स्वाधीनता के अमृत वर्ष महोत्सव पर विशेष: कलियुग में पृथ्वी पर ऋषि है या भारत भाग्य विधाता

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Sanjay Tiwari
संजय तिवारी

उनको किस रूप में प्रस्तुत किया जाना चाहिए, यह पाठक स्वयं तय कर लें। उनकी शैक्षिक योग्यता, पारिवारिक पृष्ठभूमि और उनकी शिष्य परंपरा इतनी समृद्ध और अत्याधुनिक है कि किसी को सहसा यकीन नहीं होगा। प्रख्यात अर्थशास्त्री और भारतीय रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन उनके शिष्यों में से एक हैं। वह ऐसे विद्वान और कर्म योगी हैं, जिन्होंने भारत सरकार के सर्वोच्च पद्म सम्मान लेने से कई बार मना कर दिया। आज वह जिस स्थिति में रहते हैं वह महात्मा गांधी की गढ़ी हुई, दिखने वाली गरीबी नहीं है। वह सचमुच घने जंगलों में आदिवासियों के बीच रह कर सचमुच की तपस्या कर रहे हैं। उनका नाम है प्रो. आलोक सागर।

यदि आप उनसे पूर्व परिचित नहीं हैं, तो आप पहली नजर में वनवासी ही समझेंगे। हम बात कर रहे हैं शाहपुर से करीब 25 किलोमीटर दूर कोचामऊ के कल्ला के खेत में झोपड़ी बनाकर रहने वाले RBI के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन के गुरु डॉ. आलोक सागर की। IIT दिल्ली के पूर्व प्रोफेसर व बहुत सी भाषाओं के जानकार होने के बावजूद प्रचार-प्रसार से दूर सादगी भरा आनंद का जीवन जी रहे हैं। आलोक सागर, जिन्होंने आईआईटी दि‍ल्ली से इंजीनियरिंग करने के बाद अमेरिका की मशहूर ह्यूसटन यूनिवर्सिटी से पीएचडी की पढ़ाई की है। वहीं कनाड़ा में 7 साल जॉब करने के बाद वे वापस यहां आ गए। उनके जीवन को भारत की नई पीढ़ी के समक्ष प्रस्तुत करने की बहुत जरूरत है। मोबाइल ने आज इंसान को इतना अधिक जकड़ लिया है कि वह इंसान के सहज स्वभाव को खत्म कर रहा है।

Prof. Alok Sagar

वनवासियों के जंगल बचे रहे, स्वरोजगार के अवसर बढ़ें ताकि नौकरी पर निर्भरता कम होते रहे। इस मकसद से वे लोगों के बीच काम भी कर रहे हैं और साधारण जीवन जी रहे हैं। 10 बाइ 10 की झोपड़ी में 2 जोड़ कुर्ता-पाजामा और साइकिल के अलावा कुछ राशन और बर्तन ही उनकी पूंजी है। प्रो. आलोक सागर ने कोचमऊ में फलदार चीकू, लीची, अंजीर, नीबू, चकोतरा, मोसबी, किन्नू, सन्तरा, रीठा, आम, महुआ, आचार, जामुन, काजू, कटहल, सीताफल के सैकड़ों पेड़ लगाए हैं।

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कौन हैं प्रोफेसर आलोक सागर

प्रोफेसर आलोक सागर का जन्म 20 जनवरी, 1950 को दिल्ली में हुआ। आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर बने। यहां मन नहीं लगा तो नौकरी छोड़ दी। वे यूपी, मप्र, महाराष्ट्र में रहे। पिता सीमा शुल्क उत्पाद शुल्क विभाग में कार्यरत थे। एक छोटा भाई अंबुज सागर आईआईटी दिल्ली में प्रोफेसर हैं। एक बहन अमेरिका कनाडा में, तो एक बहन जेएनयू में कार्यरत थीं। 72 साल की उम्र में भी डॉ. आलोक सागर रोज खाप पंचायत के कोचामऊ गांव के खेत में लगे पौधों में बाल्टी से पानी डालने जाते हैं। वहीं डॉ. सागर कहीं भी आना-जाना साइकिल से करते हैं। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था पर उनकी प्रतिक्रिया उनके सहज दार्शनिक अंदाज उनके वास्तविक अनुभव को दर्शाता है। उनका कहना है कि वर्तमान शिक्षा में इंसान को नौकर बनाने पर अधिक फोकस है। लोग बच्चों को शिक्षा से जोड़कर निश्चित हो जाते हैं। आदमी दिमाग का इस्तेमाल नहीं कर पा रहा है। लोग कहते हैं दिल्ली में बैठा आदमी गांव की सोच रहा है। जबकि गांव के आदमी को गांव के हित के लिए सोचना चाहिए। व्यवस्था ने इंसान का दिमाग अस्थिर कर दिया है।

अब गंभीर होकर सोचिए न। प्रो.  आलोक सागर IIT दिल्ली से इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियरिंग में डिग्री, ह्यूस्टन से पीएचडी, टैक्सास से पोस्ट डाक्टरेट, पूर्व आरबीआई गवर्नर रघुराम राजन के प्रोफेसर, विगत 34 वर्षों से किसी भी तरह के लालच को दरकिनार कर मध्य प्रदेश के बैतूल जिले में आदिवासियों के बीच रहते हुए उनके सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक उत्थान और उनके अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। निजी जीवन में दिल्ली में करोड़ों की सम्पत्ति के मालिक आलोक सागर की मां दिल्ली के मिरांडा हाउस में फिजिक्स की प्रोफेसर, पिता भारतीय राजस्व सेवा के अधिकारी थे, छोटा भाई आज भी आईआईटी में प्रोफेसर है।

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सब कुछ त्याग कर आदिवासियों के उत्थान के लिये समर्पित, आदिवासियों के साथ सादगी भरा जीवन जी रहे हैं। रहने को घास-फूस की एक झोपड़ी, पहनने को तीन कुर्ते, आवागमन के लिए एक साइकिल-ताकि प्रकृति को नुकसान न हो। कई भाषाओं के जानकार श्री सागर आदिवासियों से उन्हीं की भाषा में संवाद करते हैं। उनको पढ़ना लिखना सिखाने के साथ-साथ आसपास के जंगलों में उनसे  लाखों फलदार पौधौं का रोपण करवा चुके हैं। फलदार पौधौं का रोपण करवाकर आदिवासियों में गरीबी से लड़ने की उम्मीद जगा रहे हैं। साइकिल से आते जाते बीज इकट्ठा कर आदिवासियों को बोने के लिए देते हैं। कई कई बार भारत सरकार के  पद्मम पुरस्कार को ठुकरा चुके प्रो. आलोक सागर को आखिर किस संज्ञा और विशेषण से विभूषित किया जाना चाहिए। कलियुग के ऋषि याकि भारत भाग्य विधाता।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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