ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाने पर इलाहाबाद हाई कोर्ट सख्त, यूपी सरकार से मांगा जवाब
प्रयागराज: उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायतों का कार्यकाल समाप्त होने के बाद ग्राम प्रधानों को ही प्रशासक नियुक्त किए जाने के राज्य सरकार के फैसले पर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। इस नीति को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ग्राम प्रधानों को प्रशासक के रूप में पदों पर बने रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि, अदालत ने फिलहाल सरकार के इस आदेश पर किसी भी प्रकार की अंतरिम रोक लगाने से इनकार कर दिया है। यह टिप्पणी शुक्रवार को जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की एकल पीठ (Single Bench) ने मामले की गंभीरता को देखते हुए की।
अवमानना की श्रेणी में आता है सरकार का कदम
सुनवाई के दौरान जस्टिस सिद्धार्थ नंदन की पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि ग्राम प्रधानों को ही दोबारा प्रशासक नियुक्त करना हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (खंडपीठ) द्वारा पूर्व में दिए गए आदेशों का सीधा उल्लंघन है। कोर्ट के मुताबिक, सरकार का यह कदम प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना (Contempt of Court) के दायरे में आता है।
इसके साथ ही, हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को अंतिम अवसर देते हुए एक विस्तृत हलफनामा (Affidavit) दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार से कहा है कि वह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) आयोग की रिपोर्ट को पूरी तरह से रिकॉर्ड पर लेकर आए।
13 जुलाई को होगी अगली बड़ी सुनवाई
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को कड़े निर्देश जारी करते हुए कहा कि यदि राज्य सरकार ने पंचायत चुनाव और आरक्षण को लेकर किसी आयोग का गठन किया है, तो उसकी पूरी रूपरेखा और विवरण अदालत के समक्ष प्रस्तुत किया जाए। दाखिल किए जाने वाले हलफनामे में यह बिल्कुल साफ और स्पष्ट होना चाहिए कि राज्य में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव कराने की अंतिम समय सीमा (Timeline) क्या है। यह याचिका याचिकाकर्ता अरविंद राठौर की ओर से दाखिल की गई है। मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए कोर्ट ने इसकी अगली सुनवाई के लिए 13 जुलाई को दोपहर 2:00 बजे का समय निश्चित किया है।
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क्या है पूरा विवाद
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय ग्राम पंचायतों का पांच साल का संवैधानिक कार्यकाल इसी साल 26 मई 2026 को समाप्त हो चुका है। चुनाव टलने की स्थिति में राज्य सरकार ने एक विशेष आदेश जारी कर तत्कालीन ग्राम प्रधानों को ही उनकी संबंधित पंचायतों का प्रशासक नियुक्त कर दिया था, ताकि विकास कार्य न रुकें। अरविंद राठौर की याचिका में सरकार के इसी आदेश को असंवैधानिक बताते हुए चुनौती दी गई है और मांग की गई है कि मौजूदा प्रशासकों को तुरंत हटाकर राज्य में जल्द से जल्द लोकतांत्रिक तरीके से त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव संपन्न कराए जाएं।
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