वासन दिया कि जब तक गैर-हिंदी राज्य चाहें, अंग्रेजी का इस्तेमाल जारी रहेगा। 1967 के चुनाव में DMK ने कांग्रेस को उखाड़ फेंका और राज्य की राजनीति हमेशा के लिए बदल गई।
जेपी आंदोलन (1970 का दशक)
1973-74 में गुजरात और बिहार से शुरू हुआ छात्र आंदोलन जब वयोवृद्ध गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायण (JP) के हाथों में आया, तो यह इंदिरा गांधी सरकार के खिलाफ राष्ट्रीय जनाक्रोश बन गया। इसके जवाब में 25 जून 1975 को देश में आपातकाल (Emergency) लागू कर दिया गया। 1977 में आपातकाल हटने के बाद पूरा विपक्ष एकजुट हुआ और भारत के इतिहास में पहली बार केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकार (जनता पार्टी) बनी।
मंडल आयोग का विरोध और उदारीकरण के खिलाफ आंदोलन (1990 का दशक)
1990 में पीएम वीपी सिंह द्वारा अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए 27% आरक्षण की घोषणा, जिसके बाद मंडल बनाम कमंडल की लंबी बहस छिड़ गई। 1992 में सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर को बाहर रखते हुए इसे वैध ठहराया। पीवी नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा लाए गए LPG (उदारीकरण, निजीकरण, वैश्वीकरण) सुधारों का ट्रेड यूनियनों और वामपंथियों ने कड़ा विरोध किया, हालांकि नीतिगत सुधार जारी रहे।
राम मंदिर आंदोलन (1990)- आडवाणी की राम रथयात्रा
लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा 25 सितंबर 1990 को सोमनाथ से शुरू हुई, जिसका उद्देश्य अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए जनसमर्थन जुटाना था। 23 अक्टूबर 1990 को बिहार के समस्तीपुर में लालू प्रसाद यादव के आदेश पर आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस यात्रा ने राम मंदिर आंदोलन को तीव्र गति दी और आगे चलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के राष्ट्रीय राजनीति में उभार का मुख्य आधार बनी।
अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन (2011)
UPA सरकार के कार्यकाल में बड़े भ्रष्टाचार घोटालों के खिलाफ अन्ना हजारे ने दिल्ली के रामलीला मैदान में अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल की। इस आंदोलन से अरविंद केजरीवाल, किरण बेदी और प्रशांत भूषण जैसे चेहरे उभरे। दिसंबर 2013 में संसद ने ‘जन लोकपाल कानून’ पारित किया और बाद में आप (AAP) का गठन हुआ।
निर्भया आंदोलन (2012)
16 दिसंबर 2012 को दिल्ली में हुए भीषण सामूहिक दुष्कर्म और हत्या कांड के बाद महिलाओं की सुरक्षा को लेकर देश भर में स्वतःस्फूर्त और उग्र प्रदर्शन हुए। जनता के भारी दबाव में सरकार ने जस्टिस वर्मा समिति का गठन किया और संसद ने क्रिमिनल लॉ (अमेंडमेंट) एक्ट 2013 पारित कर यौन अपराधों के कानूनों को बेहद सख्त बनाया।
CAA, NRC और NPR विरोधी आंदोलन (2019-20)
दिसंबर 2019 में पारित नागरिकता संशोधन कानून (CAA), NRC और NPR के खिलाफ देशव्यापी बहस और प्रदर्शन शुरू हुए। दिल्ली का शाहीन बाग महिलाओं के नेतृत्व वाले धरने का ऐतिहासिक प्रतीक बना। हालांकि कानून वापस नहीं हुआ, लेकिन इसके क्रियान्वयन में देरी हुई और मार्च 2024 में इसके नियम अधिसूचित किए गए।
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किसान आंदोलन (2020-21)
केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों के खिलाफ, जिससे मंडियों और MSP व्यवस्था कमजोर होने की आशंका थी। हजारों किसान दिल्ली की सीमाओं पर महीनों डटे रहे। लगभग एक वर्ष तक चले इस ऐतिहासिक संघर्ष के बाद नवंबर 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की। यह जन-दबाव से नीतिगत रियायत हासिल करने का सबसे बड़ा उदाहरण बना।
कॉकरोच और युवा आंदोलन (2026)
बेरोजगारी पर प्रशासनिक बयानों और मेडिकल परीक्षाओं (NEET) में कथित अनियमितताओं के विरोध में युवाओं द्वारा कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) जैसे दबाव समूहों का उभरना। जुलाई 2026 में व्यापक छात्र प्रदर्शनों के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपना पद छोड़ना पड़ा। वर्तमान में यही युवा और विपक्षी दल चुनाव आयोग की पारदर्शिता और मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे को लेकर मुखर हैं।
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