दिलों को जोड़ने वाले संचारक थे दीनदयाल उपाध्याय

पं. दीनदयाल उपाध्याय स्वयं बड़े पत्रकार और प्रभावी संचारक थे। अपनी विचारधारा को समाज तक पहुंचाने के लिए पत्रों का संपादन-प्रकाशन, स्तंभलेखन, पुस्तक लेखन और भाषण इन सभी माध्यमों का उन्होंने प्रभावी उपयोग किया। वे केवल लिखने वाले विचारक नहीं थे, बल्कि बोलकर, मिलकर और अपने आचरण से भी संवाद स्थापित करने वाले संचारक थे। इसलिए उनकी स्मृति में यह विचार करना स्वाभाविक है कि एकात्म मानवदर्शन समाज जीवन के विभिन्न क्षेत्रों और विशेषकर मीडिया को किस प्रकार प्रभावित कर सकता है।
यह सहज विश्वास करना कठिन है कि सामान्य कद-काठी और अत्यंत साधारण जीवन जीने वाले एक व्यक्ति ने भारतीय राजनीति और समाज को ऐसा वैकल्पिक विचार दिया, जिसने हजारों युवाओं को प्रेरित किया और जिसकी विचारयात्रा आगे चलकर भारतीय राजनीति को गहरे प्रभावित करने वाली शक्ति बनी। किसी देश की राजनीतिक निष्ठाएं अचानक नहीं बदलतीं। उनके पीछे वर्षों का विचार, संगठन और अनगिनत कार्यकर्ताओं का परिश्रम होता है। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी से लेकर नरेंद्र मोदी तक पहुंची यह विचारयात्रा इसी दीर्घ प्रक्रिया का परिणाम है। इसमें लाखों अनाम सहयोगियों के योगदान को भले भुलाया जा सकता है, नकारा नहीं जा सकता।
राजनीति नहीं, विचार के साधक
पं. दीनदयाल उपाध्याय मूलतः राजनीति के व्यक्ति नहीं थे। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक थे। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के आग्रह पर संघ नेतृत्व ने उन्हें नवगठित भारतीय जनसंघ के कार्य में लगाया। उस समय संघ के लिए कठिन परिस्थितियां थीं। राजनीतिक आरोपों और प्रतिबंधों के बीच संगठन को सामाजिक विस्तार के साथ अपने विचारों को सार्वजनिक जीवन में अभिव्यक्त करने की आवश्यकता महसूस हुई। जनसंघ इसी ऐतिहासिक परिस्थिति में सामने आया और दीनदयाल ने उसके संगठन तथा वैचारिक आधार को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे केवल महामंत्री नहीं थे, वे संगठन के विचार और कार्यकर्ता के बीच सेतु थे। उनकी सादगी, आत्मीयता, सतत प्रवास, लेखन और संगठन कौशल ने उन्हें कार्यकर्ताओं के बीच असाधारण सम्मान दिलाया।
चुनावी सफलताओं के बिना बने दिशावाहक
दीनदयाल को अपने राजनीतिक जीवन में बड़ी चुनावी सफलताएं नहीं मिलीं। जौनपुर से लोकसभा चुनाव भी लड़ा और हार गए। लेकिन चुनावी परिणाम उनके प्रभाव की सीमा तय नहीं कर सके। उनका सामाजिक और वैचारिक कद लगातार बढ़ता गया। वे अपने व्यवहार से लोगों के मन में, संगठन कौशल से कार्यकर्ताओं के दिलों में और लेखन-विचार से बौद्धिक जगत में जगह बनाते गए। उस दौर के वामपंथी, कांग्रेसी और समाजवादी विचारकों के बीच दीनदयाल की अपनी वैचारिक पहचान बनी। अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, नानाजी देशमुख, सुंदरसिंह भंडारी, कुशाभाऊ ठाकरे और अनेक कार्यकर्ताओं की पीढ़ी के निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण था। वे केवल संगठनकर्ता नहीं थे; वे व्यक्तियों का निर्माण करने वाले विचार-साधक थे।

भारतीय राजनीतिक विमर्श में नया हस्तक्षेप
एकात्म मानववाद के माध्यम से दीनदयाल ने भारतीय राजनीतिक चिंतन के सामने एक मौलिक दृष्टि रखी। उनका आग्रह था कि मनुष्य को केवल आर्थिक या राजनीतिक इकाई मानकर नहीं समझा जा सकता। मनुष्य, समाज, प्रकृति और समूची सृष्टि के बीच एकात्म संबंध को समझना आवश्यक है। उनकी अकाल मृत्यु ने उनके विचारों के व्यापक विस्तार की संभावनाओं को अवश्य प्रभावित किया, किंतु विचार की यात्रा रुकी नहीं। आज भी एकात्म मानवदर्शन पर विमर्श जारी है। दीनदयाल जी की स्मृति का वास्तविक अर्थ यही है कि उनके विचारों को जीवन के नए क्षेत्रों और बदलती परिस्थितियों के संदर्भ में समझा जाए।
एकात्म मानवदर्शन के आधार पर कैसा हो मीडिया?
यहीं से मीडिया के बारे में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है कि यदि एकात्म मानवदर्शन हमारी दृष्टि का आधार बने तो मीडिया का स्वरूप कैसा होगा? दीनदयाल स्वयं संचारक थे। इसलिए उनके विचारों को मीडिया से अलग करके नहीं देखा जा सकता। संवाद मनुष्य की मूल आवश्यकता है। मनुष्य समाज से, प्रकृति से और अपने आसपास की दुनिया से निरंतर संवाद करता है। सूचना इस संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम है। लेकिन हर सूचना मनुष्य के लिए समान रूप से उपयोगी नहीं होती। प्रश्न यह है कि सूचना का संचार व्यक्ति के विकास, समाज के संतुलन और मनुष्यता के विस्तार में कितना सहायक है।एकात्म मानवदर्शन विभेद नहीं, समग्रता का दर्शन है। इसलिए इससे प्रेरित मीडिया भी सूचना को केवल सनसनी या बाजार की वस्तु के रूप में नहीं देखेगा। वह यह भी विचार करेगा कि किसी सूचना का समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
मीडिया में शुभदृष्टि
आज समाचार का बड़ा हिस्सा असाधारण, अशोभनीय, हिंसक या चौंकाने वाली घटनाओं पर केंद्रित होता है। नकारात्मकता अक्सर अधिक ध्यान आकर्षित करती है। ऐसे वातावरण में ‘शुभदृष्टि’ की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है। शुभदृष्टि का अर्थ यह नहीं कि मीडिया आलोचना छोड़ दे या समस्याओं को छिपाए। बल्कि इसका अर्थ है कि समस्या के साथ समाधान को भी देखा जाए, घटना के साथ उसके मानवीय संदर्भ को समझा जाए और सूचना को इस तरह प्रस्तुत किया जाए कि समाज में अनावश्यक भय, घृणा और विभाजन न बढ़े। ऐसा मीडिया बाजार से संवाद करेगा, लेकिन बाजार का बंदी नहीं बनेगा। वह समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को प्राथमिकता देगा। उसका उद्देश्य केवल अधिक दर्शक, पाठक या क्लिक हासिल करना नहीं होगा, बल्कि अधिक सार्थक संवाद स्थापित करना होगा।
मीडिया और समाज अलग-अलग नहीं
जीवन-मूल्यों की आवश्यकता जितनी मनुष्य को है, उतनी ही मीडिया को भी है। यह संभव नहीं कि समाज मूल्यों की बात करे और उसका मीडिया लगातार नकारात्मकता को ही विस्तार देता रहे। पत्रकारिता, सिनेमा, टेलीविजन और डिजिटल माध्यम समाज को प्रभावित करने वाले अत्यंत शक्तिशाली उपकरण हैं। इसलिए इन्हें भी मानवीय मूल्यों से जोड़ना होगा। तब टेलीविजन की बहसें केवल शोर नहीं, निष्कर्ष देने वाला संवाद बन सकती हैं। फिल्में केवल मनोरंजन नहीं, संवेदना और सामाजिक समरसता का माध्यम बन सकती हैं। खबरें केवल डर पैदा करने के बजाय कठिन परिस्थितियों में जीने का साहस भी दे सकती हैं। मीडिया जीवन के अधिक व्यापक और विविध पक्षों को सामने ला सकता है।
यह किसी धार्मिक या आध्यात्मिक मीडिया की कल्पना नहीं है। यह उस दृष्टि की बात है जो मनुष्य को संपूर्णता में देखने का आग्रह करती है। सबको साथ लेकर चलने, सबके विकास और सबसे कमजोर व्यक्ति के हित को प्राथमिकता देने की दृष्टि। दीनदयाल की स्मृति और उनका विचार हमारे सामने एक ऐसी दुनिया का स्वप्न रखते हैं जिसमें व्यक्ति, समाज, प्रकृति और मीडिया परस्पर विरोधी नहीं, परस्पर पूरक हों। जब दृष्टि एकात्म होती है तो समस्याओं के साथ समाधान दिखाई देते हैं, संकटों के साथ संभावनाएं और निराशा के साथ आशा भी दिखाई देती है।
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आज मीडिया के सामने सबसे बड़ा प्रश्न केवल तकनीक या बाजार का नहीं, दृष्टि का है। हमें तय करना होगा कि हमें कैसा मीडिया चाहिए और वह समाज को किस दिशा में ले जाए। दीनदयाल के संचारक व्यक्तित्व से प्रेरणा लेते हुए यदि हम संवाद को जोड़ने का माध्यम बनाएं, सूचना को जिम्मेदारी से प्रस्तुत करें और पत्रकारिता में शुभदृष्टि का विस्तार करें, तो मीडिया मनुष्यता को मजबूत करने वाली शक्ति बन सकता है।
यही दीनदयाल जी की स्मृति को सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी। दिलों को जोड़ने वाले उस संचारक की स्मृति में ऐसा संवाद खड़ा करना, जो समाज को बांटे नहीं, जोड़े; निराश न करे, जगाए; और मनुष्य को केवल सूचना का उपभोक्ता नहीं, संवेदनशील नागरिक और बेहतर मनुष्य बनने की प्रेरणा दे।
(लेखक भारतीय जन संचार संस्थान-आईआईएमसी के पूर्व महानिदेशक हैं। संप्रति माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)
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