सनातन जीवन संस्कृति में जीवन तलाशता बॉलीवुड

भक्ति और आस्था भाव से सृजित और संप्रेषित होते हैं। संस्कृति और दर्शन जीवन के वे मूल्य हैं, जिनका आस्था से जुड़ना जरूरी है। भारतीय सिनेमा जैसे सशक्त माध्यम को इस पर शायद अब होश आ रहा है। सत्यवादी हरिश्चन्द जैसी आस्थावान कहानी से शुरू हुई शतकीय यात्रा को इस दुनिया के जाहिलों और लम्पटों ने दिल एक मंदिर से बदतमीज़ दिल, कमीने और न जाने नैतिक पतन की कितनी आंधी खाई में धकेल दिया था। ऐसा लग रहा था कि हिंदी सिनेमा केवल ऐयाशियों की कहानियां ही जानता है। इसका व्यापक असर समाज पर पड़ने लगा और समाज विकृतियों से भर गया। दक्षिण भारत का सिनेमा कांतारा और बाहुबली जैसी फिल्में बना रहा था, तो हिंदी सिनेमा में शीला की जवानी और जलेबी बाई गाया जा रहा था। सैकड़ों करोड़ की लागत से अनेक फिल्में बनाने का फैशन आया लेकिन लोक गायब हो गया।
दक्षिण भारत फिर भी अपनी मिट्टी से जुड़ कर कहानियाँ परोसता रहा और फलक पसारता रहा। बॉलीवुड में शरीफ अब्दुल चाचा, धूर्त पुजारी, क्रूर ठाकुर साहब या जमींदार, माफिया, रंगबाज, देहबाजी और नग्नता के मसालों से फिल्में बनती रहीं। शुरू में लोगों ने देखा, लेकिन बाद में सभी का मन उचट गया। भारतीय सेना के शौर्य और कुछ लोक रुचि की कहानियां भी आईं तो जनता ने उन्हें खूब प्यार दिया। इस बीच टेलीविजन के धारावाहिकों और ओटीटी के कुछ निर्माणों ने लोगों को अपने से जोड़ा।
अब समय ने गजब का करवट लिया है। दो करोड़ से भी कम लागत में बनी हनुमान अंश ने जब 400 करोड़ के व्यवसाय को भी पार कर लिया है, तो बॉलीवुड के सभी स्थापित मानक और उनके संचालकों की नींद उड़ गई है। हनुमान अंश ने जो कीर्तिमान बनाया है उससे साबित हो गया है कि संस्कृति, कला और दर्शन केवल आस्था का विषय हैं जो समाज को अपने संदेश को संप्रेषित करने में सक्षम हो सकते हैं। केवल बड़े अभिनेताओं की उपस्थिति और bfx की उच्च तकनीक किसी फिल्म के सफल होने का कारण हो ही नहीं सकते। वैसे भी जब कोई निर्माता किसी आस्था के विषय को अपनी कथा वस्तु बना रहा है तो उसे इस बात पर ध्यान देना ही होगा कि आस्था केवल दिखाने की वस्तु नहीं होती। उसके लिए वही समर्पण और भाव भी आवश्यक है। जैसे जब रामानंद सागर ने रामायण धारावाहिक बनाया तो उसके सभी सदस्यों में आस्था के साथ वही भाव भी था। तब उनका वह धारावाहिक इतिहास रच गया।
आजकल एक और रामायण की चर्चा हो रही है। भगवान राम भारत के प्राण तत्व हैं। राम सहज हैं। सरल हैं। मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। माता सीता भारत की वह महाशक्ति हैं, जिनमें हम सभी समाहित हैं। रामायण वस्तुतः सीता चरित है। भगवान शिव की रचना है। महर्षि वाल्मीकि और गोस्वामी तुलसी दास जी ने इसे लोक में परोसा है। रामायण सृष्टि में मनुष्य के मर्यादा और समाज के संबंधों की कथा है। इसके मूल में आस्था और भक्ति है।
रामायण के नवनिर्माताओं के अनुसार यह नई फिल्म विश्व की अधिकतम लागत वाली फिल्मों में से एक है। इससे जुड़े सभी नाम बहुत बड़े हैं। 4000 करोड़ रुपए का बजट है। इसके कुछ गीत रिलीज हुए हैं। किसी गीत का कोई शब्द किसी के जुबान पर नहीं चढ़ा है। दूसरी ओर हनुमान अंश के हर भजन लाखों रीलों के साथ जन जन तक पहुंच चुके। हृदय में जिनके सीताराम को विशाल चतुर्वेदी ने ऐसा गाया है कि घंटों सुनने पर भी दिल नहीं भरता। हनुमान भजन और पार्वती ने तो गजब का असर दिखाया है।
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रामायण दीपावली पर रिलीज हो रही है। भगवान जाने उसका क्या होगा। राम वास्तव में केवल आस्था का विषय हैं। यह रामायण राम को उस आस्था के रूप में प्रस्तुत करेगी या vfx से प्रभावित करेगी, यह समय बताएगा, लेकिन इसी 25 सितंबर को बिहार के बिहटा की वन देवी पर केंद्रित द वी वन कमाल करने वाली है। एक छठ गीत की शानदार प्रस्तुति ने अभी से इसको लेकर एक अलग प्रकार का माहौल बना दिया है। वन देवी पर केंद्रित यह फिल्म दक्षिण की कांतारा का रिकॉर्ड तोड़ सकती है। खास बात यह है कि घर-घर में सास बहू की लड़ाई के लिए पहचानी जाने वाली धारावाहिक निर्माता एकता कपूर ने यह फिल्म बनाई है। भारत की मिट्टी से लोक की कहानियां लेकर शुरू हो रही यह परंपरा स्वागत योग्य है।
(लेखक संस्कृति पर्व पत्रिका के संपादक हैं।)
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