जिला पंचायत अध्यक्ष: राजनीतिक दलों को इस दर्द का एहसास तब क्यों नहीं हुआ!

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प्रदीप तिवारी

लखनऊ: जिला पंचायत अध्यक्ष पद के लिए हो रहे चुनाव में सभी पार्टियों की निगाहे बीजपी पर टिकी हुई हैं। राजनीतिक दलों की तरफ से बीजेपी पर सत्ता का दुरुपयोग कर अध्यक्ष पद को कब्जाने का आरोप लगाया जा रहा है। इन आरोपों को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता और न ही यह नया है। जो लोग सत्ता का दुरुपयोग कर अध्यक्ष पद पर कब्जा करने का आरोप लगा रहे हैं, क्या सत्ता में रहते उन्होंने ऐसा नहीं किया था? सच यहीं है कि जिस गंदी परंपरा की शुरुआत सपा-बसपा ने की थी, आज उसी का सामना उन्हें खुद करना पड़ रहा है। हालांकि बसपा प्रमुख जिला पंचायत अध्यक्ष पद से खुद को दूर कर लिया है। उनका कहना है कि उनकी तैयारी 2022 विधानसभा की चल रही है।

जिला पंचाय अध्यक्ष पद के लिए सबसे ज्यादा दर्द सपा को है। क्योंकि चुनाव जीत कर सबसे ज्यादा सदस्य सपा से आए है। बावजूद इसके लगभग 20 सीटों पर बीजेपी के जिला पंचायत अध्यक्ष निर्विरोध चुन लिए गए हैं। इसके पीछे सपा-बसपा की दी गई परंपरा ही जिम्मेदार है। बीजेपी ने केवल उस परंपरा का निर्वाहन किया है। सपा को इस बात को समझना चाहिए कि आज जिस दर्द से वह तिलमिला रही है। उस दर्द को उसके सत्ता में रहने पर और दलों ने सहा और महसूस किया है। कहा गया है कि जो बोओगे, वही काटोगे। राजनीति में सुचिता की बात हमेशा से होती आ रही है, लेकिन राजनीति में कितनी सुचिता वो सबके सामने है।

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अखिलेश यादव ने संभाली कमान

जिला पंचायत के करीब 20 सीटों पर बीजेपी के अध्यक्षों के निर्विरोध चुने जाने के बावजूद 40 ऐसी सीटें है जहां बीजेपी और सपा में कड़ी टक्कर है। ऐसे में सपा अब जिला पंचायत अध्यक्ष का पद अपने खाते में लाने के लिए पूरा जोर लगा चुकी है। इसी के तहत पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव खुद चुनाव की कमान संभाल ली है। उन्होंने बीजेपी पर प्रशासन का गलत इस्तेमाल करने का आरोप लगाया है। लेकिन उन्हें भी याद करना चाहिए कि जब वह सत्ता में थे तो सपा के जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव लड़कर बने थे। इटावा में सपा का जिला पंचायत अध्यक्ष निर्विरोध चुन लिया गया है। वहां किसी प्रत्याशी सपा के खिलाफ खड़ा होने का साहस ही नहीं किया। ऐसी परिस्थितियां आज की बनाई हुई नहीं हैं।

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बसपा सदस्यों पर सपा की निगाहें

बसपा सुप्रीमो मायावती जिला पंचायत अध्यक्ष के चुनाव में हिस्सा न लेने का ऐलान कर चुकी हैं। ऐसे में बसपा सदस्यों पर सपा की निगाहे बनी हुई है। वहीं मायावती अपने नेताओं और कार्यकर्ताओं को सपा को हराने के लिए कह भी चुकी हैं। लेकिन पिछले विधानसभा चुनाव में मायवती के कहने जो बसपा नेता सपा का सहयोग कर चुके हैं, उनमें से आज अधिकत्तर नेता सपा में शामिल भी हो चुके हैं। ऐसे में मायावती के इस अपील का उनके पार्टी के पदाधिकारियों पर कितना असर होगा यह तो आने वाला वक्ता बताएगा।

बीजेपी और सपा प्रत्याशियों में हुई थी झड़प

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नामांकन के आखिरी दिन पूरे प्रदेश में राजनीतिक माहौल गरमा गया था। आरोप लगा कि ​बीजेपी नेताओं और प्रशासन की मिली भगत से सपा नेताओं को पर्चा ही नहीं दाखिल करने दिया गया। वहीं पूर्वांचल पर कई जगहों पर सपा और बीजेपी के समर्थकों के बीच झड़प भी हुई थी। बलिया में झड़प के बावजूद सपा प्रत्याशी ने अपना नामांकन दाखिल किया था। गोरखपुर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था, जिसमें सपा प्रत्याशी को पुलिस और प्रशासन की मौजूदगी में कलेक्ट्रेट गेट के बाहर अभद्रता करते खदेड़ दिया गया। बस्ती जनपद में सपा और बसपा दोनों के उम्मीदवार एक ही जाति विशेष के थे। यहां चौधरी का नेतृत्व करने वाले पूर्व मंत्री के घर पर बीजेपी के प्रत्याशी के पहुंचने पर बवाल हो गया। इस दौरान दोनों तरफ से कुछ कार्यकर्ताओं चोटें भी आई। फिलहाल यहां भी सपा प्रत्याशी ने अपना नामांकन दाखिल कर लिया है।

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